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  • दोस्तों, इस दुनिया में ज़्यादातर लोग ग़ुलामी वाला जीवन जी रहे हैं। सुनने में थोड़ा अटपटा लग रहा है ना? लेकिन यक़ीन मानियेगा बात जो मैं कह रहा हूँ, है बिलकुल सच। अगर सहमत ना हों तो ज़रा अपनी प्राथमिकताओं, आदतों और फिर दिनचर्या को बारीकी से देख लें। अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाया ना, मैं क्या कहना चाह रहा हूँ? चलिए इसे मैं आपको अपने उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ।

    दोस्तों मैं अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ मुझे शारीरिक और मासिक स्वास्थ्य को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिये। यह जानने और मानने के बाद भी मेरी दिनचर्या में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मेरी आदतों की वजह से इस प्राथमिकता से मेल नहीं खाती है। जैसे, अपने व्यवसायिक कमिटमेंट को हर हाल में, तय समय से पहले पूरा करने के प्रयास में कई बार व्यायाम और मॉर्निंग वॉक को मिस कर देना या फिर कई बार जानते बुझते भी उन चीजों को खाना जो आपको लंबे समय में नुक़सान पहुँचा सकती है।

    सीधे-सीधे शब्दों में कहूँ, तो अक्सर हम अपनी इंद्रियों के ग़ुलाम होने के कारण उन कार्यों को करते या बार-बार दोहराते हैं, जो लंबे समय में हमारे लिए नुकसानदायी होते हैं। साथियों, जानते-बुझते भी इस गलती को जीवनभर दोहराने की मुख्य वजह अपने मन को वश में ना रख पाना है। इसीलिए तो कहते हैं, ‘जिसका मन वश में नहीं है, वही विवश है!’ इसलिए मेरा मानना है कि जब तक आप अपनी इन इंद्रियों या और स्पष्ट कहूँ तो अपने मन पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे तब तक मूल्यों और प्राथमिकताओं पर आधारित जीवन को जी पाना संभव नहीं है।

    जी हाँ साथियों, सामान्यतः हमारा मन ना तो कभी संतुष्ट या तृप्त होता है और ना ही कभी शांत बैठता है। इसी वजह से अक्सर हम लोग जो होता है, उसे नज़रंदाज़ कर, जो नहीं होता उनपर याने अभावों पर ध्यान देने लगते हैं और दुखी रहते हैं। वैसे, इसे आप जो चीज नहीं है या नहीं मिली है की ओर ध्यान आकर्षित करने की हमारे मन की प्रवृति भी मान सकते हैं। जैसे, किसी व्यक्ति या स्थान पर ज़रा सा सम्मान कम मिला तो हमें अपमान का एहसास होने लगता है।

    अगर आप इसी परिस्थिति पर थोड़ा गंभीरता से विचार करेंगे तो पायेंगे कि मान-अपमान का यह बोध सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे मन की उपज था। इसीलिए गीता जी में भगवान श्री कृष्ण ने हमारे मन को बड़ा चंचल, भटकने वाला, दृढ़ और बलवान बताया है। जिसे रोकना वायु को रोकने समान है। इस आधार पर कहा जाये तो मान-अपमान, सुख-दुख, अच्छा-बुरा, शांति-अशांति आदि का बोध हमें हमारा मन ही कराता है। अर्थात् यह सभी चीजें हमें बाहर से नहीं, भीतर से मिलती है जिसका बोध हमें हमारा मन कराता है।

    दोस्तों, इस दुनिया में ज़्यादातर लोग ग़ुलामी वाला जीवन जी रहे हैं। सुनने में थोड़ा अटपटा लग रहा है ना? लेकिन यक़ीन मानियेगा बात जो मैं कह रहा हूँ, है बिलकुल सच। अगर सहमत ना हों तो ज़रा अपनी प्राथमिकताओं, आदतों और फिर दिनचर्या को बारीकी से देख लें। अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाया ना, मैं क्या कहना चाह रहा हूँ? चलिए इसे मैं आपको अपने उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। दोस्तों मैं अब उम्र के उस पड़ाव पर हूँ जहाँ मुझे शारीरिक और मासिक स्वास्थ्य को अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिये। यह जानने और मानने के बाद भी मेरी दिनचर्या में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मेरी आदतों की वजह से इस प्राथमिकता से मेल नहीं खाती है। जैसे, अपने व्यवसायिक कमिटमेंट को हर हाल में, तय समय से पहले पूरा करने के प्रयास में कई बार व्यायाम और मॉर्निंग वॉक को मिस कर देना या फिर कई बार जानते बुझते भी उन चीजों को खाना जो आपको लंबे समय में नुक़सान पहुँचा सकती है। सीधे-सीधे शब्दों में कहूँ, तो अक्सर हम अपनी इंद्रियों के ग़ुलाम होने के कारण उन कार्यों को करते या बार-बार दोहराते हैं, जो लंबे समय में हमारे लिए नुकसानदायी होते हैं। साथियों, जानते-बुझते भी इस गलती को जीवनभर दोहराने की मुख्य वजह अपने मन को वश में ना रख पाना है। इसीलिए तो कहते हैं, ‘जिसका मन वश में नहीं है, वही विवश है!’ इसलिए मेरा मानना है कि जब तक आप अपनी इन इंद्रियों या और स्पष्ट कहूँ तो अपने मन पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे तब तक मूल्यों और प्राथमिकताओं पर आधारित जीवन को जी पाना संभव नहीं है। जी हाँ साथियों, सामान्यतः हमारा मन ना तो कभी संतुष्ट या तृप्त होता है और ना ही कभी शांत बैठता है। इसी वजह से अक्सर हम लोग जो होता है, उसे नज़रंदाज़ कर, जो नहीं होता उनपर याने अभावों पर ध्यान देने लगते हैं और दुखी रहते हैं। वैसे, इसे आप जो चीज नहीं है या नहीं मिली है की ओर ध्यान आकर्षित करने की हमारे मन की प्रवृति भी मान सकते हैं। जैसे, किसी व्यक्ति या स्थान पर ज़रा सा सम्मान कम मिला तो हमें अपमान का एहसास होने लगता है। अगर आप इसी परिस्थिति पर थोड़ा गंभीरता से विचार करेंगे तो पायेंगे कि मान-अपमान का यह बोध सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे मन की उपज था। इसीलिए गीता जी में भगवान श्री कृष्ण ने हमारे मन को बड़ा चंचल, भटकने वाला, दृढ़ और बलवान बताया है। जिसे रोकना वायु को रोकने समान है। इस आधार पर कहा जाये तो मान-अपमान, सुख-दुख, अच्छा-बुरा, शांति-अशांति आदि का बोध हमें हमारा मन ही कराता है। अर्थात् यह सभी चीजें हमें बाहर से नहीं, भीतर से मिलती है जिसका बोध हमें हमारा मन कराता है।
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  • दोस्तों, रामू आज बहुत खुश और मस्त था, जो कि मेरे लिये दुनिया के आठवें आश्चर्य से कम नहीं था। मेरी नज़र में इसकी मुख्य वजह जीवन को देखने का उसका नज़रिया था। वह हर अच्छे से अच्छे कार्य में कुछ ना कुछ कमियाँ निकाल ही लेता था। उदाहरण के लिए मान लीजिए अचानक से कोई गाड़ी; आपकी गाड़ी के सामने आ गई और आपने समझदारी का परिचय देते हुए अपनी गाड़ी को ब्रेक लगा कर रोक लिया। अब रामू आपसे इस बात पर नाराज़ हो सकता है कि अगर ब्रेक लगाने पर गाड़ी नहीं रुकती और एक्सीडेंट हो जाता, तो आप क्या करते?

    अब आप समझ ही सकते हैं क्यों मेरे लिये रामू को खुश देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। मैंने तुरंत रामू से ख़ुशी का कारण पूछा तो पता चला कि आज उसने एक नई गाड़ी ख़रीदी है। मैंने तुरंत रामू को बधाई दी और मन ही मन सोचने लगा कि कुछ घंटों बाद रामू वापस पहले जैसा ही हो जाएगा क्योंकि आज भी उसकी ख़ुशी किसी वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर थी।

    साथियों, याद रखियेगा जब तक आपकी ख़ुशी किसी व्यक्ति, वस्तु या विशेष परिस्थिति पर निर्भर करती है, तब तक वह तात्कालिक होती है। अर्थात् जैसे ही वह व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति बदलेगी आपकी ख़ुशी भी चली जायेगी। दूसरे शब्दों में कहूँ तो जीवन में आप जब भी किसी विशेष कारण से खुश होंगे, उस कारण के मिटते ही आपको उतने ही दुख का अनुभव भी होगा। याने जो सुख किसी कारण से प्राप्त होता है, वह कारण के साथ ही समाप्त भी हो जाता है।

    इसके विपरीत दोस्तों अगर आप अकारण ही खुश रहने का अभ्यास कर लें, तो आप अपने पूरे जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। अगर आप इसे आध्यात्मिक नज़रिए से देखेंगे तो मैं कहूँगा कि हम ईश्वर की संतान है और कोई भी अपनी संतान को परेशान और दुखी नहीं देख सकता है। इसलिए हमारे जीवन में घटने वाली हर घटना के पीछे ईश्वर की मंशा हमें खुश रखने की होती है। लेकिन कई बार हम अपने नज़रिए के कारण उस ख़ुशी के कारण को अपने दुख का कारण बना लेते हैं। इससे बचने का एक ही उपाय है साथियों, ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव रखना। अगर आप जीवन में घटने वाली हर घटना को ईश्वर को ही अर्पित कर दें याने हर हाल में यह कहना शुरू कर दें, ‘जैसी मेरे प्रभु की इच्छा!’ या ‘ईश्वर जो करता हैं अच्छे के लिये करता है!’ अर्थात् कुछ मिले तो भी हरि इच्छा और ना मिले तो भी हरि इच्छा। यह भाव आपके अंदर दुख की उत्पत्ति नहीं होने देगा और आपको अकारण ही, हर हाल में, हर समय प्रसन्नता और आनंद की अनुभूति देगा।

    दोस्तों, यक़ीन मानियेगा उपरोक्त बात मैं आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता रहा हूँ। मैंने अपने जीवन में ऐसी कई परिस्थितियों का सामना किया है जब सब कुछ ख़त्म नज़र आ रहा था। लेकिन बीतते समय और बदलते परिणाम के साथ मुझे एहसास हुआ कि जो कुछ घटा था वह मेरे जीवन को बेहतर बनाने के लिए ही घटा था। इसीलिए ‘आप कैसे हैं पूछने पर हर बार मेरा जवाब ‘मैं खुश हूँ!’ रहता है।

    वैसे दोस्तों, अकारण खुश या आनंदित रहने का एक और बड़ा फ़ायदा है। यह भी इत्र की तरह अपने आप फैलने याने एक से दूसरे तक अपने आप ही पहुँचने वाली होती है। अर्थात् अगर आप अकारण ही खुश और आनंद में रहते हैं तो आप अपने आस-पास मौजूद लोगों को भी अकारण ही ख़ुश और आनंदित बना देते हैं। इसलिए प्रतिदिन खुशी का इत्र अपने ऊपर छिड़कते रहें और स्वयं के साथ दूसरों को भी महकाते रहें।
    दोस्तों, रामू आज बहुत खुश और मस्त था, जो कि मेरे लिये दुनिया के आठवें आश्चर्य से कम नहीं था। मेरी नज़र में इसकी मुख्य वजह जीवन को देखने का उसका नज़रिया था। वह हर अच्छे से अच्छे कार्य में कुछ ना कुछ कमियाँ निकाल ही लेता था। उदाहरण के लिए मान लीजिए अचानक से कोई गाड़ी; आपकी गाड़ी के सामने आ गई और आपने समझदारी का परिचय देते हुए अपनी गाड़ी को ब्रेक लगा कर रोक लिया। अब रामू आपसे इस बात पर नाराज़ हो सकता है कि अगर ब्रेक लगाने पर गाड़ी नहीं रुकती और एक्सीडेंट हो जाता, तो आप क्या करते? अब आप समझ ही सकते हैं क्यों मेरे लिये रामू को खुश देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। मैंने तुरंत रामू से ख़ुशी का कारण पूछा तो पता चला कि आज उसने एक नई गाड़ी ख़रीदी है। मैंने तुरंत रामू को बधाई दी और मन ही मन सोचने लगा कि कुछ घंटों बाद रामू वापस पहले जैसा ही हो जाएगा क्योंकि आज भी उसकी ख़ुशी किसी वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर थी। साथियों, याद रखियेगा जब तक आपकी ख़ुशी किसी व्यक्ति, वस्तु या विशेष परिस्थिति पर निर्भर करती है, तब तक वह तात्कालिक होती है। अर्थात् जैसे ही वह व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति बदलेगी आपकी ख़ुशी भी चली जायेगी। दूसरे शब्दों में कहूँ तो जीवन में आप जब भी किसी विशेष कारण से खुश होंगे, उस कारण के मिटते ही आपको उतने ही दुख का अनुभव भी होगा। याने जो सुख किसी कारण से प्राप्त होता है, वह कारण के साथ ही समाप्त भी हो जाता है। इसके विपरीत दोस्तों अगर आप अकारण ही खुश रहने का अभ्यास कर लें, तो आप अपने पूरे जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। अगर आप इसे आध्यात्मिक नज़रिए से देखेंगे तो मैं कहूँगा कि हम ईश्वर की संतान है और कोई भी अपनी संतान को परेशान और दुखी नहीं देख सकता है। इसलिए हमारे जीवन में घटने वाली हर घटना के पीछे ईश्वर की मंशा हमें खुश रखने की होती है। लेकिन कई बार हम अपने नज़रिए के कारण उस ख़ुशी के कारण को अपने दुख का कारण बना लेते हैं। इससे बचने का एक ही उपाय है साथियों, ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव रखना। अगर आप जीवन में घटने वाली हर घटना को ईश्वर को ही अर्पित कर दें याने हर हाल में यह कहना शुरू कर दें, ‘जैसी मेरे प्रभु की इच्छा!’ या ‘ईश्वर जो करता हैं अच्छे के लिये करता है!’ अर्थात् कुछ मिले तो भी हरि इच्छा और ना मिले तो भी हरि इच्छा। यह भाव आपके अंदर दुख की उत्पत्ति नहीं होने देगा और आपको अकारण ही, हर हाल में, हर समय प्रसन्नता और आनंद की अनुभूति देगा। दोस्तों, यक़ीन मानियेगा उपरोक्त बात मैं आपको अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता रहा हूँ। मैंने अपने जीवन में ऐसी कई परिस्थितियों का सामना किया है जब सब कुछ ख़त्म नज़र आ रहा था। लेकिन बीतते समय और बदलते परिणाम के साथ मुझे एहसास हुआ कि जो कुछ घटा था वह मेरे जीवन को बेहतर बनाने के लिए ही घटा था। इसीलिए ‘आप कैसे हैं पूछने पर हर बार मेरा जवाब ‘मैं खुश हूँ!’ रहता है। वैसे दोस्तों, अकारण खुश या आनंदित रहने का एक और बड़ा फ़ायदा है। यह भी इत्र की तरह अपने आप फैलने याने एक से दूसरे तक अपने आप ही पहुँचने वाली होती है। अर्थात् अगर आप अकारण ही खुश और आनंद में रहते हैं तो आप अपने आस-पास मौजूद लोगों को भी अकारण ही ख़ुश और आनंदित बना देते हैं। इसलिए प्रतिदिन खुशी का इत्र अपने ऊपर छिड़कते रहें और स्वयं के साथ दूसरों को भी महकाते रहें।
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  • दोस्तों, मेरी नज़र में रिस्क ना लेना ही जीवन की सबसे बड़ी रिस्क है। अपनी बात को मैं आपको एक क़िस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ। वर्ष १४९२ में नाविकों के एक समूह ने बड़ी महत्वाकांक्षा के साथ एक साहसिक यात्रा करने का निर्णय लिया। नाविकों का पूरा का पूरा समूह इस साहसिक यात्रा के लिए काफ़ी उत्साहित और प्रसन्नचित्त था, सिवाय फ्रोज के, जो इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा की योजना सुनकर ही बुरी तरह डर गया था। उसे लग रहा था कि अनावश्यक रूप से क्यों जीवन को मुश्किल में डालकर इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा पर ज़ाया जाए? इसलिए उसने अन्य नाविकों के मन में भी समुद्री यात्रा के प्रति डर पैदा करने का निर्णय लिया।

    एक दिन फ्रोज की मुलाक़ात पिजारो से हो गई। अपनी योजना के मुताबिक़ फ्रोज ने पिजारो के मन में डर पैदा करने का निर्णय लिया और उससे पूछा, ‘मैंने सुना है तुम्हारे पिता एक बहुत ही अच्छे नाविक थे।’ पिजारो ने हाँ में सर हिलाया तो उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘फिर उनकी मृत्यु कैसे हुई थी?’ दुखी स्वर में पिजारो बोला, ‘एक समुद्री यात्रा के दौरान, असल में उनका जहाज़ एक भीषण समुद्री तूफ़ान के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।’ फ्रोज ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘और तुम्हारे दादाजी की मृत्यु कैसे हुई थी?’ ‘मेरे दादा और परदादा दोनों भी समुद्र में डूबने के कारण मरे थे।’, पिजारो दुखी होते हुए बोला।

    इतना सुनते ही फ्रोज कुटिल हंसी हंसते हुए बोला, ‘हद है पिजारो। तुम अपने अतीत, अपने अनुभव से भी सीखने को तैयार नहीं हो। जब तुम्हारे परिवार में इतने सारे लोगों की मृत्यु समुद्र में डूबने के कारण हुई है, तो फिर तुम यह अनावश्यक रिस्क क्यों लेना चाहते हो? मुझे तो तुम्हारी बुद्धि पर तरस आ रहा है। इतना सब कुछ होने के बाद भी तुम सुधरने को राज़ी नहीं हो और इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा के लिए हाँ कर अपने जीवन को मुश्किल में डाल रहे हो।

    इतना सुनते ही पिजारो समझ गया कि फ्रोज डर गया है और किसी ना किसी तरह यात्रा टालना चाहता है। उसने तुरंत ख़ुद को सँभालते हुए फ्रोज से पूछा, ‘अब तुम बताओ तुम्हारे पिता की मृत्यु कहाँ हुई थी?’ फ्रोज मुस्कुराते हुए बोला, ‘उन्होंने अपने बिस्तर पर बीड़ी आराम से अंतिम साँस ली थी।’ पिजारो ने फ्रोज को लगभग नज़रंदाज़ करते हुए अगला प्रश्न किया, ‘और तुम्हारे दादाजी की मृत्यु कैसे हुई थी?’ फ्रोज बड़े गर्व के साथ बोला, ‘प्रायः हमारे परिवार में सभी की मृत्यु अपने पलंग पर ही हुई है।’

    शायद पिजारो इसी जवाब के इंतज़ार में था। उसने तुरंत गंभीर रुख़ अपनाते हुए कहा, ‘जब तुम्हारे सभी पूर्वज घर पर अपने बिस्तर पर आराम से मरे है, तो फिर तुम अपने घर जाने और बिस्तर पर सोने की मूर्खता क्यों करते हो? क्या तुम्हें वही गलती दोहराते हुए डर नहीं लगता?’ पासा उलटता और बात का रुख़ अपनी ओर मुड़ता देख फ्रोज का चेहरा एकदम उतर गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए? उसी पल पिजारो ने फ्रोज के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से बोला, ‘मित्र, इस दुनिया में कायरों के लिए कहीं स्थान नहीं है क्योंकि ऐसी कोई जगह ही नहीं है जहां रिस्क ना हो। इसलिए अगर तुम ज़िंदगी के असली मज़े लेना चाहते हो, तो साहस के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करो।

    जी हाँ दोस्तों, बात तो एकदम सही है। इस दुनिया में ऐसी कोई चुनौती या परेशानी है ही नहीं, जिससे इंसान पार ना पा सके। बस ज़रूरत है तो आत्मविश्वास और हौसले की। याद रखियेगा, उपलब्धि जितनी बड़ी होगी; उसमें रिस्क या चुनौती भी उतनी ही बड़ी होगी। जब आप समस्याओं का सामना डट कर करते हैं तो वे छोटी हो जाती हैं और अगर आप उससे डर कर भागते हैं तो वो बड़ी हो जाती है। इसलिए अगर आप सफलता चाहते हैं तो हर स्थिति-परिस्थिति का सामना पूरे आत्मविश्वास, निडरता और हौसले के साथ डट कर करना शुरू कर दीजिए। वैसे भी वह सफलता ही क्या जो आसानी से मिल जाये। इसीलिए तो किसी ने क्या ख़ूब कहा है, ‘वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हो… नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धारायें प्रतिकूल न हो !!!
    दोस्तों, मेरी नज़र में रिस्क ना लेना ही जीवन की सबसे बड़ी रिस्क है। अपनी बात को मैं आपको एक क़िस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ। वर्ष १४९२ में नाविकों के एक समूह ने बड़ी महत्वाकांक्षा के साथ एक साहसिक यात्रा करने का निर्णय लिया। नाविकों का पूरा का पूरा समूह इस साहसिक यात्रा के लिए काफ़ी उत्साहित और प्रसन्नचित्त था, सिवाय फ्रोज के, जो इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा की योजना सुनकर ही बुरी तरह डर गया था। उसे लग रहा था कि अनावश्यक रूप से क्यों जीवन को मुश्किल में डालकर इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा पर ज़ाया जाए? इसलिए उसने अन्य नाविकों के मन में भी समुद्री यात्रा के प्रति डर पैदा करने का निर्णय लिया। एक दिन फ्रोज की मुलाक़ात पिजारो से हो गई। अपनी योजना के मुताबिक़ फ्रोज ने पिजारो के मन में डर पैदा करने का निर्णय लिया और उससे पूछा, ‘मैंने सुना है तुम्हारे पिता एक बहुत ही अच्छे नाविक थे।’ पिजारो ने हाँ में सर हिलाया तो उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘फिर उनकी मृत्यु कैसे हुई थी?’ दुखी स्वर में पिजारो बोला, ‘एक समुद्री यात्रा के दौरान, असल में उनका जहाज़ एक भीषण समुद्री तूफ़ान के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।’ फ्रोज ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘और तुम्हारे दादाजी की मृत्यु कैसे हुई थी?’ ‘मेरे दादा और परदादा दोनों भी समुद्र में डूबने के कारण मरे थे।’, पिजारो दुखी होते हुए बोला। इतना सुनते ही फ्रोज कुटिल हंसी हंसते हुए बोला, ‘हद है पिजारो। तुम अपने अतीत, अपने अनुभव से भी सीखने को तैयार नहीं हो। जब तुम्हारे परिवार में इतने सारे लोगों की मृत्यु समुद्र में डूबने के कारण हुई है, तो फिर तुम यह अनावश्यक रिस्क क्यों लेना चाहते हो? मुझे तो तुम्हारी बुद्धि पर तरस आ रहा है। इतना सब कुछ होने के बाद भी तुम सुधरने को राज़ी नहीं हो और इस दुस्साहसी और ख़तरनाक यात्रा के लिए हाँ कर अपने जीवन को मुश्किल में डाल रहे हो। इतना सुनते ही पिजारो समझ गया कि फ्रोज डर गया है और किसी ना किसी तरह यात्रा टालना चाहता है। उसने तुरंत ख़ुद को सँभालते हुए फ्रोज से पूछा, ‘अब तुम बताओ तुम्हारे पिता की मृत्यु कहाँ हुई थी?’ फ्रोज मुस्कुराते हुए बोला, ‘उन्होंने अपने बिस्तर पर बीड़ी आराम से अंतिम साँस ली थी।’ पिजारो ने फ्रोज को लगभग नज़रंदाज़ करते हुए अगला प्रश्न किया, ‘और तुम्हारे दादाजी की मृत्यु कैसे हुई थी?’ फ्रोज बड़े गर्व के साथ बोला, ‘प्रायः हमारे परिवार में सभी की मृत्यु अपने पलंग पर ही हुई है।’ शायद पिजारो इसी जवाब के इंतज़ार में था। उसने तुरंत गंभीर रुख़ अपनाते हुए कहा, ‘जब तुम्हारे सभी पूर्वज घर पर अपने बिस्तर पर आराम से मरे है, तो फिर तुम अपने घर जाने और बिस्तर पर सोने की मूर्खता क्यों करते हो? क्या तुम्हें वही गलती दोहराते हुए डर नहीं लगता?’ पासा उलटता और बात का रुख़ अपनी ओर मुड़ता देख फ्रोज का चेहरा एकदम उतर गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए? उसी पल पिजारो ने फ्रोज के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से बोला, ‘मित्र, इस दुनिया में कायरों के लिए कहीं स्थान नहीं है क्योंकि ऐसी कोई जगह ही नहीं है जहां रिस्क ना हो। इसलिए अगर तुम ज़िंदगी के असली मज़े लेना चाहते हो, तो साहस के साथ प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करो। जी हाँ दोस्तों, बात तो एकदम सही है। इस दुनिया में ऐसी कोई चुनौती या परेशानी है ही नहीं, जिससे इंसान पार ना पा सके। बस ज़रूरत है तो आत्मविश्वास और हौसले की। याद रखियेगा, उपलब्धि जितनी बड़ी होगी; उसमें रिस्क या चुनौती भी उतनी ही बड़ी होगी। जब आप समस्याओं का सामना डट कर करते हैं तो वे छोटी हो जाती हैं और अगर आप उससे डर कर भागते हैं तो वो बड़ी हो जाती है। इसलिए अगर आप सफलता चाहते हैं तो हर स्थिति-परिस्थिति का सामना पूरे आत्मविश्वास, निडरता और हौसले के साथ डट कर करना शुरू कर दीजिए। वैसे भी वह सफलता ही क्या जो आसानी से मिल जाये। इसीलिए तो किसी ने क्या ख़ूब कहा है, ‘वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हो… नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धारायें प्रतिकूल न हो !!!
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  • दोस्तों, आप सब ने सुना ही होगा कि प्रकृति के नियम पूर्णतः शाश्वत होते हैं और इस दुनिया में सब कुछ उन नियमों के अनुसार ही घटित होता है। अर्थात् प्रकृति कभी भी अपने नियमों के विरुद्ध जाकर कार्य नहीं करती है। यही बात ठीक इसी तरह से इंसानों पर भी लागू होती है क्योंकि हम सब भी इसी प्रकृति के हिस्से हैं। उदाहरण के लिए आप किसी भी पेड़-पौधे को देख लीजिए। जिसे समय पर खाद, पानी, रोशनी और सकारात्मक माहौल मिलता है, वह पेड़ या पौधा अपने-आप ही तेज़ी से बढ़ता है; सदैव हरा-भरा रहता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो अगर आप किसी पौधे को समय से खाद-पानी देते रहते हैं तो वह अपने आप ही फलने-फूलने लगता है और यदि आप उसकी उपेक्षा करना शुरू कर देते हैं तो वह जल्द ही मुरझाने लगता है। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ कि हम इस प्रकृति को जैसा रखते हैं यह वैसी ही बनने लगती है। इसीलिए कहा जाता है, ‘जिन लोगों ने इस दुनिया को स्वर्ग माना, उनके लिए प्रकृति ने इस दुनिया को उन लोगों के अच्छे कार्यों से स्वर्ग बना दिया।

    हो सकता है साथियों, आपको मेरी बात कुछ अधूरी या अतिशयोक्ति पूर्ण लग रही हो क्योंकि प्रकृति के नियमों को शब्दों में बांधना मेरी क्षमताओं के परे है। इसलिए अपनी बात को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। इस दुनिया में वे लोग सुगंधित वातावरण में रहते हैं जो लोग फूलों की खेती किया करते हैं। ठीक इसी तरह, इस दुनिया में उन लोगों को मीठे फल अपने आप ही मिल ज़ाया करते हैं जो फलों के पेड़ लगाने का परिश्रम करते हैं। अब अगर हम प्रकृति के नियम के आधार पर उपरोक्त बात को समझने का प्रयास करें तो इसका अर्थ हुआ इच्छा या अनिच्छा के साथ जो बीज आपने बोए हैं उसके फल इच्छा या अनिच्छा होने के बाद भी आपको मिलने वाले ही हैं। अर्थात् जैसा बीज आप ने बोया है प्रकृति उसी के अनुसार आपको फल देने वाली है।

    दोस्तों, उपरोक्त कथन बच्चों के लालन-पालन के संदर्भ में भी सौ प्रतिशत इसी तरह कार्य करता है। जिस तरह सिर्फ़ सोचने भर से बीज से कोई फलदायी पेड़ नहीं बनता है। उसके लिए हमें बीज बोन के बाद उसे सही समय पर खाद-पानी देना पड़ता है ठीक उसी तरह सोचने भर से बच्चों को एक अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता है। उसके लिए आपको सही समय पर संस्कार, सही-ग़लत आदि बातों को सिखाना होगा और उसे भटकने से बचाना होगा।

    प्रकृति का यह नियम साथियों, सभी के लिये समान रूप से काम करता है, फिर विषय कोई भी क्यों ना हो। इस दुनिया में सिर्फ़ चाहने मात्र से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। आज तक आपको आपके जीवन में जो भी प्राप्त हुआ है और आने वाले समय में जो भी प्राप्त होगा वह निश्चित तौर पर आपके द्वारा किए गये कर्मों का परिणाम ही होगा। इसे आप कर्मों के एवज़ में दिया गया प्रकृति का उपहार भी मान सकते हैं।

    प्रकृति के इस नियम से साथियों हम अपने जीवन को महका सकते हैं। इसके लिए बस आपको समाज को देते हुए जीवन में आगे बढ़ना है। अर्थात् समाज को बेहतर बनाने के लिए या इस दुनिया को बेहतरीन बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए आगे बढ़ना है। बस फिर देखियेगा यह समाज, यह दुनिया आपके जीवन को कैसे बेहतर बनाती है; किस तरह महकाती है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे दूसरों पर इत्र लगाने से ख़ुद के हाथ भी इत्र की ख़ुशबू से महकने लगते हैं। तो आइए साथियों, आज से अपने जीवन को महकाने के लिए प्रकृति के इस सुंदर से नियम का पालन करते हैं।
    दोस्तों, आप सब ने सुना ही होगा कि प्रकृति के नियम पूर्णतः शाश्वत होते हैं और इस दुनिया में सब कुछ उन नियमों के अनुसार ही घटित होता है। अर्थात् प्रकृति कभी भी अपने नियमों के विरुद्ध जाकर कार्य नहीं करती है। यही बात ठीक इसी तरह से इंसानों पर भी लागू होती है क्योंकि हम सब भी इसी प्रकृति के हिस्से हैं। उदाहरण के लिए आप किसी भी पेड़-पौधे को देख लीजिए। जिसे समय पर खाद, पानी, रोशनी और सकारात्मक माहौल मिलता है, वह पेड़ या पौधा अपने-आप ही तेज़ी से बढ़ता है; सदैव हरा-भरा रहता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो अगर आप किसी पौधे को समय से खाद-पानी देते रहते हैं तो वह अपने आप ही फलने-फूलने लगता है और यदि आप उसकी उपेक्षा करना शुरू कर देते हैं तो वह जल्द ही मुरझाने लगता है। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ कि हम इस प्रकृति को जैसा रखते हैं यह वैसी ही बनने लगती है। इसीलिए कहा जाता है, ‘जिन लोगों ने इस दुनिया को स्वर्ग माना, उनके लिए प्रकृति ने इस दुनिया को उन लोगों के अच्छे कार्यों से स्वर्ग बना दिया। हो सकता है साथियों, आपको मेरी बात कुछ अधूरी या अतिशयोक्ति पूर्ण लग रही हो क्योंकि प्रकृति के नियमों को शब्दों में बांधना मेरी क्षमताओं के परे है। इसलिए अपनी बात को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। इस दुनिया में वे लोग सुगंधित वातावरण में रहते हैं जो लोग फूलों की खेती किया करते हैं। ठीक इसी तरह, इस दुनिया में उन लोगों को मीठे फल अपने आप ही मिल ज़ाया करते हैं जो फलों के पेड़ लगाने का परिश्रम करते हैं। अब अगर हम प्रकृति के नियम के आधार पर उपरोक्त बात को समझने का प्रयास करें तो इसका अर्थ हुआ इच्छा या अनिच्छा के साथ जो बीज आपने बोए हैं उसके फल इच्छा या अनिच्छा होने के बाद भी आपको मिलने वाले ही हैं। अर्थात् जैसा बीज आप ने बोया है प्रकृति उसी के अनुसार आपको फल देने वाली है। दोस्तों, उपरोक्त कथन बच्चों के लालन-पालन के संदर्भ में भी सौ प्रतिशत इसी तरह कार्य करता है। जिस तरह सिर्फ़ सोचने भर से बीज से कोई फलदायी पेड़ नहीं बनता है। उसके लिए हमें बीज बोन के बाद उसे सही समय पर खाद-पानी देना पड़ता है ठीक उसी तरह सोचने भर से बच्चों को एक अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता है। उसके लिए आपको सही समय पर संस्कार, सही-ग़लत आदि बातों को सिखाना होगा और उसे भटकने से बचाना होगा। प्रकृति का यह नियम साथियों, सभी के लिये समान रूप से काम करता है, फिर विषय कोई भी क्यों ना हो। इस दुनिया में सिर्फ़ चाहने मात्र से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। आज तक आपको आपके जीवन में जो भी प्राप्त हुआ है और आने वाले समय में जो भी प्राप्त होगा वह निश्चित तौर पर आपके द्वारा किए गये कर्मों का परिणाम ही होगा। इसे आप कर्मों के एवज़ में दिया गया प्रकृति का उपहार भी मान सकते हैं। प्रकृति के इस नियम से साथियों हम अपने जीवन को महका सकते हैं। इसके लिए बस आपको समाज को देते हुए जीवन में आगे बढ़ना है। अर्थात् समाज को बेहतर बनाने के लिए या इस दुनिया को बेहतरीन बनाने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए आगे बढ़ना है। बस फिर देखियेगा यह समाज, यह दुनिया आपके जीवन को कैसे बेहतर बनाती है; किस तरह महकाती है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे दूसरों पर इत्र लगाने से ख़ुद के हाथ भी इत्र की ख़ुशबू से महकने लगते हैं। तो आइए साथियों, आज से अपने जीवन को महकाने के लिए प्रकृति के इस सुंदर से नियम का पालन करते हैं।
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  • लक्ष्य छोटा हो या बड़ा, तब तक हर हाल में हक़ीक़त में बदला जा सकता है, जब तक राह में मिलने वाली छोटी या बड़ी असफलता को आप अंतिम परिणाम मान कर, कर्म करना या मेहनत करना बंद ना कर दें। यही वह सबसे बड़ी सीख है जो हमें इसरो के चंद्रयान-३ के सफल मिशन से सीखने को मिलती है। जी हाँ साथियों, आज इस असंभव से लगने वाले मिशन, जिसमें हम पूर्व में असफल रहे थे, को इसरो ने सफल मिशन बनाने के साथ ब्रह्मांडीय विस्तार की शांति में, सदियों पुराना, हम में से हर किसी का सपना साकार किया है। हर भारतीय को गर्व करने का एक नायाब मौक़ा दिया है। इस कॉलम के माध्यम से मैं सबसे पहले तो टीम इसरो, सभी वैज्ञानिकों और परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इस अभियान में सहयोग करने वाले सभी लोगों को बधाई, आगामी योजनाओं के लिए शुभकामनाएँ और साथ ही सभी देशवासियों में गर्व आधारित राष्ट्रवाद पैदा करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

    दोस्तों, यह चार साल के अथक प्रयास का सफल नतीजा था, जो कुछ असफलताओं के बाद मिला था। यह एक ऐसा मिशन था जिस पर पूरी दुनिया ने साँस रोक कर अपनी नज़र गड़ा रखी थी। इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता महत्वाकांक्षा, प्रौद्योगिकी, समर्पण, दृढ़ इच्छाशक्ति, टीम भावना, मानवीय सरलता और अथक प्रयास जैसी कई विशेषताओं का मिश्रण था। अगर आप बारीकी से देखेंगे तो पायेंगे कि यह; सोच से योजना याने धरती से प्रक्षेपण से लेकर चंद्रमा पर लैंडिंग तक क्रियान्वयन और साथ ही निगरानी व डायनैमिक योजना का सम्मिश्रण था। जिसमें कई बार मानवीय दुस्साहस के साथ असंभव को संभव बनाया था। जिसने संपूर्ण मानव जगत को सितारों से आगे जाने के लिए प्रेरित किया। असल में यह मिशन हर पल असाधारण की ओर बढ़ते हुए कदम का एक प्रतीक था।

    ऐसी एक सफलता दोस्तों, आपके जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकती है। अगर आप इस सफल अभियान से सीखने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि सबसे पहले सिर्फ़ एक छोटे से विचार को लक्ष्य बनाया। जो अपने आप में ही देखने-सुनने में असंभव सा लगता था। इसके पश्चात महीनों तक इस एक विचार पर गंभीरता पूर्वक रिसर्च की गई और फिर सावधानीपूर्वक छोटी से छोटी बात का ख़्याल रखते हुए योजना बनाई। योजना के विभिन्न पहलुओं के आधार पर टीम चुनी और फिर उन सभी को यह एहसास करवाया गया कि हम सब मिलकर इस असंभव से लक्ष्य को संभव बना सकते हैं और इतिहास रच सकते हैं। इसके पश्चात इस बड़े लक्ष्य को योजनाबद्ध तरीक़े से छोटे-छोटे चरणों याने लक्ष्यों में बाँटा गया और फिर उसकी ज़िम्मेदारी संबंधित टीम को दी गई। इसके पश्चात हर टीम ने बताई गई योजना के आधार पर अथक प्रयास शुरू किए और बताये गये छोटे लक्ष्यों को तय पैमाने पर समय सीमा में पूरा किया। हालाँकि इतना सब करने के बाद भी कुछ शुरुआती असफलताएँ इस टीम के हिस्से में आई जिसे उन्होंने सीख में बदला और फिर योजना में सुधार कर एक बार फिर से प्रयास किया। जिसका नतीजा साथियों हम सभी ने अगस्त २३, २०२३ की शाम ६ बजकर ४ मिनिट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चन्द्रयान ३ को सफलता पूर्वक उतरते हुए देखा।

    मेरी नज़र में यह जीत सिर्फ़ भारत की प्रौद्योगिकी सफलता का नतीजा नहीं है बल्कि यह तो उस अडिग भावना की भी है, जिसने इस अभियान को पल-पल आगे बढ़ाया। आप स्वयं सोच कर देखिए साथियों, १४ जुलाई २०२३ को ३ बजकर ३५ मिनिट पर आन्ध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा से लॉन्च करने के बाद ४१ दिनों में ३ लाख ८४हज़ार किलोमीटर की यह यात्रा कितने पड़ावों और उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए प्लान और क्रियान्वित की गई होगी। जिसने चंद्रमा, जो कभी रात के आकाश में दूर, चांदी के गोले सा प्रतीत होता था, को अब मानव प्रयास का प्रतिबिंब बना दिया है, जहां भारत का झंडा शान से लहरा रहा है। यह एक राष्ट्र की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गया है, जिसमें सदियों से अछूते चंद्रमा पर मानवता की ज्ञान की खोज के पदचिह्नों की छाप को छोड़ा है। दोस्तों अगर आप जीवन में कोई बड़ा सपना सच करना चाहते हैं तो इस अभियान से सीख लें और उपरोक्त आधार पर अपने अभियान की योजना बनायें और सफल बनें। एक बार फिर इस अविस्मरणीय सफलता की ढेरों बधाइयाँ।
    लक्ष्य छोटा हो या बड़ा, तब तक हर हाल में हक़ीक़त में बदला जा सकता है, जब तक राह में मिलने वाली छोटी या बड़ी असफलता को आप अंतिम परिणाम मान कर, कर्म करना या मेहनत करना बंद ना कर दें। यही वह सबसे बड़ी सीख है जो हमें इसरो के चंद्रयान-३ के सफल मिशन से सीखने को मिलती है। जी हाँ साथियों, आज इस असंभव से लगने वाले मिशन, जिसमें हम पूर्व में असफल रहे थे, को इसरो ने सफल मिशन बनाने के साथ ब्रह्मांडीय विस्तार की शांति में, सदियों पुराना, हम में से हर किसी का सपना साकार किया है। हर भारतीय को गर्व करने का एक नायाब मौक़ा दिया है। इस कॉलम के माध्यम से मैं सबसे पहले तो टीम इसरो, सभी वैज्ञानिकों और परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इस अभियान में सहयोग करने वाले सभी लोगों को बधाई, आगामी योजनाओं के लिए शुभकामनाएँ और साथ ही सभी देशवासियों में गर्व आधारित राष्ट्रवाद पैदा करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। दोस्तों, यह चार साल के अथक प्रयास का सफल नतीजा था, जो कुछ असफलताओं के बाद मिला था। यह एक ऐसा मिशन था जिस पर पूरी दुनिया ने साँस रोक कर अपनी नज़र गड़ा रखी थी। इस मिशन की सबसे बड़ी विशेषता महत्वाकांक्षा, प्रौद्योगिकी, समर्पण, दृढ़ इच्छाशक्ति, टीम भावना, मानवीय सरलता और अथक प्रयास जैसी कई विशेषताओं का मिश्रण था। अगर आप बारीकी से देखेंगे तो पायेंगे कि यह; सोच से योजना याने धरती से प्रक्षेपण से लेकर चंद्रमा पर लैंडिंग तक क्रियान्वयन और साथ ही निगरानी व डायनैमिक योजना का सम्मिश्रण था। जिसमें कई बार मानवीय दुस्साहस के साथ असंभव को संभव बनाया था। जिसने संपूर्ण मानव जगत को सितारों से आगे जाने के लिए प्रेरित किया। असल में यह मिशन हर पल असाधारण की ओर बढ़ते हुए कदम का एक प्रतीक था। ऐसी एक सफलता दोस्तों, आपके जीवन को पूर्णता प्रदान कर सकती है। अगर आप इस सफल अभियान से सीखने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि सबसे पहले सिर्फ़ एक छोटे से विचार को लक्ष्य बनाया। जो अपने आप में ही देखने-सुनने में असंभव सा लगता था। इसके पश्चात महीनों तक इस एक विचार पर गंभीरता पूर्वक रिसर्च की गई और फिर सावधानीपूर्वक छोटी से छोटी बात का ख़्याल रखते हुए योजना बनाई। योजना के विभिन्न पहलुओं के आधार पर टीम चुनी और फिर उन सभी को यह एहसास करवाया गया कि हम सब मिलकर इस असंभव से लक्ष्य को संभव बना सकते हैं और इतिहास रच सकते हैं। इसके पश्चात इस बड़े लक्ष्य को योजनाबद्ध तरीक़े से छोटे-छोटे चरणों याने लक्ष्यों में बाँटा गया और फिर उसकी ज़िम्मेदारी संबंधित टीम को दी गई। इसके पश्चात हर टीम ने बताई गई योजना के आधार पर अथक प्रयास शुरू किए और बताये गये छोटे लक्ष्यों को तय पैमाने पर समय सीमा में पूरा किया। हालाँकि इतना सब करने के बाद भी कुछ शुरुआती असफलताएँ इस टीम के हिस्से में आई जिसे उन्होंने सीख में बदला और फिर योजना में सुधार कर एक बार फिर से प्रयास किया। जिसका नतीजा साथियों हम सभी ने अगस्त २३, २०२३ की शाम ६ बजकर ४ मिनिट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चन्द्रयान ३ को सफलता पूर्वक उतरते हुए देखा। मेरी नज़र में यह जीत सिर्फ़ भारत की प्रौद्योगिकी सफलता का नतीजा नहीं है बल्कि यह तो उस अडिग भावना की भी है, जिसने इस अभियान को पल-पल आगे बढ़ाया। आप स्वयं सोच कर देखिए साथियों, १४ जुलाई २०२३ को ३ बजकर ३५ मिनिट पर आन्ध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा से लॉन्च करने के बाद ४१ दिनों में ३ लाख ८४हज़ार किलोमीटर की यह यात्रा कितने पड़ावों और उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए प्लान और क्रियान्वित की गई होगी। जिसने चंद्रमा, जो कभी रात के आकाश में दूर, चांदी के गोले सा प्रतीत होता था, को अब मानव प्रयास का प्रतिबिंब बना दिया है, जहां भारत का झंडा शान से लहरा रहा है। यह एक राष्ट्र की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गया है, जिसमें सदियों से अछूते चंद्रमा पर मानवता की ज्ञान की खोज के पदचिह्नों की छाप को छोड़ा है। दोस्तों अगर आप जीवन में कोई बड़ा सपना सच करना चाहते हैं तो इस अभियान से सीख लें और उपरोक्त आधार पर अपने अभियान की योजना बनायें और सफल बनें। एक बार फिर इस अविस्मरणीय सफलता की ढेरों बधाइयाँ।
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  • आइये साथियों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। गौतम बुद्ध से दीक्षित होकर एक राजकुमार, भिक्षुक के रूप में अपना नया जीवन शुरू करने ही वाला था कि एक दिन गौतम बुद्ध ने उसे अपनी एक शिष्या के घर से भिक्षा लाने का कहा। भिक्षा लेने के लिये जाते वक़्त उसके मन में ख़याल आया कि अब तो मुझे अपना प्रिय भोजन शायद ही कभी खाने के लिए मिलेगा। लेकिन जैसे ही वह शिष्या के घर पहुँचा तो वहाँ उसने पूरा भोजन अपनी पसंद का पाया। वह शुरू में तो बहुत हैरान हुआ लेकिन जल्द ही सोचने लगा कि शायद संयोगवश ऐसा हो गया होगा। उसने भरपेट भोजन करा और सोचने लगा कि पहले तो मैं रोज़ भोजन के पश्चात कुछ देर आराम किया करता था लेकिन आज तो मुझे धूप में ही वापस जाना पड़ेगा। जिस पल उसके मन में यह विचार था उसी समय वह शिष्या बोली, ‘भिक्षु अगर आप मेरे यहाँ दो घड़ी विश्राम कर लेंगे तो बड़ी अनुकंपा होगी।’ इतना सुनते ही भिक्षुक चौंक गया और सोचने लगा कि मेरे मन की बात इसे कैसे पता चल रही है? फिर अगले ही पल ख़ुद को समझाने लगा कि संयोगवश उसने ऐसा कह दिया होगा।

    अगले ही पल भिक्षु उस शिष्या की बिछाई चटाई पर लेट गया और सोचने लगा, ‘अब ना तो कोई अपना ठिकाना है और ना ही कोई बिछौना। अब तो बस रोज़ आकाश अपना छप्पर है और ज़मीन बिछौना।’ उसके इतना सोचते ही वह शिष्या बोली, ‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं?’ उसके इतना कहते ही भिक्षुक चौंक कर बैठ गये और बोले, ‘क्या मेरे विचार आप तक पहुँच रहे हैं?’ मुस्कुराते हुए शिष्या बोली, ‘निश्चित ही!’ उसके इतना कहते ही भिक्षुक की हालत पतली हो गई। उसके मन में एक ही पल में अभी तक सोची गई हर बात घूम गई।वह भिक्षुक घबरा कर खड़ा हो गया और काँपते हुए बोला, ‘कृपया मुझे आज्ञा दें।’ शिष्या मुस्कुराई और बोली, ‘आप इतना घबरा क्यों रहे हैं? यह सब तो सामान्य है।’ इतना सुनते ही भिक्षुक बिना कुछ कहे वहाँ से लौट गया और आश्रम पहुँचते ही बुद्ध से बोला, ‘महात्मन, क्षमा करें, अब मैं कभी उस द्वार भिक्षा माँगने जा ना सकूँगा।’ बुद्ध पूर्ण गंभीरता के साथ बोले, ‘क्यों? ऐसा क्या हो गया? उनसे कुछ चूक हो गई क्या?’

    इतना सुनते ही भिक्षुक बोला, ‘नहीं-नहीं ऐसा तो वहाँ कुछ नहीं हुआ। उन्होंने तो बल्कि बहुत आदर पूर्वक बहुत स्वादिष्ट भोजन करवाया और साथ ही भोजन पश्चात आराम करने की व्यवस्था भी करी। बस समस्या इतनी सी है कि वह युवती दूसरों के मन के विचार पढ़ लेती है। यह बहुत ख़तरनाक बात है क्योंकि उस सुंदर युवती को देख मेरे मन में कामवासना भी उठी थी और साथ ही विकार भी उठा था। निश्चित तौर पर उसने इन विचारों को भी पढ़ लिया होगा। अब मैं किस मुँह से उसके सामने जाऊँ? क्षमा करें गुरुदेव अब मैं उसके यहाँ नहीं जा पाऊँगा।’ इतना सुनते ही बुद्ध पूर्ण गंभीर हो गये और बोले, ‘वहीं जाना पड़ेगा वत्स क्योंकि अगर इस तरह क्षमा माँगनी थी तो भिक्षुक नहीं बनना था। मैंने तुम्हें वहाँ जान कर भेजा था। अब जब तक मैं मना ना कर दूँ तब तक तुम्हें वहाँ रोज़ जाना पड़ेगा। यही तुम्हारी असली साधना होगी। वहाँ जाते वक़्त बस होश में रहना, भीतर से भी जागे हुए रहना और देखते हुए जाना कि रास्ते में कौन से विचार उठ रहे हैं। उन विचारों से लड़ना मत… उन्हें रोकना भी मत… बल्कि मैं तो कहूँगा, कुछ करना भी मत… बस जागे रहना और देखते रहना कि भीतर क्या उठ रहा है और क्या नहीं।’

    अगले दिन उस भिक्षुक को पहले से ही संभावित ख़तरे का अंदेशा था। उसे पता था कि मन में एक भी ग़लत विचार आया तो वह शिक्षिका सब पढ़ लेगी। इसलिए आज वह पूरी तरह अंदर और बाहर दोनों जगह से जागा हुआ चल रहा था। आज असल में वह पूरी तरह होश में था। उसे आज विचारों के साथ-साथ आती जाती स्वाँस भी महसूस हो रही थी और यह स्थिति धीरे-धीरे उसे पूर्ण शांति की ओर ले जा रही थी। इसीलिये शिष्या के घर पहुँचने के बाद, भोजन और भोजन पश्चात आराम के दौरान भी वह अंदर से पूरी तरह शांत था। उस दिन भिक्षा के पश्चात वह भिक्षुक नाचता हुआ वापस लौटा।

    जानते हैं क्यों दोस्तों? क्योंकि अंदर से जागा हुआ रहने के कारण आज उसके अंदर कोई विचार, वासना या इच्छा नहीं थी। उसका मन पूरी तरह शांत था, उसके अंदर कुछ भी नहीं था क्योंकि आज उसकी सभी इंद्रियाँ उसके वश में थी। दोस्तों, जिस दिन आप पूरी तरह अंदर और बाहर, दोनों तरीक़े से, जागृत रहते हुए जीना सीख जाते हैं, उसी दिन आपके जीवन के सारे क्लेश मिट जाते हैं और आप विवेक पूर्ण जीवन जीना शुरू कर देते हैं। इसे ही साथियों चैतन्य अवस्था में जीना कहा जाता है। आइये, आज से ही हम सभी इसे अपने जीवन में उतारते हैं क्योंकि शांत, संतुष्ट, खुश रहते हुए जीवन जीने का यही एकमात्र तरीक़ा है।
    आइये साथियों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। गौतम बुद्ध से दीक्षित होकर एक राजकुमार, भिक्षुक के रूप में अपना नया जीवन शुरू करने ही वाला था कि एक दिन गौतम बुद्ध ने उसे अपनी एक शिष्या के घर से भिक्षा लाने का कहा। भिक्षा लेने के लिये जाते वक़्त उसके मन में ख़याल आया कि अब तो मुझे अपना प्रिय भोजन शायद ही कभी खाने के लिए मिलेगा। लेकिन जैसे ही वह शिष्या के घर पहुँचा तो वहाँ उसने पूरा भोजन अपनी पसंद का पाया। वह शुरू में तो बहुत हैरान हुआ लेकिन जल्द ही सोचने लगा कि शायद संयोगवश ऐसा हो गया होगा। उसने भरपेट भोजन करा और सोचने लगा कि पहले तो मैं रोज़ भोजन के पश्चात कुछ देर आराम किया करता था लेकिन आज तो मुझे धूप में ही वापस जाना पड़ेगा। जिस पल उसके मन में यह विचार था उसी समय वह शिष्या बोली, ‘भिक्षु अगर आप मेरे यहाँ दो घड़ी विश्राम कर लेंगे तो बड़ी अनुकंपा होगी।’ इतना सुनते ही भिक्षुक चौंक गया और सोचने लगा कि मेरे मन की बात इसे कैसे पता चल रही है? फिर अगले ही पल ख़ुद को समझाने लगा कि संयोगवश उसने ऐसा कह दिया होगा। अगले ही पल भिक्षु उस शिष्या की बिछाई चटाई पर लेट गया और सोचने लगा, ‘अब ना तो कोई अपना ठिकाना है और ना ही कोई बिछौना। अब तो बस रोज़ आकाश अपना छप्पर है और ज़मीन बिछौना।’ उसके इतना सोचते ही वह शिष्या बोली, ‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं?’ उसके इतना कहते ही भिक्षुक चौंक कर बैठ गये और बोले, ‘क्या मेरे विचार आप तक पहुँच रहे हैं?’ मुस्कुराते हुए शिष्या बोली, ‘निश्चित ही!’ उसके इतना कहते ही भिक्षुक की हालत पतली हो गई। उसके मन में एक ही पल में अभी तक सोची गई हर बात घूम गई।वह भिक्षुक घबरा कर खड़ा हो गया और काँपते हुए बोला, ‘कृपया मुझे आज्ञा दें।’ शिष्या मुस्कुराई और बोली, ‘आप इतना घबरा क्यों रहे हैं? यह सब तो सामान्य है।’ इतना सुनते ही भिक्षुक बिना कुछ कहे वहाँ से लौट गया और आश्रम पहुँचते ही बुद्ध से बोला, ‘महात्मन, क्षमा करें, अब मैं कभी उस द्वार भिक्षा माँगने जा ना सकूँगा।’ बुद्ध पूर्ण गंभीरता के साथ बोले, ‘क्यों? ऐसा क्या हो गया? उनसे कुछ चूक हो गई क्या?’ इतना सुनते ही भिक्षुक बोला, ‘नहीं-नहीं ऐसा तो वहाँ कुछ नहीं हुआ। उन्होंने तो बल्कि बहुत आदर पूर्वक बहुत स्वादिष्ट भोजन करवाया और साथ ही भोजन पश्चात आराम करने की व्यवस्था भी करी। बस समस्या इतनी सी है कि वह युवती दूसरों के मन के विचार पढ़ लेती है। यह बहुत ख़तरनाक बात है क्योंकि उस सुंदर युवती को देख मेरे मन में कामवासना भी उठी थी और साथ ही विकार भी उठा था। निश्चित तौर पर उसने इन विचारों को भी पढ़ लिया होगा। अब मैं किस मुँह से उसके सामने जाऊँ? क्षमा करें गुरुदेव अब मैं उसके यहाँ नहीं जा पाऊँगा।’ इतना सुनते ही बुद्ध पूर्ण गंभीर हो गये और बोले, ‘वहीं जाना पड़ेगा वत्स क्योंकि अगर इस तरह क्षमा माँगनी थी तो भिक्षुक नहीं बनना था। मैंने तुम्हें वहाँ जान कर भेजा था। अब जब तक मैं मना ना कर दूँ तब तक तुम्हें वहाँ रोज़ जाना पड़ेगा। यही तुम्हारी असली साधना होगी। वहाँ जाते वक़्त बस होश में रहना, भीतर से भी जागे हुए रहना और देखते हुए जाना कि रास्ते में कौन से विचार उठ रहे हैं। उन विचारों से लड़ना मत… उन्हें रोकना भी मत… बल्कि मैं तो कहूँगा, कुछ करना भी मत… बस जागे रहना और देखते रहना कि भीतर क्या उठ रहा है और क्या नहीं।’ अगले दिन उस भिक्षुक को पहले से ही संभावित ख़तरे का अंदेशा था। उसे पता था कि मन में एक भी ग़लत विचार आया तो वह शिक्षिका सब पढ़ लेगी। इसलिए आज वह पूरी तरह अंदर और बाहर दोनों जगह से जागा हुआ चल रहा था। आज असल में वह पूरी तरह होश में था। उसे आज विचारों के साथ-साथ आती जाती स्वाँस भी महसूस हो रही थी और यह स्थिति धीरे-धीरे उसे पूर्ण शांति की ओर ले जा रही थी। इसीलिये शिष्या के घर पहुँचने के बाद, भोजन और भोजन पश्चात आराम के दौरान भी वह अंदर से पूरी तरह शांत था। उस दिन भिक्षा के पश्चात वह भिक्षुक नाचता हुआ वापस लौटा। जानते हैं क्यों दोस्तों? क्योंकि अंदर से जागा हुआ रहने के कारण आज उसके अंदर कोई विचार, वासना या इच्छा नहीं थी। उसका मन पूरी तरह शांत था, उसके अंदर कुछ भी नहीं था क्योंकि आज उसकी सभी इंद्रियाँ उसके वश में थी। दोस्तों, जिस दिन आप पूरी तरह अंदर और बाहर, दोनों तरीक़े से, जागृत रहते हुए जीना सीख जाते हैं, उसी दिन आपके जीवन के सारे क्लेश मिट जाते हैं और आप विवेक पूर्ण जीवन जीना शुरू कर देते हैं। इसे ही साथियों चैतन्य अवस्था में जीना कहा जाता है। आइये, आज से ही हम सभी इसे अपने जीवन में उतारते हैं क्योंकि शांत, संतुष्ट, खुश रहते हुए जीवन जीने का यही एकमात्र तरीक़ा है।
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  • दोस्तों, इस दुनिया में और ज़्यादा पाने की लालसा एक ऐसा भाव है जो अक्सर आपके पास जो होता है उसका सुख भोगने से वंचित कर देता है और आपको हमेशा अधूरेपन के भाव के साथ जीने के लिये मजबूर करता है। अपनी बात को मैं हाल ही में घटी एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ। कुछ माह पूर्व मध्यप्रदेश के एक छोटे से क़स्बे में मेरी मुलाक़ात एक बुजुर्ग सज्जन से उस वक़्त हुई जब मैं एक विद्यालय संचालक के साथ कुछ चर्चा कर रहा था। बातचीत के तौर-तरीक़े और देखने में वे बुजुर्ग सज्जन बड़े सभ्रांत, गंभीर, ज्ञानी लेकिन परिस्थिति के मारे, बेचैन और दुखी प्रतीत हो रहे थे। उनके जाने के पश्चात जब मैंने उनके विषय में स्कूल संचालक से बात करी तो उन्होंने बताया कि वे प्राचार्य के लिये किराए पर लिये गये घर के मालिक हैं और पारिस्थितिक कारणों से आजकल भावनात्मक और मानसिक परेशानियों के साथ-साथ आर्थिक तंगी के दौर से भी गुजर रहे हैं।

    व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनके विषय में सुनकर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा और मैं सोचने लगा कि पूरे जीवन की कमाई जिस घर को बनाने में लगाई उसी घर के मज़े वे जीवन के इस पड़ाव पर नहीं ले पा रहे हैं और तमाम दिक़्क़तों के दौर से गुजर रहे हैं। ख़ैर, उस वक़्त तो मैं ऐसे कई विचार मन में लिये वापस अपने शहर आ गया और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। एक सप्ताह पूर्व मुझे यह घटना एक बार फिर दुबारा याद आई जब इंदौर में मेरी मुलाक़ात एक बार फिर उसी विद्यालय के संचालक से हो गई। सामान्य बातचीत के बाद मैंने उत्सुकतावश जब उन बुजुर्ग व्यक्ति के हालचाल पूछे तो मैं यह जानकर अचंभित रह गया कि कुछ दिन पूर्व वे ब्रह्मलीन हो गये।

    कुछ पलों के लिये तो मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं किस तरह रिएक्ट करूँ। कुछ पलों पश्चात अचानक ही मेरे मुँह से निकाला, ‘चलो अच्छा हुआ, वे सारी परेशानियों से आज़ाद हो गये।’ मेरी बात सुनते ही विद्यालय संचालक हल्के से मुस्कुरा दिये, जो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। मैंने संचालक महोदय को उन बुजुर्ग सज्जन की परेशानी याद दिलाते हुए टोका तो वे माफ़ी माँगते हुए बोले, ‘सर, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उनकी मृत्यु के बाद हमें पता चला कि उनके पास दो करोड़ से ज़्यादा की फ़िक्स्ड डिपोजिट याने एफ़डी थी। इतना पैसा होने के बाद भी वे अक्सर छोटी-छोटी चीजों के लिये परेशान रहते थे।’

    दोस्तों, उन सज्जन के इस तरह अचानक से जाने का दुख तो मुझे भी था लेकिन साथ ही मेरे मन में पहला विचार आया कि विवेक और आत्मसंतुष्टि के बिना इस दुनिया में अमीर आदमी भी उतना ही दुखी, परेशान, निराश और हताश हो सकता है, जितना एक निर्धन व्यक्ति अपनी न्यूनतम ज़रूरतों को पुरा ना कर पाने की स्थिति में और हाँ इसके ठीक विपरीत सोचना ग़रीब से ग़रीब इंसान को भी उतना सुखी बना सकता है, जितना कोई धनवान हो सकता है। इसका अर्थ हुआ जीवन में आंतरिक समझ याने अंतर्दृष्टि का होना सुखी रहने के लिये आवश्यक है।

    जी हाँ साथियों, सुख और दुख का असली पैमाना हमारी दौलत, शोहरत या भोग-विलास की बड़ी-बड़ी वस्तुएँ नहीं है वह तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारी आंतरिक प्रसन्नता ही है। इसलिये पैसे, प्रॉपर्टी, संसाधन याने भौतिक सुखों के साधनों के आधार पर किसी की सफलता का मूल्यांकन करना कहीं से भी उचित नहीं है। अगर आप मेरी बात से सहमत न हों, तो न्यूट्रल रहकर अपने आस-पास मौजूद लोगों को थोड़ा ध्यान से देख लीजियेगा। आपको निश्चित तौर पर ऐसे लोग मिल जाएँगे, जो ढेर सारा धन संग्रहित करने के बाद भी रो रहे हैं और कुछ लोग थोड़ा सा होने के बाद भी बाँट कर खुश हैं। अर्थात् जो थोड़ा बहुत है उसे मिल-बाँट कर भी खुश और मुस्कुराते हुए अपना जीवन जी रहे हैं।

    इस आधार पर कहा जाये तो आपने जीवनकाल में कितना कमाया और इकट्ठा किया से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप कितने तृप्त रहे। अर्थात् ज़्यादातर लोगों की परेशानी का कारण धन नहीं मन है। याद रखियेगा साथियों, अगर समय के साथ सही सोच विकसित नहीं कर पाये तो आप अच्छे ख़ासे जीवन को अपने लिये बोझ बना लेंगे। इसलिये मेरा मानना है सुखी जीवन जीने के लिये जितना आवश्यक धन कमाना है उतना ही आवश्यक सही समय पर सही सोच को विकसित करना है। एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर…
    दोस्तों, इस दुनिया में और ज़्यादा पाने की लालसा एक ऐसा भाव है जो अक्सर आपके पास जो होता है उसका सुख भोगने से वंचित कर देता है और आपको हमेशा अधूरेपन के भाव के साथ जीने के लिये मजबूर करता है। अपनी बात को मैं हाल ही में घटी एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ। कुछ माह पूर्व मध्यप्रदेश के एक छोटे से क़स्बे में मेरी मुलाक़ात एक बुजुर्ग सज्जन से उस वक़्त हुई जब मैं एक विद्यालय संचालक के साथ कुछ चर्चा कर रहा था। बातचीत के तौर-तरीक़े और देखने में वे बुजुर्ग सज्जन बड़े सभ्रांत, गंभीर, ज्ञानी लेकिन परिस्थिति के मारे, बेचैन और दुखी प्रतीत हो रहे थे। उनके जाने के पश्चात जब मैंने उनके विषय में स्कूल संचालक से बात करी तो उन्होंने बताया कि वे प्राचार्य के लिये किराए पर लिये गये घर के मालिक हैं और पारिस्थितिक कारणों से आजकल भावनात्मक और मानसिक परेशानियों के साथ-साथ आर्थिक तंगी के दौर से भी गुजर रहे हैं। व्यक्तिगत तौर पर मुझे उनके विषय में सुनकर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा और मैं सोचने लगा कि पूरे जीवन की कमाई जिस घर को बनाने में लगाई उसी घर के मज़े वे जीवन के इस पड़ाव पर नहीं ले पा रहे हैं और तमाम दिक़्क़तों के दौर से गुजर रहे हैं। ख़ैर, उस वक़्त तो मैं ऐसे कई विचार मन में लिये वापस अपने शहर आ गया और अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया। एक सप्ताह पूर्व मुझे यह घटना एक बार फिर दुबारा याद आई जब इंदौर में मेरी मुलाक़ात एक बार फिर उसी विद्यालय के संचालक से हो गई। सामान्य बातचीत के बाद मैंने उत्सुकतावश जब उन बुजुर्ग व्यक्ति के हालचाल पूछे तो मैं यह जानकर अचंभित रह गया कि कुछ दिन पूर्व वे ब्रह्मलीन हो गये। कुछ पलों के लिये तो मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं किस तरह रिएक्ट करूँ। कुछ पलों पश्चात अचानक ही मेरे मुँह से निकाला, ‘चलो अच्छा हुआ, वे सारी परेशानियों से आज़ाद हो गये।’ मेरी बात सुनते ही विद्यालय संचालक हल्के से मुस्कुरा दिये, जो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। मैंने संचालक महोदय को उन बुजुर्ग सज्जन की परेशानी याद दिलाते हुए टोका तो वे माफ़ी माँगते हुए बोले, ‘सर, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उनकी मृत्यु के बाद हमें पता चला कि उनके पास दो करोड़ से ज़्यादा की फ़िक्स्ड डिपोजिट याने एफ़डी थी। इतना पैसा होने के बाद भी वे अक्सर छोटी-छोटी चीजों के लिये परेशान रहते थे।’ दोस्तों, उन सज्जन के इस तरह अचानक से जाने का दुख तो मुझे भी था लेकिन साथ ही मेरे मन में पहला विचार आया कि विवेक और आत्मसंतुष्टि के बिना इस दुनिया में अमीर आदमी भी उतना ही दुखी, परेशान, निराश और हताश हो सकता है, जितना एक निर्धन व्यक्ति अपनी न्यूनतम ज़रूरतों को पुरा ना कर पाने की स्थिति में और हाँ इसके ठीक विपरीत सोचना ग़रीब से ग़रीब इंसान को भी उतना सुखी बना सकता है, जितना कोई धनवान हो सकता है। इसका अर्थ हुआ जीवन में आंतरिक समझ याने अंतर्दृष्टि का होना सुखी रहने के लिये आवश्यक है। जी हाँ साथियों, सुख और दुख का असली पैमाना हमारी दौलत, शोहरत या भोग-विलास की बड़ी-बड़ी वस्तुएँ नहीं है वह तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारी आंतरिक प्रसन्नता ही है। इसलिये पैसे, प्रॉपर्टी, संसाधन याने भौतिक सुखों के साधनों के आधार पर किसी की सफलता का मूल्यांकन करना कहीं से भी उचित नहीं है। अगर आप मेरी बात से सहमत न हों, तो न्यूट्रल रहकर अपने आस-पास मौजूद लोगों को थोड़ा ध्यान से देख लीजियेगा। आपको निश्चित तौर पर ऐसे लोग मिल जाएँगे, जो ढेर सारा धन संग्रहित करने के बाद भी रो रहे हैं और कुछ लोग थोड़ा सा होने के बाद भी बाँट कर खुश हैं। अर्थात् जो थोड़ा बहुत है उसे मिल-बाँट कर भी खुश और मुस्कुराते हुए अपना जीवन जी रहे हैं। इस आधार पर कहा जाये तो आपने जीवनकाल में कितना कमाया और इकट्ठा किया से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप कितने तृप्त रहे। अर्थात् ज़्यादातर लोगों की परेशानी का कारण धन नहीं मन है। याद रखियेगा साथियों, अगर समय के साथ सही सोच विकसित नहीं कर पाये तो आप अच्छे ख़ासे जीवन को अपने लिये बोझ बना लेंगे। इसलिये मेरा मानना है सुखी जीवन जीने के लिये जितना आवश्यक धन कमाना है उतना ही आवश्यक सही समय पर सही सोच को विकसित करना है। एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर…
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  • दोस्तों, अगर आप कर्मवीर हैं अर्थात् प्रतिदिन किन्हीं लक्ष्यों को पाने के लिये अपनी ओर से भरसक प्रयास कर रहे हैं; मेहनत कर रहे हैं तो यक़ीन मानियेगा कभी सफलता आपके कदम चूमेगी तो कभी असफलता आपको मुँह चिड़ायेगी; आपके आत्मविश्वास को डगमगा कर हौंसले को कम करेगी। लेकिन दोस्तों अगर आपने असफलता को सफलता की राह में मिलने वाली सीख मानना शुरू कर दिया तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है।

    जी हाँ साथियों, मैंने जीवन से मिले अब तक के अनुभव से तो यही सीखा है। आज अगर मैं जीवन में पीछे पलटकर अपनी असफलताओं को देखता हूँ तो ऐसा लगता है, जैसे, वे सब सफलता तक पहुँचाने वाली सीढ़ीयाँ थी। उदाहरण के लिये , तमाम तकनीकी योग्यताएँ एवं ज्ञान होने के बाद भी जब कंप्यूटर के व्यवसाय में असफलता हाथ लगी तो मैंने जीवन में नज़रिये के महत्व को समझा और सीखा कि सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है। इसी तरह कई बार सफलता-असफलता के बीच झूलते हुए मैंने सीखा कि अगर हमारी ख़ुशी सफलता और असफलता पर निर्भर हुई तो हम निश्चित तौर पर जीवन भर दुखी ही रहने वाले हैं। इसलिये आज मैं हर हाल में खुश रहता हूँ।

    इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि अब मैं जीवन में मिली असफलताओं के लिये भी ईश्वर का आभारी हूँ। वैसे दोस्तों, यही बात हमारे धर्मग्रन्थ महाभारत ने हमें सिखाई है। जब पांडव विपत्ति के दौर से गुजर रहे थे तब माता कुंती ने ईश्वर का धन्यवाद देते हुए कहा था,‘धन्यवाद प्रभु, मेरे जीवन में अगर यह दुःख ना आता, तो मै आपका स्मरण कैसे करती? मैं कहीं अपने सुखों में उलझकर दिग्भ्रमित ना हो जाऊँ, इसीलिए आपने मेरे ऊपर यह कृपा की होगी।’ ठीक इसी तरह की सीख हमें सुदामा जी से भी मिलती है। जब भी ग़रीबी या परिस्थिति के कारण सुदामा जी को भूखा रहना पड़ता था तो वे अपने प्रभि को धन्यवाद देते हुए कहते थे, ‘हे प्रभु! आपकी कृपा से आज मुझे एक बार फिर एकादशी जैसा पुण्य प्राप्त हो रहा है।’

    याद रखियेगा दोस्तों, जीवन की प्रत्येक परिस्थिति हमें जीवन को बेहतर बनाने के लिये आवश्यक, कोई न कोई संदेश देती है। जी हाँ, यक़ीन मानियेगा इस जीवन में ऐसी कोई परिस्थिति ही नहीं है जिसे अवसर में ना बदला जा सके। ईश्वर हमें वही अनुभव देता है या हमारा सामना उन्हीं परेशानियों या चुनौतियों से करवाता है, जिनसे निपटने की क्षमता हमारे अंदर होती है। इसके पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें अपनी शक्तियाँ याद दिलवाना और इससे मिले अनुभव से हमारे जीवन को बेहतर बनाना होता है।

    इस आधार पर कहा जाये तो हमारे जीवन के सभी सुख और दुख सिर्फ़ और सिर्फ़ इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम प्रतिदिन, प्रतिपल का सामना किस नज़रिये से करते हैं याने जीवन में सामने आई विभिन्न परिस्थितियों को किस दृष्टि से देखते हैं। उपरोक्त आधार पर अगर आप सोचेंगे तो पायेंगे कि निश्चित तौर पर सकारात्मक दृष्टि हमारे जीवन को सुखमय बना देती है। एक बार दोस्तों, इस पर विचार कर देखियेगा ज़रूर…
    दोस्तों, अगर आप कर्मवीर हैं अर्थात् प्रतिदिन किन्हीं लक्ष्यों को पाने के लिये अपनी ओर से भरसक प्रयास कर रहे हैं; मेहनत कर रहे हैं तो यक़ीन मानियेगा कभी सफलता आपके कदम चूमेगी तो कभी असफलता आपको मुँह चिड़ायेगी; आपके आत्मविश्वास को डगमगा कर हौंसले को कम करेगी। लेकिन दोस्तों अगर आपने असफलता को सफलता की राह में मिलने वाली सीख मानना शुरू कर दिया तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है। जी हाँ साथियों, मैंने जीवन से मिले अब तक के अनुभव से तो यही सीखा है। आज अगर मैं जीवन में पीछे पलटकर अपनी असफलताओं को देखता हूँ तो ऐसा लगता है, जैसे, वे सब सफलता तक पहुँचाने वाली सीढ़ीयाँ थी। उदाहरण के लिये , तमाम तकनीकी योग्यताएँ एवं ज्ञान होने के बाद भी जब कंप्यूटर के व्यवसाय में असफलता हाथ लगी तो मैंने जीवन में नज़रिये के महत्व को समझा और सीखा कि सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है। इसी तरह कई बार सफलता-असफलता के बीच झूलते हुए मैंने सीखा कि अगर हमारी ख़ुशी सफलता और असफलता पर निर्भर हुई तो हम निश्चित तौर पर जीवन भर दुखी ही रहने वाले हैं। इसलिये आज मैं हर हाल में खुश रहता हूँ। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि अब मैं जीवन में मिली असफलताओं के लिये भी ईश्वर का आभारी हूँ। वैसे दोस्तों, यही बात हमारे धर्मग्रन्थ महाभारत ने हमें सिखाई है। जब पांडव विपत्ति के दौर से गुजर रहे थे तब माता कुंती ने ईश्वर का धन्यवाद देते हुए कहा था,‘धन्यवाद प्रभु, मेरे जीवन में अगर यह दुःख ना आता, तो मै आपका स्मरण कैसे करती? मैं कहीं अपने सुखों में उलझकर दिग्भ्रमित ना हो जाऊँ, इसीलिए आपने मेरे ऊपर यह कृपा की होगी।’ ठीक इसी तरह की सीख हमें सुदामा जी से भी मिलती है। जब भी ग़रीबी या परिस्थिति के कारण सुदामा जी को भूखा रहना पड़ता था तो वे अपने प्रभि को धन्यवाद देते हुए कहते थे, ‘हे प्रभु! आपकी कृपा से आज मुझे एक बार फिर एकादशी जैसा पुण्य प्राप्त हो रहा है।’ याद रखियेगा दोस्तों, जीवन की प्रत्येक परिस्थिति हमें जीवन को बेहतर बनाने के लिये आवश्यक, कोई न कोई संदेश देती है। जी हाँ, यक़ीन मानियेगा इस जीवन में ऐसी कोई परिस्थिति ही नहीं है जिसे अवसर में ना बदला जा सके। ईश्वर हमें वही अनुभव देता है या हमारा सामना उन्हीं परेशानियों या चुनौतियों से करवाता है, जिनसे निपटने की क्षमता हमारे अंदर होती है। इसके पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें अपनी शक्तियाँ याद दिलवाना और इससे मिले अनुभव से हमारे जीवन को बेहतर बनाना होता है। इस आधार पर कहा जाये तो हमारे जीवन के सभी सुख और दुख सिर्फ़ और सिर्फ़ इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम प्रतिदिन, प्रतिपल का सामना किस नज़रिये से करते हैं याने जीवन में सामने आई विभिन्न परिस्थितियों को किस दृष्टि से देखते हैं। उपरोक्त आधार पर अगर आप सोचेंगे तो पायेंगे कि निश्चित तौर पर सकारात्मक दृष्टि हमारे जीवन को सुखमय बना देती है। एक बार दोस्तों, इस पर विचार कर देखियेगा ज़रूर…
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  • दोस्तों, शब्दों का हमारे जीवन में बड़ा योगदान है, किसी के कहे शब्द आपको ऊर्जा से भर सकते हैं, तो किसी के कहे शब्द आपको हताश भी कर सकते हैं। ठीक इसी तरह आपके कहे शब्द आपको किसी के दिल में, तो किसी के दिल से उतार सकते हैं। इसीलिये कहा जाता है, ‘जो इंसान शब्दों की शक्ति को समझ जाता है, वह अपने जीवन को आसान व उपयोगी बना लेता है।’ मेरी नज़र में तो शब्द ही किसी इंसान की असली पहचान होते हैं। इसीलिये कहा गया है, ‘जब तक आप चुप है तब तक शब्द आपके ग़ुलाम हैं और बोलने के बाद आप शब्दों के ग़ुलाम हैं।’ जी हाँ साथियों, एक ओर जहाँ शब्द हथियारों के घाव को आसानी से भर सकते हैं वहीं दूसरी ओर शब्दों के द्वारा दिये गये घाव किसी के जीवन को ख़त्म तक कर सकते हैं। अपनी बात को मैं दोस्तों, आपको इस दुनिया के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन से समझाने का प्रयास करता हूँ।

    अल्बर्ट आइंस्टीन, ३ वर्ष की उम्र तक ठीक से बोल नहीं पाते थे और साथ ही उन्हें किसी भी नई चीज को सीखने या समझने में बहुत अधिक वक़्त लगता था। इसी कारण एक दिन विद्यालय ने अल्बर्ट की माँ को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि आपका बेटा ‘स्लो लर्नर’ है और उसे सामान्य बच्चों के साथ पढ़ाना असंभव है। इसलिये कृपया उसे विद्यालय से निकाल लीजिये। पत्र जब आइंस्टीन की माँ ने पढ़ा तो उनकी आँखों से आसूँ बहने लगे। माँ को रोते देख आइंस्टीन ने पूछा, ‘माँ, इस पत्र में ऐसा क्या लिखा है जो तुम रो रही हो।’ माँ ने तुरंत अपने आसूँ पोंछे और आइंस्टीन के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘कुछ नहीं, विद्यालय वालों का बस इतना कहना है कि आपका पुत्र अल्बर्ट बहुत होनहार और काबिल है। उस बच्चे की क़ाबिलियत को निखार पाना वहाँ के शिक्षकों के बस की बात नहीं है। इसलिये अब तुम्हारी आगे की शिक्षा हम घर से ही शुरू करेंगे।’

    हालाँकि आइंस्टीन के माता-पिता विद्यालय के तर्क से सहमत नहीं थे क्योंकि वे जानते थे आइंस्टीन को विद्यालय से इसलिये नफ़रत थी क्योंकि वे वहाँ कुछ नया नहीं सीख पा रहे थे। इसलिये माँ ने सर्वप्रथम घर के माहौल को सीखने के लिये उत्साहवर्धक बनाने का निर्णय लिया और वे उन्हें सीखने में मदद करने वाले खिलौने और किताबें उपलब्ध करवाने लगी। इससे आइंस्टीन में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा होने लगी। कुछ समय बाद माँ को एहसास हुआ कि आइंस्टीन को फ़ोकस करने में दिक़्क़त होती है और वे हर कार्य को जल्दबाज़ी याने हड़बड़ाहट में करते हैं। फ़ोकस बढ़ाने और धैर्य विकसित करने के लिये उन्होंने आइंस्टीन को वायलिन सिखाना शुरू कर दिया। असल में संगीत में रुचि होने के कारण वे जानती थी कि बिना धैर्य और फ़ोकस के संगीत सीखना असंभव है और अगर आइंस्टीन की रुचि संगीत में हो गई तो वे धैर्य के साथ फ़ोकस बनाये रखना सीख जाएँगे।

    जैसे-जैसे आइंस्टीन बड़े होते गए, उनकी माँ ने उनकी जिज्ञासा बढ़ाने के लिये नये-नये प्रयोग करना शुरू कर दिये। जैसे, हर गुरुवार को पूरे परिवार और वैज्ञानिक मित्रों के लिये दोपहर का भोज आयोजित करना। भोजन के समय पर आइंस्टीन के चाचा अक्सर उनसे बीज गणित के पेचीदा प्रश्न पूछा करते थे और जब भी आइंस्टीन उसके सही जवाब दे पाते थे, वे ख़ुशी से चिल्ला कर उछला करते थे। इस प्रयोग का नतीजा यह हुआ कि मात्र बारह साल की उम्र में उन्होंने कैलकुलस का अध्ययन शुरू कर दिया। दोस्तों, इसके आगे की कहानी तो पूरी दुनिया जानती ही है।

    दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य शब्दों पर पकड़ विकसित कर लोगों के दिलों को जीतना; अपने लक्ष्यों को पाना है तो आज ही से निम्न तीन सूत्रों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लें-

    पहला सूत्र - प्रेरणादायी शब्दों का प्रयोग करें

    सामान्य बातचीत के दौरान प्रेरणादायी शब्दों का प्रयोग करना आपको सामने वाले के दिल में विशिष्ट स्थान दिलाता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आप सामने वाले के दिल को जीतने के प्रयास में झूठ बोलना शुरू कर दें। अगर आपको सामने वाले में कुछ कमियाँ नज़र आ रही है तो उसे इस विषय में अवश्य बतायें लेकिन उससे होने वाली समस्याओं और उसे दूर करने के समाधान के साथ।

    दूसरा सूत्र - नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूर रहें

    संगत हमेशा आपकी रंगत बदलती है। अगर आप नकारात्मक लोगों के साथ रहेंगे तो वैसा नज़रिया रखेंगे और सकारात्मक लोगों के साथ रहेंगे तो वैसा, और जैसा आपका नज़रिया होगा वैसे ही शब्दों का प्रयोग आप बातचीत के दौरान करेंगे।

    तीसरा सूत्र - ख़ुद से सकारात्मक बातचीत करें

    ख़ुद से कहे शब्द हमारे जीवन पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं क्योंकि यह आपके अंतर्मन में कही गई बात के प्रति विश्वास पैदा करते हैं। याद रखियेगा, ख़ुद से कहे शब्द पहले विचार को जन्म देते हैं और विचार आपकी सोच, नज़रिये और व्यवहार को प्रभावित कर जीवन की दिशा और दशा बेहतर बनाता है।

    इसलिए दोस्तों, शब्दों की शक्ति को पहचानिये और जहाँ तक संभव हो सके सकारात्मक शब्दों का प्रयोग कीजिए, इस विश्वास के साथ कि कहे गये शब्द आपकी और आपके आसपास मौजूद लोगों की ज़िन्दगी बदल रहे हैं।

    दोस्तों, शब्दों का हमारे जीवन में बड़ा योगदान है, किसी के कहे शब्द आपको ऊर्जा से भर सकते हैं, तो किसी के कहे शब्द आपको हताश भी कर सकते हैं। ठीक इसी तरह आपके कहे शब्द आपको किसी के दिल में, तो किसी के दिल से उतार सकते हैं। इसीलिये कहा जाता है, ‘जो इंसान शब्दों की शक्ति को समझ जाता है, वह अपने जीवन को आसान व उपयोगी बना लेता है।’ मेरी नज़र में तो शब्द ही किसी इंसान की असली पहचान होते हैं। इसीलिये कहा गया है, ‘जब तक आप चुप है तब तक शब्द आपके ग़ुलाम हैं और बोलने के बाद आप शब्दों के ग़ुलाम हैं।’ जी हाँ साथियों, एक ओर जहाँ शब्द हथियारों के घाव को आसानी से भर सकते हैं वहीं दूसरी ओर शब्दों के द्वारा दिये गये घाव किसी के जीवन को ख़त्म तक कर सकते हैं। अपनी बात को मैं दोस्तों, आपको इस दुनिया के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन से समझाने का प्रयास करता हूँ। अल्बर्ट आइंस्टीन, ३ वर्ष की उम्र तक ठीक से बोल नहीं पाते थे और साथ ही उन्हें किसी भी नई चीज को सीखने या समझने में बहुत अधिक वक़्त लगता था। इसी कारण एक दिन विद्यालय ने अल्बर्ट की माँ को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि आपका बेटा ‘स्लो लर्नर’ है और उसे सामान्य बच्चों के साथ पढ़ाना असंभव है। इसलिये कृपया उसे विद्यालय से निकाल लीजिये। पत्र जब आइंस्टीन की माँ ने पढ़ा तो उनकी आँखों से आसूँ बहने लगे। माँ को रोते देख आइंस्टीन ने पूछा, ‘माँ, इस पत्र में ऐसा क्या लिखा है जो तुम रो रही हो।’ माँ ने तुरंत अपने आसूँ पोंछे और आइंस्टीन के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘कुछ नहीं, विद्यालय वालों का बस इतना कहना है कि आपका पुत्र अल्बर्ट बहुत होनहार और काबिल है। उस बच्चे की क़ाबिलियत को निखार पाना वहाँ के शिक्षकों के बस की बात नहीं है। इसलिये अब तुम्हारी आगे की शिक्षा हम घर से ही शुरू करेंगे।’ हालाँकि आइंस्टीन के माता-पिता विद्यालय के तर्क से सहमत नहीं थे क्योंकि वे जानते थे आइंस्टीन को विद्यालय से इसलिये नफ़रत थी क्योंकि वे वहाँ कुछ नया नहीं सीख पा रहे थे। इसलिये माँ ने सर्वप्रथम घर के माहौल को सीखने के लिये उत्साहवर्धक बनाने का निर्णय लिया और वे उन्हें सीखने में मदद करने वाले खिलौने और किताबें उपलब्ध करवाने लगी। इससे आइंस्टीन में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा होने लगी। कुछ समय बाद माँ को एहसास हुआ कि आइंस्टीन को फ़ोकस करने में दिक़्क़त होती है और वे हर कार्य को जल्दबाज़ी याने हड़बड़ाहट में करते हैं। फ़ोकस बढ़ाने और धैर्य विकसित करने के लिये उन्होंने आइंस्टीन को वायलिन सिखाना शुरू कर दिया। असल में संगीत में रुचि होने के कारण वे जानती थी कि बिना धैर्य और फ़ोकस के संगीत सीखना असंभव है और अगर आइंस्टीन की रुचि संगीत में हो गई तो वे धैर्य के साथ फ़ोकस बनाये रखना सीख जाएँगे। जैसे-जैसे आइंस्टीन बड़े होते गए, उनकी माँ ने उनकी जिज्ञासा बढ़ाने के लिये नये-नये प्रयोग करना शुरू कर दिये। जैसे, हर गुरुवार को पूरे परिवार और वैज्ञानिक मित्रों के लिये दोपहर का भोज आयोजित करना। भोजन के समय पर आइंस्टीन के चाचा अक्सर उनसे बीज गणित के पेचीदा प्रश्न पूछा करते थे और जब भी आइंस्टीन उसके सही जवाब दे पाते थे, वे ख़ुशी से चिल्ला कर उछला करते थे। इस प्रयोग का नतीजा यह हुआ कि मात्र बारह साल की उम्र में उन्होंने कैलकुलस का अध्ययन शुरू कर दिया। दोस्तों, इसके आगे की कहानी तो पूरी दुनिया जानती ही है। दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य शब्दों पर पकड़ विकसित कर लोगों के दिलों को जीतना; अपने लक्ष्यों को पाना है तो आज ही से निम्न तीन सूत्रों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लें- पहला सूत्र - प्रेरणादायी शब्दों का प्रयोग करें सामान्य बातचीत के दौरान प्रेरणादायी शब्दों का प्रयोग करना आपको सामने वाले के दिल में विशिष्ट स्थान दिलाता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आप सामने वाले के दिल को जीतने के प्रयास में झूठ बोलना शुरू कर दें। अगर आपको सामने वाले में कुछ कमियाँ नज़र आ रही है तो उसे इस विषय में अवश्य बतायें लेकिन उससे होने वाली समस्याओं और उसे दूर करने के समाधान के साथ। दूसरा सूत्र - नकारात्मक सोच वाले लोगों से दूर रहें संगत हमेशा आपकी रंगत बदलती है। अगर आप नकारात्मक लोगों के साथ रहेंगे तो वैसा नज़रिया रखेंगे और सकारात्मक लोगों के साथ रहेंगे तो वैसा, और जैसा आपका नज़रिया होगा वैसे ही शब्दों का प्रयोग आप बातचीत के दौरान करेंगे। तीसरा सूत्र - ख़ुद से सकारात्मक बातचीत करें ख़ुद से कहे शब्द हमारे जीवन पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं क्योंकि यह आपके अंतर्मन में कही गई बात के प्रति विश्वास पैदा करते हैं। याद रखियेगा, ख़ुद से कहे शब्द पहले विचार को जन्म देते हैं और विचार आपकी सोच, नज़रिये और व्यवहार को प्रभावित कर जीवन की दिशा और दशा बेहतर बनाता है। इसलिए दोस्तों, शब्दों की शक्ति को पहचानिये और जहाँ तक संभव हो सके सकारात्मक शब्दों का प्रयोग कीजिए, इस विश्वास के साथ कि कहे गये शब्द आपकी और आपके आसपास मौजूद लोगों की ज़िन्दगी बदल रहे हैं।
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  • दोस्तों, वैसे तो इस दुनिया में हर इंसान शिक्षित, समझदार और ख़ुद का भला-बुरा समझने में सक्षम होता है। बस अंतर इतना सा होता है कि कुछ लोग अपनी सोच के आधार पर दूसरे को अनपढ़ या ग़लत ठहरा देते हैं। मेरी यह बात सुनकर आपमें से भी कुछ लोग दुविधा में होंगे और सोच रहे होंगे कि ‘सब लोग शिक्षित और समझदार कैसे हो सकते हैं?’ तो आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि इस दुनिया में कुछ लोग पारम्परिक शिक्षा प्रणाली याने विद्यालय और महाविद्यालय जाकर अपनी शिक्षा पूर्ण करते हैं तो कुछ लोग ‘जनता विश्वविद्यालय’ याने अपने जीवन के अनुभवों से सीख कर शिक्षित और समझदार बनते हैं; अपने जीवन में सफलता की नई इबारत लिख पाते हैं। लेकिन इसके बाद भी आपके मन में दुविधा हो सकती है या एक नया प्रश्न आ सकता है कि’ फिर हमें कुछ लोग परिस्थितियों से जूझते, परेशान, दुखी और असफ़ल क्यों नज़र आते हैं?’ असल में साथियों, इस दुनिया में बड़े, ज्ञानी या सयाने होने की हमारी सबकी अपनी परिभाषा है और हम अपनी उसी परिभाषा के आधार पर ख़ुद को ‘ज्ञानी’, ‘विशेष’ और ‘समझदार’ मानते हैं।

    इसीलिये मैं कहता हूँ, ‘हम सब अद्भुत ज्ञानी है’ याने हम सभी के पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है और शायद इसी कारण सारा दिन किसी ना किसी को सलाह-मशविरा देते रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमारे ज्ञान का बर्तन हमेशा दूसरों को सिखाने या उनका जीवन बेहतर बनाने के लिये ओवरफ्लो होता रहता है और शायद इसीलिये हममें से बहुत सारे लोग असफ़ल, परेशान, दुखी और नकारात्मक भावों से भरे होते हैं।

    दोस्तों, अगर आप खुश, सुखी और शांत रहते हुए हर पल जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहते हैं तो आज नहीं अभी से ही जो ज्ञान दूसरों को दे रहे हैं, उसपर स्वयं, सौ प्रतिशत, अमल करना शुरू कर दें। निश्चित मानियेगा ऐसा करना आपके जीवन को स्वर्ग बना देगा। इसके साथ ही आपको एक काम और करना है, सदैव अपने जीवन में ज्ञान को बढ़ाते रहें याने नया सीखने का प्रयास करते रहें। ऐसा सिर्फ़ सलाह देने से नहीं अपितु कुछ नया सुनने या सीखने से होगा। इस आधार पर कहा जाये तो ज्ञानी बनने के लिये सिखाने से सीखना, ज़्यादा कठिन और ज़रूरी है। सीखना निश्चित तौर पर हमारे जीवन को बेहतर बनाता है।

    दोस्तों, अब अगर आप मेरी बात से सहमत हों तो मैं आपको सीखने यानी ज्ञानी बनने के तीन सरल तरीक़े सिखा देता हूँ-

    पहला -मनन

    मनन याने जो भी हम सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं, सीख रहे हैं उसपर चिंतन करना जिससे आप अपनी वाणी और कर्म पर लगाम रख, उसे नई और सही दिशा दे सकें। यह आपको बहुत कम समय में ख़ुशी, शांति और सुखी बनायेगा। इसीलिये इसे सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

    दूसरा - अनुसरण

    अनुसरण याने किसी सुखी, सफल, शांत और खुश व्यक्ति के दिखाये पथ पर चलकर अपने जीवन को उनके समान बनाना। यह सबसे सुगम और सरल रास्ता है। अगर आपके अंदर समर्पण का भाव है तो इसमें असफ़ल होने की संभावना, ना के बराबर रहती है।

    तीसरा- अनुभव

    अनुभव याने अपने कर्मों से सीखना । फिर भले ही आपको उस कर्म से मनमाफ़िक परिणाम मिले हों या फिर आप असफ़ल, दुखी और परेशान रहे हों। इसीलिये अनुभव से सीखना सबसे मुश्किल, पीड़ादायी और समय लेने वाला होता है। इसलिये इसे कड़वा रास्ता भी कहा जाता है।

    आइये दोस्तों, उपरोक्त बातों पर गम्भीरता के साथ विचार करते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये इससे मिली सीखों को अपने जीवन में उतारते हैं।
    दोस्तों, वैसे तो इस दुनिया में हर इंसान शिक्षित, समझदार और ख़ुद का भला-बुरा समझने में सक्षम होता है। बस अंतर इतना सा होता है कि कुछ लोग अपनी सोच के आधार पर दूसरे को अनपढ़ या ग़लत ठहरा देते हैं। मेरी यह बात सुनकर आपमें से भी कुछ लोग दुविधा में होंगे और सोच रहे होंगे कि ‘सब लोग शिक्षित और समझदार कैसे हो सकते हैं?’ तो आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि इस दुनिया में कुछ लोग पारम्परिक शिक्षा प्रणाली याने विद्यालय और महाविद्यालय जाकर अपनी शिक्षा पूर्ण करते हैं तो कुछ लोग ‘जनता विश्वविद्यालय’ याने अपने जीवन के अनुभवों से सीख कर शिक्षित और समझदार बनते हैं; अपने जीवन में सफलता की नई इबारत लिख पाते हैं। लेकिन इसके बाद भी आपके मन में दुविधा हो सकती है या एक नया प्रश्न आ सकता है कि’ फिर हमें कुछ लोग परिस्थितियों से जूझते, परेशान, दुखी और असफ़ल क्यों नज़र आते हैं?’ असल में साथियों, इस दुनिया में बड़े, ज्ञानी या सयाने होने की हमारी सबकी अपनी परिभाषा है और हम अपनी उसी परिभाषा के आधार पर ख़ुद को ‘ज्ञानी’, ‘विशेष’ और ‘समझदार’ मानते हैं। इसीलिये मैं कहता हूँ, ‘हम सब अद्भुत ज्ञानी है’ याने हम सभी के पास ज्ञान की कोई कमी नहीं है और शायद इसी कारण सारा दिन किसी ना किसी को सलाह-मशविरा देते रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो हमारे ज्ञान का बर्तन हमेशा दूसरों को सिखाने या उनका जीवन बेहतर बनाने के लिये ओवरफ्लो होता रहता है और शायद इसीलिये हममें से बहुत सारे लोग असफ़ल, परेशान, दुखी और नकारात्मक भावों से भरे होते हैं। दोस्तों, अगर आप खुश, सुखी और शांत रहते हुए हर पल जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहते हैं तो आज नहीं अभी से ही जो ज्ञान दूसरों को दे रहे हैं, उसपर स्वयं, सौ प्रतिशत, अमल करना शुरू कर दें। निश्चित मानियेगा ऐसा करना आपके जीवन को स्वर्ग बना देगा। इसके साथ ही आपको एक काम और करना है, सदैव अपने जीवन में ज्ञान को बढ़ाते रहें याने नया सीखने का प्रयास करते रहें। ऐसा सिर्फ़ सलाह देने से नहीं अपितु कुछ नया सुनने या सीखने से होगा। इस आधार पर कहा जाये तो ज्ञानी बनने के लिये सिखाने से सीखना, ज़्यादा कठिन और ज़रूरी है। सीखना निश्चित तौर पर हमारे जीवन को बेहतर बनाता है। दोस्तों, अब अगर आप मेरी बात से सहमत हों तो मैं आपको सीखने यानी ज्ञानी बनने के तीन सरल तरीक़े सिखा देता हूँ- पहला -मनन मनन याने जो भी हम सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं, सीख रहे हैं उसपर चिंतन करना जिससे आप अपनी वाणी और कर्म पर लगाम रख, उसे नई और सही दिशा दे सकें। यह आपको बहुत कम समय में ख़ुशी, शांति और सुखी बनायेगा। इसीलिये इसे सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। दूसरा - अनुसरण अनुसरण याने किसी सुखी, सफल, शांत और खुश व्यक्ति के दिखाये पथ पर चलकर अपने जीवन को उनके समान बनाना। यह सबसे सुगम और सरल रास्ता है। अगर आपके अंदर समर्पण का भाव है तो इसमें असफ़ल होने की संभावना, ना के बराबर रहती है। तीसरा- अनुभव अनुभव याने अपने कर्मों से सीखना । फिर भले ही आपको उस कर्म से मनमाफ़िक परिणाम मिले हों या फिर आप असफ़ल, दुखी और परेशान रहे हों। इसीलिये अनुभव से सीखना सबसे मुश्किल, पीड़ादायी और समय लेने वाला होता है। इसलिये इसे कड़वा रास्ता भी कहा जाता है। आइये दोस्तों, उपरोक्त बातों पर गम्भीरता के साथ विचार करते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये इससे मिली सीखों को अपने जीवन में उतारते हैं।
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