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  • दोस्तों, आपसी रिश्ते में आप सही हैं यह सिद्ध करना ज़्यादा ज़रूरी है या रिश्तों का मज़बूत और भावनाओं से भरा होना? मेरी नज़र में तो रिश्तों का मज़बूत और भावनाओं से भरा होना ही सबसे ज़रूरी है। लेकिन अगर आप अपने आसपास याने समाज में नज़र घूमाकर देखेंगे तो ठीक इसका विपरीत पायेंगे। जी हाँ साथियों, आजकल ‘क्या’ से ज़्यादा ‘मैं’ सही हूँ का भाव मनुष्य के अंदर अहंकार के भाव को बढ़ाकर रिश्तों को नुक़सान पहुँचा रहा है जो प्रेम के नियम के बिलकुल विपरीत है। अपनी बात को मैं आपको एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ।

    कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक परिचित का फ़ोन आया जो अपनी बेटी की काउन्सलिंग मुझसे करवाना चाहते थे, जो पारिवारिक कलह के कारण अपने पति से अलग रह रही थी। जब सामान्य बातचीत के बाद मैंने उन्हें समस्या को विस्तार से बताने को कहा तो वे बोली, ‘सर, मेरे पति बात-बात पर मेरी और मेरे परिवार की तुलना किसी न किसी के साथ करते रहते हैं और हर बार मुझे नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। मैं कोई अनपढ़ गंवार नहीं हूँ, मैंने भी एमबीए तक शिक्षा ली है और उनसे ज़्यादा बेहतर काम कर रही हूँ, उनसे ज्यादा कमा रही हूँ।’

    ससुराल पक्ष से परिचित होने के कारण मैंने तत्काल कोई सुझाव या प्रतिक्रिया देने के स्थान पर अन्य रिश्तेदारों से भी चर्चा करने का निर्णय लिया जिससे मैं स्थिति का सही-सही आकलन कर सकूँ। अंत में मित्र से चर्चा करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि पति-पत्नी के रिश्ते में खटास की मुख्य वजह विभिन्न कारणों से उपजा अहंकार ही था। ऐसी स्थिति में सामान्यतः मेरा प्रश्न बड़ा सपाट रहता है, ‘क्या आप लोगों के बीच थोड़ा भी प्रेम बाक़ी है और क्या आप अपनी बची हुई ज़िंदगी साथ गुज़ारना चाहते हैं? अगर नहीं तो बेहतर है आप आज ही अलग हो जायें क्योंकि रोज़-रोज़ मरकर जीने का क्या फ़ायदा।’

    दोस्तों, हो सकता है आपको मेरा प्रश्न थोड़ा सपाट और अटपटा लग रहा होगा। लेकिन उपरोक्त स्थिति के हिसाब से; है बिलकुल सही, क्योंकि रिश्तों को अहंकार याने बल से नहीं, प्रेम से ही जीता जा सकता है। आप ख़ुद सोच कर देखिये क्या हम अपनों को नीचा दिखाकर, उन्हें हराकर जीत सकते हैं? मेरी नज़र में तो बिलकुल भी नहीं और ऐसा ही तो उपरोक्त रिश्ते में हो रहा था। दोस्तों, अगर आपके लिये रिश्ता महत्वपूर्ण है तो अपनों से हारने में क्या नुक़सान? याद रखियेगा, ऐसा करके याने हारकर भी आप अंत में उनका दिल जीत लेते हैं।

    दोस्तों, वर्तमान समय में समाज की स्थिति रिश्तों को लेकर वाक़ई चिन्तनीय है। आज घर-परिवार, रिश्तों या समाज में हर कोई सुनाने के लिये तैयार है लेकिन सुनने के लिये नहीं। जो कहीं से भी रिश्तों की गर्माहट याने भावनात्मकता को बचाये रखने में मदद नहीं करता है। उसके लिये तो आपको सुनाने की नहीं अपितु आवश्यकता पड़ने पर सुनने की आदत भी डालना पड़ेगी। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आप ग़लत हैं या आपको सही बात का भान नहीं है। आपने तो बस ख़ुद को सही साबित कर परिवार को अशांत बनाने के स्थान पर अपनों के सामने झुककर रिश्ते में प्रेम, समर्पण और अपनेपन को प्राथमिकता दी है।

    जी हाँ साथियों, सही होते हुए भी कभी-कभी चुप रहकर सुन लेना कोई अपराध नहीं है। यह तो पारिवारिक शांति बरक़रार रखने के लिये आपके द्वारा चेतनापूर्ण अवस्था में रिश्तों की बेहतरी के लिये उठाया गया एक कदम है। क्योंकि आप जानते हैं कि ज़िंदगी का असली मज़ा इसमें नहीं है कि आप स्वयं कितने खुश हैं बल्कि इसमें है कि आपसे, आपके अपने लोग कितने खुश हैं। वैसे भी साथियों, जो टूटे को बनाना और रूठे को मनाना जानता है, वही बुद्धिमान है।
    दोस्तों, आपसी रिश्ते में आप सही हैं यह सिद्ध करना ज़्यादा ज़रूरी है या रिश्तों का मज़बूत और भावनाओं से भरा होना? मेरी नज़र में तो रिश्तों का मज़बूत और भावनाओं से भरा होना ही सबसे ज़रूरी है। लेकिन अगर आप अपने आसपास याने समाज में नज़र घूमाकर देखेंगे तो ठीक इसका विपरीत पायेंगे। जी हाँ साथियों, आजकल ‘क्या’ से ज़्यादा ‘मैं’ सही हूँ का भाव मनुष्य के अंदर अहंकार के भाव को बढ़ाकर रिश्तों को नुक़सान पहुँचा रहा है जो प्रेम के नियम के बिलकुल विपरीत है। अपनी बात को मैं आपको एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ। कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक परिचित का फ़ोन आया जो अपनी बेटी की काउन्सलिंग मुझसे करवाना चाहते थे, जो पारिवारिक कलह के कारण अपने पति से अलग रह रही थी। जब सामान्य बातचीत के बाद मैंने उन्हें समस्या को विस्तार से बताने को कहा तो वे बोली, ‘सर, मेरे पति बात-बात पर मेरी और मेरे परिवार की तुलना किसी न किसी के साथ करते रहते हैं और हर बार मुझे नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं। मैं कोई अनपढ़ गंवार नहीं हूँ, मैंने भी एमबीए तक शिक्षा ली है और उनसे ज़्यादा बेहतर काम कर रही हूँ, उनसे ज्यादा कमा रही हूँ।’ ससुराल पक्ष से परिचित होने के कारण मैंने तत्काल कोई सुझाव या प्रतिक्रिया देने के स्थान पर अन्य रिश्तेदारों से भी चर्चा करने का निर्णय लिया जिससे मैं स्थिति का सही-सही आकलन कर सकूँ। अंत में मित्र से चर्चा करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि पति-पत्नी के रिश्ते में खटास की मुख्य वजह विभिन्न कारणों से उपजा अहंकार ही था। ऐसी स्थिति में सामान्यतः मेरा प्रश्न बड़ा सपाट रहता है, ‘क्या आप लोगों के बीच थोड़ा भी प्रेम बाक़ी है और क्या आप अपनी बची हुई ज़िंदगी साथ गुज़ारना चाहते हैं? अगर नहीं तो बेहतर है आप आज ही अलग हो जायें क्योंकि रोज़-रोज़ मरकर जीने का क्या फ़ायदा।’ दोस्तों, हो सकता है आपको मेरा प्रश्न थोड़ा सपाट और अटपटा लग रहा होगा। लेकिन उपरोक्त स्थिति के हिसाब से; है बिलकुल सही, क्योंकि रिश्तों को अहंकार याने बल से नहीं, प्रेम से ही जीता जा सकता है। आप ख़ुद सोच कर देखिये क्या हम अपनों को नीचा दिखाकर, उन्हें हराकर जीत सकते हैं? मेरी नज़र में तो बिलकुल भी नहीं और ऐसा ही तो उपरोक्त रिश्ते में हो रहा था। दोस्तों, अगर आपके लिये रिश्ता महत्वपूर्ण है तो अपनों से हारने में क्या नुक़सान? याद रखियेगा, ऐसा करके याने हारकर भी आप अंत में उनका दिल जीत लेते हैं। दोस्तों, वर्तमान समय में समाज की स्थिति रिश्तों को लेकर वाक़ई चिन्तनीय है। आज घर-परिवार, रिश्तों या समाज में हर कोई सुनाने के लिये तैयार है लेकिन सुनने के लिये नहीं। जो कहीं से भी रिश्तों की गर्माहट याने भावनात्मकता को बचाये रखने में मदद नहीं करता है। उसके लिये तो आपको सुनाने की नहीं अपितु आवश्यकता पड़ने पर सुनने की आदत भी डालना पड़ेगी। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आप ग़लत हैं या आपको सही बात का भान नहीं है। आपने तो बस ख़ुद को सही साबित कर परिवार को अशांत बनाने के स्थान पर अपनों के सामने झुककर रिश्ते में प्रेम, समर्पण और अपनेपन को प्राथमिकता दी है। जी हाँ साथियों, सही होते हुए भी कभी-कभी चुप रहकर सुन लेना कोई अपराध नहीं है। यह तो पारिवारिक शांति बरक़रार रखने के लिये आपके द्वारा चेतनापूर्ण अवस्था में रिश्तों की बेहतरी के लिये उठाया गया एक कदम है। क्योंकि आप जानते हैं कि ज़िंदगी का असली मज़ा इसमें नहीं है कि आप स्वयं कितने खुश हैं बल्कि इसमें है कि आपसे, आपके अपने लोग कितने खुश हैं। वैसे भी साथियों, जो टूटे को बनाना और रूठे को मनाना जानता है, वही बुद्धिमान है।
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  • आइये साथियों, आज के लेख की शुरुआत बचपन में सुनी एक कहानी से करते हैं जो हमें व्यवहार कुशल बनने की प्रेरणा देती है। एक बार की बात है रामपुर के राजा ने जंगल जाकर शेर का शिकार करने की योजना बनाई और कुछ सैनिकों और मंत्रियों को लेकर वन की ओर निकल गये। उस रात शेर को खोजने और उसका शिकार करने के प्रयास में राजा जंगल में भटक गये।

    गुजरते वक़्त के साथ वन विहार कर शिकार करने की चाह, अब राजा के लिये एक बड़ी परेशानी का रूप लेती जा रही थी क्योंकि अब उनके पास ना तो भूख मिटाने के लिये भोजन बचा था और ना ही प्यास बुझाने के लिये पानी। जंगल में भटकते-भटकते अचानक ही राजा की निगाह एक झौपड़ी पर पड़ी। राजा ने तुरंत अपने एक सैनिक को आदेश दिया कि वह उस झौपड़ी के मालिक से निवेदन कर पीने के पानी का इन्तज़ाम करे।

    राजा की आज्ञा के अनुसार तुरंत एक सैनिक झौपड़ी की ओर गया और उसके मालिक, जो कि एक अंधा बुजुर्ग था, से बड़े रोब के साथ बोला, ‘ऐ अंधे जरा एक लोटा पीने का पानी दे।’ वह अंधा बुढ़ा शायद थोड़ा सनकी या अकड़ू था उसने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, ‘चल भाग यहाँ से, कुछ नहीं दूँगा तुझे। तेरे जैसे सैनिक से मैं नहीं डरता।’ सैनिक निराश होकर लौट गया और जाकर सारी बात राजा को कह सुनाई। राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि वह जाकर उस बुजुर्ग व्यक्ति से बात करे और पीने के पानी का इन्तज़ाम करे। राजा की आज्ञा पा मंत्री तुरंत उस झौपड़ी में पहुँचा और अंधे बुजुर्ग से बोला, ‘ए अंधे, तुझे ढेर सारा पैसा मिलेगा, जरा हमको पानी दे दो।’ अंधा बुजुर्ग फिर अकड़ गया और बोला, ‘लगता है तू सैनिकों का सरदार है। तेरी चिकनी-चुपड़ी बातों से मैं बहकने वाला नहीं हूँ। जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा।।’

    मंत्री को ख़ाली हाथ लौटता देख प्यास से व्याकुल राजा स्वयं अंधे बुजुर्ग की ओर चल दिये। वहाँ पहुँच कर राजा ने सबसे पहले उस बुजुर्ग अंधे को नमस्कार किया और फिर बड़े विनम्र स्वर में बोले, ‘बाबा, बहुत प्यासा हूँ, प्यास से गला सुख गया है। एक लोटा जल दे देंगे तो बड़ी कृपा होगी।’ अंधे बुजुर्ग ने बड़े सम्मान के साथ राजा को बैठाया और बड़े आदर भरे भाव के साथ बोले, ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों के लिये तो राजा जैसा आदर है। सर्वप्रथम तो यह जल और अन्न ग्रहण कीजिए और साथ ही यह भी बताइये कि मैं आपकी और क्या सेवा कर सकता हूँ। आप जैसे सुधि जनों के लिये तो यह जान भी हाज़िर है।’

    राजा ने सर्वप्रथम अन्न और जल ग्रहण कर अपनी और साथ आये सभी लोगों की भूख और प्यास मिटाई और फिर हाथ जोड़कर अंधे का शुक्रिया अदा करते हुए बड़ी नम्र वाणी में बोले, ‘बाबा, आपको तो दिखाई नहीं देता है फिर भी जल माँगने आये मेरे साथी सैनिक और मंत्री को आपने कैसे पहचान लिया?’ राजा का प्रश्न सुनते ही अन्धे बुजुर्ग मुस्कुराये और बोले, ‘राजन, वाणी का भाव और बोले गये शब्दों से इंसान के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है।

    बात तो दोस्तों, उस अन्धे बुजुर्ग की बिलकुल सही थी। इसीलिये तो हमें बचपन से ही विनम्रता का पाठ सिखाया जाता है। याद रखियेगा विनम्रता के साथ कहे गये मीठे शब्द आपको किसी के दिल में उतरने का मौक़ा देते हैं। वहीं दूसरी ओर कठोर और कड़वे शब्द और रूखा व्यवहार आपको हमेशा के लिये किसी के दिल से उतार सकता है। इसलिये साथियों, सदैव मीठे वचन बोलिये। यह आपको हर स्थिति-परिस्थिति में आदर, स्नेह और प्यार पाने में मदद करेंगे। वैसे भी कहा गया है ग़ुस्सा, अपशब्द और कठोर वचन कमज़ोरों के हथियार हैं।
    आइये साथियों, आज के लेख की शुरुआत बचपन में सुनी एक कहानी से करते हैं जो हमें व्यवहार कुशल बनने की प्रेरणा देती है। एक बार की बात है रामपुर के राजा ने जंगल जाकर शेर का शिकार करने की योजना बनाई और कुछ सैनिकों और मंत्रियों को लेकर वन की ओर निकल गये। उस रात शेर को खोजने और उसका शिकार करने के प्रयास में राजा जंगल में भटक गये। गुजरते वक़्त के साथ वन विहार कर शिकार करने की चाह, अब राजा के लिये एक बड़ी परेशानी का रूप लेती जा रही थी क्योंकि अब उनके पास ना तो भूख मिटाने के लिये भोजन बचा था और ना ही प्यास बुझाने के लिये पानी। जंगल में भटकते-भटकते अचानक ही राजा की निगाह एक झौपड़ी पर पड़ी। राजा ने तुरंत अपने एक सैनिक को आदेश दिया कि वह उस झौपड़ी के मालिक से निवेदन कर पीने के पानी का इन्तज़ाम करे। राजा की आज्ञा के अनुसार तुरंत एक सैनिक झौपड़ी की ओर गया और उसके मालिक, जो कि एक अंधा बुजुर्ग था, से बड़े रोब के साथ बोला, ‘ऐ अंधे जरा एक लोटा पीने का पानी दे।’ वह अंधा बुढ़ा शायद थोड़ा सनकी या अकड़ू था उसने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, ‘चल भाग यहाँ से, कुछ नहीं दूँगा तुझे। तेरे जैसे सैनिक से मैं नहीं डरता।’ सैनिक निराश होकर लौट गया और जाकर सारी बात राजा को कह सुनाई। राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि वह जाकर उस बुजुर्ग व्यक्ति से बात करे और पीने के पानी का इन्तज़ाम करे। राजा की आज्ञा पा मंत्री तुरंत उस झौपड़ी में पहुँचा और अंधे बुजुर्ग से बोला, ‘ए अंधे, तुझे ढेर सारा पैसा मिलेगा, जरा हमको पानी दे दो।’ अंधा बुजुर्ग फिर अकड़ गया और बोला, ‘लगता है तू सैनिकों का सरदार है। तेरी चिकनी-चुपड़ी बातों से मैं बहकने वाला नहीं हूँ। जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा।।’ मंत्री को ख़ाली हाथ लौटता देख प्यास से व्याकुल राजा स्वयं अंधे बुजुर्ग की ओर चल दिये। वहाँ पहुँच कर राजा ने सबसे पहले उस बुजुर्ग अंधे को नमस्कार किया और फिर बड़े विनम्र स्वर में बोले, ‘बाबा, बहुत प्यासा हूँ, प्यास से गला सुख गया है। एक लोटा जल दे देंगे तो बड़ी कृपा होगी।’ अंधे बुजुर्ग ने बड़े सम्मान के साथ राजा को बैठाया और बड़े आदर भरे भाव के साथ बोले, ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों के लिये तो राजा जैसा आदर है। सर्वप्रथम तो यह जल और अन्न ग्रहण कीजिए और साथ ही यह भी बताइये कि मैं आपकी और क्या सेवा कर सकता हूँ। आप जैसे सुधि जनों के लिये तो यह जान भी हाज़िर है।’ राजा ने सर्वप्रथम अन्न और जल ग्रहण कर अपनी और साथ आये सभी लोगों की भूख और प्यास मिटाई और फिर हाथ जोड़कर अंधे का शुक्रिया अदा करते हुए बड़ी नम्र वाणी में बोले, ‘बाबा, आपको तो दिखाई नहीं देता है फिर भी जल माँगने आये मेरे साथी सैनिक और मंत्री को आपने कैसे पहचान लिया?’ राजा का प्रश्न सुनते ही अन्धे बुजुर्ग मुस्कुराये और बोले, ‘राजन, वाणी का भाव और बोले गये शब्दों से इंसान के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है। बात तो दोस्तों, उस अन्धे बुजुर्ग की बिलकुल सही थी। इसीलिये तो हमें बचपन से ही विनम्रता का पाठ सिखाया जाता है। याद रखियेगा विनम्रता के साथ कहे गये मीठे शब्द आपको किसी के दिल में उतरने का मौक़ा देते हैं। वहीं दूसरी ओर कठोर और कड़वे शब्द और रूखा व्यवहार आपको हमेशा के लिये किसी के दिल से उतार सकता है। इसलिये साथियों, सदैव मीठे वचन बोलिये। यह आपको हर स्थिति-परिस्थिति में आदर, स्नेह और प्यार पाने में मदद करेंगे। वैसे भी कहा गया है ग़ुस्सा, अपशब्द और कठोर वचन कमज़ोरों के हथियार हैं।
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  • दोस्तों, मुझे लगता है जीवन में यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि भौतिक सुख-सुविधायें, संसाधन, रिश्ते, ज़मीन-जायदाद आपके जीवन को आसान बना रही है या ग़ुलाम। आपको निश्चित तौर पर मेरी बात थोड़ी अटपटी लग रही होगी। चलिये इसे समझने से पहले हम हाल ही में घटी एक घटना पर चर्चा कर लेते हैं। कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक महिला का काउन्सलिंग करवाने के लिये फ़ोन आया और उन्होंने अपनी बातचीत कुछ ऐसे शुरू की, ‘सर, मैं बहुत अधिक मानसिक तनाव में हूँ। कृपया मार्गदर्शन दिजीए, मेरी मदद कीजिये। आपकी जितनी भी फ़ीस होगी मैं देने के लिये तैयार हूँ।’ उनकी आवाज़ बड़ी गंभीर और परेशानी भरी लग रही थी। एक पल की खामोशी के बाद वे बात आगे बढ़ाते हुए बोली, ‘सर, मैं प्रॉपर्टी के एक केस की वजह से तनाव में हूँ और उसी की वजह से मेरी जान को भी ख़तरा है।’

    असल में उक्त महिला और उनकी सगी बहन के बीच विवाद की जड़ पिता का एक बँगला था, जिसे पाने के लिये यह दोनों लड़ रही थी। जब मैंने उनकी और बहन की वित्तीय स्थिति जानने का प्रयास करा तो मुझे पता चला कि दोनों ही बहनें पचास से सौ करोड़ की वर्थ रखती हैं और जिस बंगले के लिये वे लड़ रही हैं उसकी क़ीमत मात्र तीन से पाँच करोड़ है। उनकी बात सुनते ही मेरे मन में पहला विचार आया कि वे एक छोटी सी चीज के लिये अपने मूल्यवान जीवन को नष्ट कर रही है। मैंने एक किस्से के माध्यम से उनसे एक प्रश्न पूछने का निर्णय लिया और बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘पहले आप मेरे एक छोटे से प्रश्न का जवाब दीजिये फिर हम आपकी समस्या पर विस्तार से चर्चा करते हैं। एक बार एक आदमी गाय को अपने घर की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन वह जाने के लिये तैयार ही नहीं थी। वह आदमी जितना उसे अपनी ओर खींचने का प्रयास करता था, गाय ज़ोर लगा कर उससे उतनी ही अधिक दूर हो जाती थी। अब आप बताइये वह आदमी गाय को अपनी ओर क्यों खींच रहा था या उसे अपने घर क्यों ले जाने का प्रयास कर रहा था?’

    प्रश्न पुरा होते ही वे महिला तपाक से बोली, ‘क्योंकि वह इंसान उस गाय का मालिक था।’ जवाब सुनते ही मैं हल्का सा मुस्कुराया और बोला, ‘मुझे तो नहीं लगता, हाँ यह ज़रूर संभव हो सकता है कि वह आदमी आपके समान सोचता हो।’ इतना कहकर मैं कुछ पलों के लिये चुप हो गया, फिर बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘अगर आप मेरी बात से सहमत ना हों तो उस गाय की रस्सी छोड़ कर देख लो तब आपको पता चल जायेगा कि कौन किसका मालिक है और कौन किसका ग़ुलाम। अगर गाय उस व्यक्ति के पीछे आई तो गाय ग़ुलाम और अगर वह व्यक्ति गाय के पीछे गया तो वह व्यक्ति ग़ुलाम याने जो जिसके पीछे गया, वो उसका गुलाम।’

    मेरे इतना कहते ही वह महिला सोच में पड़ गई और एकटक शून्य को देखने लगी। मैंने उनकी तंद्रा तोड़ते हुए बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मैडम, वास्तव में वह बँगला आपके केस में गाय समान है। उसने आपको अपने मोहपाश में इतना अधिक बांध लिया है कि आप अपनी स्वतंत्रता, अपनी ख़ुशी, अपनी शांति, अपना स्वास्थ्य, अपनी संपत्ति और यहाँ तक की अपना जीवन तक दांव पर लगा चुकी हैं। पिछले कई वर्षों से आपने अपनी अर्जित की हुई संपत्ति, अपने समय, अपने अचीवमेंट का उपयोग अपनी शांति या ख़ुशी के लिये नहीं किया है। ऐसे में अगर आपको कुछ करोड़ और मिल गये तो आप उसका करेंगी क्या? मेरा तो मानना है कि आपको बँगले से ज़्यादा अपने जीवन, अपने रिश्ते, अपने स्वास्थ्य, अपनी शांति, अपनी ख़ुशी को महत्व देना चाहिये।’

    दोस्तों, मुझे नहीं पता मेरा सुझाव सही था या नहीं, लेकिन मेरा तो यही मानना है। अक्सर हम ख़ुद को बहुत सी वस्तुओं और व्यक्तियों का मालिक समझते हैं, पर वास्तव में हम उनके मालिक नहीं, गुलाम होते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकता हमें हैं। उन लोगों या वस्तुओं को हमारी ज़रूरत नहीं होती बल्कि हम ही उनके पीछे पड़े होते हैं। याद रखियेगा, जो जितनी रस्सियाँ पकड़े है, वो उतना ही गुलाम हैं। जिसने सभी रस्सियाँ याने बंधन छोड़ दिये हैं, जिसे किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं है, वही असली मालिक हैं… एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर!!!
    दोस्तों, मुझे लगता है जीवन में यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि भौतिक सुख-सुविधायें, संसाधन, रिश्ते, ज़मीन-जायदाद आपके जीवन को आसान बना रही है या ग़ुलाम। आपको निश्चित तौर पर मेरी बात थोड़ी अटपटी लग रही होगी। चलिये इसे समझने से पहले हम हाल ही में घटी एक घटना पर चर्चा कर लेते हैं। कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक महिला का काउन्सलिंग करवाने के लिये फ़ोन आया और उन्होंने अपनी बातचीत कुछ ऐसे शुरू की, ‘सर, मैं बहुत अधिक मानसिक तनाव में हूँ। कृपया मार्गदर्शन दिजीए, मेरी मदद कीजिये। आपकी जितनी भी फ़ीस होगी मैं देने के लिये तैयार हूँ।’ उनकी आवाज़ बड़ी गंभीर और परेशानी भरी लग रही थी। एक पल की खामोशी के बाद वे बात आगे बढ़ाते हुए बोली, ‘सर, मैं प्रॉपर्टी के एक केस की वजह से तनाव में हूँ और उसी की वजह से मेरी जान को भी ख़तरा है।’ असल में उक्त महिला और उनकी सगी बहन के बीच विवाद की जड़ पिता का एक बँगला था, जिसे पाने के लिये यह दोनों लड़ रही थी। जब मैंने उनकी और बहन की वित्तीय स्थिति जानने का प्रयास करा तो मुझे पता चला कि दोनों ही बहनें पचास से सौ करोड़ की वर्थ रखती हैं और जिस बंगले के लिये वे लड़ रही हैं उसकी क़ीमत मात्र तीन से पाँच करोड़ है। उनकी बात सुनते ही मेरे मन में पहला विचार आया कि वे एक छोटी सी चीज के लिये अपने मूल्यवान जीवन को नष्ट कर रही है। मैंने एक किस्से के माध्यम से उनसे एक प्रश्न पूछने का निर्णय लिया और बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘पहले आप मेरे एक छोटे से प्रश्न का जवाब दीजिये फिर हम आपकी समस्या पर विस्तार से चर्चा करते हैं। एक बार एक आदमी गाय को अपने घर की ओर ले जाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन वह जाने के लिये तैयार ही नहीं थी। वह आदमी जितना उसे अपनी ओर खींचने का प्रयास करता था, गाय ज़ोर लगा कर उससे उतनी ही अधिक दूर हो जाती थी। अब आप बताइये वह आदमी गाय को अपनी ओर क्यों खींच रहा था या उसे अपने घर क्यों ले जाने का प्रयास कर रहा था?’ प्रश्न पुरा होते ही वे महिला तपाक से बोली, ‘क्योंकि वह इंसान उस गाय का मालिक था।’ जवाब सुनते ही मैं हल्का सा मुस्कुराया और बोला, ‘मुझे तो नहीं लगता, हाँ यह ज़रूर संभव हो सकता है कि वह आदमी आपके समान सोचता हो।’ इतना कहकर मैं कुछ पलों के लिये चुप हो गया, फिर बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘अगर आप मेरी बात से सहमत ना हों तो उस गाय की रस्सी छोड़ कर देख लो तब आपको पता चल जायेगा कि कौन किसका मालिक है और कौन किसका ग़ुलाम। अगर गाय उस व्यक्ति के पीछे आई तो गाय ग़ुलाम और अगर वह व्यक्ति गाय के पीछे गया तो वह व्यक्ति ग़ुलाम याने जो जिसके पीछे गया, वो उसका गुलाम।’ मेरे इतना कहते ही वह महिला सोच में पड़ गई और एकटक शून्य को देखने लगी। मैंने उनकी तंद्रा तोड़ते हुए बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘मैडम, वास्तव में वह बँगला आपके केस में गाय समान है। उसने आपको अपने मोहपाश में इतना अधिक बांध लिया है कि आप अपनी स्वतंत्रता, अपनी ख़ुशी, अपनी शांति, अपना स्वास्थ्य, अपनी संपत्ति और यहाँ तक की अपना जीवन तक दांव पर लगा चुकी हैं। पिछले कई वर्षों से आपने अपनी अर्जित की हुई संपत्ति, अपने समय, अपने अचीवमेंट का उपयोग अपनी शांति या ख़ुशी के लिये नहीं किया है। ऐसे में अगर आपको कुछ करोड़ और मिल गये तो आप उसका करेंगी क्या? मेरा तो मानना है कि आपको बँगले से ज़्यादा अपने जीवन, अपने रिश्ते, अपने स्वास्थ्य, अपनी शांति, अपनी ख़ुशी को महत्व देना चाहिये।’ दोस्तों, मुझे नहीं पता मेरा सुझाव सही था या नहीं, लेकिन मेरा तो यही मानना है। अक्सर हम ख़ुद को बहुत सी वस्तुओं और व्यक्तियों का मालिक समझते हैं, पर वास्तव में हम उनके मालिक नहीं, गुलाम होते हैं क्योंकि उनकी आवश्यकता हमें हैं। उन लोगों या वस्तुओं को हमारी ज़रूरत नहीं होती बल्कि हम ही उनके पीछे पड़े होते हैं। याद रखियेगा, जो जितनी रस्सियाँ पकड़े है, वो उतना ही गुलाम हैं। जिसने सभी रस्सियाँ याने बंधन छोड़ दिये हैं, जिसे किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं है, वही असली मालिक हैं… एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर!!!
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  • दोस्तों, सर्वप्रथम तो आप सभी को 77वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। वैसे तो दोस्तों पिछले ७६ वर्षों में हमने लगभग हर क्षेत्र में ज़बरदस्त प्रगति की है, जिसके कारण हमारा देश एक बार फिर विश्वगुरू बनने की ओर अग्रसर है, जो निश्चित तौर पर हम सभी भारतीयों के लिये बड़े गर्व की बात है। लेकिन अगर आप सिक्के का दूसरा पहलू देखेंगे तो पायेंगे कि विश्वगुरू बनने के लिये हमें अभी कुछ आंतरिक समस्याओं से भी निपटना है। जैसे अशिक्षा, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, जातिवाद, गिरते जीवन मूल्य, सत्ता या ताक़त का दुरूपयोग, ख़ुद के हित को देश हित से बड़ा मानना, ग़लत मूल्यों के आधार पर व्यवसायीकरण होना, नियमों की अवहेलना, जैसे सिग्नल तोड़ना, आदि। यह सूची बहुत लंबी है साथियों जो कहीं ना कहीं हमारी राष्ट्रीय छवि और आगे बढ़ने की गति को प्रभावित करती है। इसलिये मैं हमेशा कहता हूँ बिना आंतरिक सुधार के विश्वगुरु बनना असंभव है। अपनी बात को मैं हमारे पड़ोसी देश चीन की कहानी से समझाने का प्रयास करता हूं।

    बात कई सौ साल पुरानी है, चीनी शासक और वहाँ के निवासियों ने मिलकर फ़ैसला लिया कि अब हमें अनावश्यक युद्ध या किसी भी तरह की घुसपैठ से बचकर शांति के साथ रहना चाहिए। अपने इस निर्णय को अमल में लाने के लिये सभी ने मिलकर एक बहुत ऊँची और लंबी दीवार बनाई, जिसे आज हम चीन की महान दीवार (द ग्रेट चायना वॉल) के नाम से जानते हैं। इस दीवार को बनाने का मुख्य उद्देश्य देश की सीमाओं को सुरक्षित बनाना था। वे मानते थे कि दीवार की ऊँचाई के कारण इस पर चढ़ना, इसे पार करना नामुमकिन रहेगा और शायद वे सही थे।

    लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दीवार के अस्तित्व में आने के सौ वर्षों के दौरान तीन बार चीन पर आक्रमण हुआ और तीनों बार दुश्मन की पैदल सेना चीन के अंदर घुसने में सफल हो गई। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर दीवार पर चढ़ना असंभव था तो दुश्मन सैनिंक अंदर कैसे आ गए? असल में साथियों उन सैनिकों को दीवार पर चढ़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि हर बार वे दीवार में बने दरवाज़ों की रक्षा करने वाले सैनिंकों को रिश्वत देकर अंदर आ गये।

    अब अगर आप उपरोक्त घटनाक्रम को बारीकी से देखेंगे तो पायेंगे कि सैनिकों की योजना में कोई कमी नहीं थी, उन्होंने अपनी योजना पर बहुत अच्छे से कार्य किया तथा योजनाबद्ध तरीक़े से दीवार का निर्माण किया। परंतु वे अपने सैनिकों के चरित्र निर्माण में असफ़ल रह गये, जो उनकी हार का मुख्य कारण बन गया। हाँ,यह सही है कि आज, वर्षों बाद भी, चीन की दीवार, चीन की एक स्थायी ताक़त और भावना का शक्तिशाली प्रतीक बन गई है, जिस पर चीन का हर नागरिक गर्व करता है। लेकिन अगर आप इसके दूसरे पहलू पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि वास्तव में यह चीनियों को याद दिलाता है कि मानव चरित्र क्यों श्रेष्ठ होना चाहिये।

    दूसरे शब्दों में कहा जाये तो तीन असफलताओं के बाद मिली सीख से चीनियों को एहसास हुआ कि दुश्मन के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव दीवार बनाना याने लड़ने या बचने के संसाधन इकट्ठा करना नहीं अपितु अच्छे और सच्चे चरित्र का होना है। इस आधार पर साथियों मानव चरित्र का निर्माण होना बाक़ी सब बातों के मुक़ाबले सबसे महत्वपूर्ण है। इसीलिये तो शायद विलियम शेक्सपियर ने कहा है कि, ‘दोष हमारे सितारों में नहीं, बल्कि हममें है।’

    इसलिये दोस्तों, बिना चरित्र को अच्छा बनाये शांति के साथ बड़ी सफलता प्राप्त करना असंभव है। इसलिये मेरा मानना है, बिना राष्ट्रीय चरित्र को अच्छा और मूल्य आधारित बनाये बिना विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र की कल्पना करना एक कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं होगा। आइये साथियों इस ७७ वें स्वतंत्रता दिवस पर हम सब मिलकर एक प्रण लेते हैं कि आज नहीं अभी से ही नियमों का सम्मान करते हुए मूल्य आधारित जीवन जियेंगे। एक बार फिर आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!
    दोस्तों, सर्वप्रथम तो आप सभी को 77वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। वैसे तो दोस्तों पिछले ७६ वर्षों में हमने लगभग हर क्षेत्र में ज़बरदस्त प्रगति की है, जिसके कारण हमारा देश एक बार फिर विश्वगुरू बनने की ओर अग्रसर है, जो निश्चित तौर पर हम सभी भारतीयों के लिये बड़े गर्व की बात है। लेकिन अगर आप सिक्के का दूसरा पहलू देखेंगे तो पायेंगे कि विश्वगुरू बनने के लिये हमें अभी कुछ आंतरिक समस्याओं से भी निपटना है। जैसे अशिक्षा, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, जातिवाद, गिरते जीवन मूल्य, सत्ता या ताक़त का दुरूपयोग, ख़ुद के हित को देश हित से बड़ा मानना, ग़लत मूल्यों के आधार पर व्यवसायीकरण होना, नियमों की अवहेलना, जैसे सिग्नल तोड़ना, आदि। यह सूची बहुत लंबी है साथियों जो कहीं ना कहीं हमारी राष्ट्रीय छवि और आगे बढ़ने की गति को प्रभावित करती है। इसलिये मैं हमेशा कहता हूँ बिना आंतरिक सुधार के विश्वगुरु बनना असंभव है। अपनी बात को मैं हमारे पड़ोसी देश चीन की कहानी से समझाने का प्रयास करता हूं। बात कई सौ साल पुरानी है, चीनी शासक और वहाँ के निवासियों ने मिलकर फ़ैसला लिया कि अब हमें अनावश्यक युद्ध या किसी भी तरह की घुसपैठ से बचकर शांति के साथ रहना चाहिए। अपने इस निर्णय को अमल में लाने के लिये सभी ने मिलकर एक बहुत ऊँची और लंबी दीवार बनाई, जिसे आज हम चीन की महान दीवार (द ग्रेट चायना वॉल) के नाम से जानते हैं। इस दीवार को बनाने का मुख्य उद्देश्य देश की सीमाओं को सुरक्षित बनाना था। वे मानते थे कि दीवार की ऊँचाई के कारण इस पर चढ़ना, इसे पार करना नामुमकिन रहेगा और शायद वे सही थे। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दीवार के अस्तित्व में आने के सौ वर्षों के दौरान तीन बार चीन पर आक्रमण हुआ और तीनों बार दुश्मन की पैदल सेना चीन के अंदर घुसने में सफल हो गई। अब आप सोच रहे होंगे कि अगर दीवार पर चढ़ना असंभव था तो दुश्मन सैनिंक अंदर कैसे आ गए? असल में साथियों उन सैनिकों को दीवार पर चढ़ने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि हर बार वे दीवार में बने दरवाज़ों की रक्षा करने वाले सैनिंकों को रिश्वत देकर अंदर आ गये। अब अगर आप उपरोक्त घटनाक्रम को बारीकी से देखेंगे तो पायेंगे कि सैनिकों की योजना में कोई कमी नहीं थी, उन्होंने अपनी योजना पर बहुत अच्छे से कार्य किया तथा योजनाबद्ध तरीक़े से दीवार का निर्माण किया। परंतु वे अपने सैनिकों के चरित्र निर्माण में असफ़ल रह गये, जो उनकी हार का मुख्य कारण बन गया। हाँ,यह सही है कि आज, वर्षों बाद भी, चीन की दीवार, चीन की एक स्थायी ताक़त और भावना का शक्तिशाली प्रतीक बन गई है, जिस पर चीन का हर नागरिक गर्व करता है। लेकिन अगर आप इसके दूसरे पहलू पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि वास्तव में यह चीनियों को याद दिलाता है कि मानव चरित्र क्यों श्रेष्ठ होना चाहिये। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो तीन असफलताओं के बाद मिली सीख से चीनियों को एहसास हुआ कि दुश्मन के खिलाफ सबसे अच्छा बचाव दीवार बनाना याने लड़ने या बचने के संसाधन इकट्ठा करना नहीं अपितु अच्छे और सच्चे चरित्र का होना है। इस आधार पर साथियों मानव चरित्र का निर्माण होना बाक़ी सब बातों के मुक़ाबले सबसे महत्वपूर्ण है। इसीलिये तो शायद विलियम शेक्सपियर ने कहा है कि, ‘दोष हमारे सितारों में नहीं, बल्कि हममें है।’ इसलिये दोस्तों, बिना चरित्र को अच्छा बनाये शांति के साथ बड़ी सफलता प्राप्त करना असंभव है। इसलिये मेरा मानना है, बिना राष्ट्रीय चरित्र को अच्छा और मूल्य आधारित बनाये बिना विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र की कल्पना करना एक कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं होगा। आइये साथियों इस ७७ वें स्वतंत्रता दिवस पर हम सब मिलकर एक प्रण लेते हैं कि आज नहीं अभी से ही नियमों का सम्मान करते हुए मूल्य आधारित जीवन जियेंगे। एक बार फिर आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!
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  • आइये दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत कई साल पहले सुनी एक प्यारी सी कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है, रामपुर में एक भोलू नाम का नाई अपने परिवार के साथ बड़े मज़े में रहा करता था। अपने नाम के अनुरूप ही भोलू एकदम भोला और ईमानदार था। नाई की पत्नी सुशीला भी बड़ी कुशलता के साथ अपने पति की कमाई से ख़ुशी-ख़ुशी अपनी गृहस्थी चलाया करती थी। कुल मिलाकर कहा जाये तो उनकी ज़िंदगी बड़े मज़े में कट रही थी। भोला की कार्यकुशलता और स्वभाव को देख एक दिन वहाँ के राजा ने उसे अपने महल में बुलवाया और एक स्वर्ण मुद्रा प्रतिदिन में महल में आकर हजामत बनाने का कहा। नाई ने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया और उसी दिन से अपना कार्य शुरू कर दिया।

    जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे वैसे-वैसे भोला का जीवन बेहतर बनता जा रहा था। अब वह एक बड़े घर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बड़े मज़े से रहा करता था। देखते ही देखते कुछ ही वर्षों में भोला अपनी बढीं हुई आमदनी और बचत की आदत के कारण बहुत अमीर बन गया। एक दिन जब वह अपने कार्य पूर्ण कर घर वापस जा रहा था तब उसे रास्ते में एक यक्ष मिला। यक्ष ने बड़ी विनम्रता के साथ नाई से कहा, ‘भोला हमने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुन रखे हैं और इसीलिये मैं तुमसे बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने की मुद्राओं से भरे सात घड़े देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरी इस छोटी सी भेंट को स्वीकारोगे?’ यक्ष की बात सुन भोला पहले तो चौंका, फिर मन में उपजे लालच के कारण यक्ष को हाँ कह बैठा। भोला की हाँ सुनते ही यक्ष मुस्कुराया और बोला, ‘ठीक है सातों घड़े तुम्हारे घर पहुँच जाएँगे।’

    ख़ुशी-ख़ुशी भोला तुरंत घर पहुँचा और वहाँ सात घड़े रखे देख हैरान रह गया। उसने एक ही साँस में पत्नी को सारी घटना कह सुनाई और एक-एक घड़ा खोलकर देखने लगा। अचानक ही सातवें घड़े को देख भोला चिंतित हो गया। असल में सातवाँ घड़ा आधा ख़ाली था। कुछ पलों बाद भोला ने ख़ुद को सँभालते हुए अपनी पत्नी से कहा, ‘कोई बात नहीं, हम अपनी बचत को इस ख़ाली घड़े में डाल दिया करेंगे। देखना जल्द ही यह घड़ा भी भर जायेगा और फिर इन सात घड़ों के सहारे हम अपना जीवन बड़े आराम से काट लेंगे।

    अगले दिन से भोला और उसकी पत्नी ने अपनी बचत को उस सातवें घड़े में डालना शुरू कर दिया। कई महीनों तक ऐसा करते रहने के बाद भी सातवाँ घड़ा हमेशा पूर्व की ही तरह आधा ख़ाली नज़र आता था और उसे देख भोला की चिंता बढ़ती जाती थी। धीरे-धीरे भोला बड़ा कंजूस होता जा रहा था, क्योंकि वह सोने के सिक्कों से सातवें घड़े को जल्द-से-जल्द भरना चाहता था। इसी कारण अब कई बार नाई और उसकी पत्नी में कहा सुनी होने लगी और उनके घर की सारी शांति और ख़ुशी भी ग़ायब हो गई। हालाँकि इस बीच भोला की पत्नी ने उसे कई बार समझाने का प्रयास किया, पर भोला के सिर पर तो बस सातवें घड़े को भरने की धुन सवार थी। इसी वजह से अब पति-पत्नी में झगड़ा भी होने लगा था।

    वहीं दूसरी और भोला के उखड़े स्वभाव को देख राजा को लगा कि शायद भोला की आवश्यकताएँ बढ़ गई है। विचार आते ही राजा ने भोला के मेहनताने को दोगुना कर दिया। लेकिन इसका भी उसके स्वभाव पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा वह अभी भी चिड़चिड़ाया करता था और दुखी रहता था। एक दिन राजा ने उसे अपने समीप बैठाया और पूछा, ‘कहीं तुम यक्ष के दिये सात घड़ों के चक्कर में तो नहीं फँस गये?’ प्रश्न सुनते ही नाई ने राजा को सारी बात सच-सच कह सुनाई। जिसे सुनते ही राजा ने नाई को बताया कि सातवाँ घड़ा साक्षात लोभ है। उसकी भूख कभी मिट नहीं सकती है इसलिये इसे नकारे बिना चैन और सुकून मिलना असंभव है।

    बात तो राजा की एकदम सही थी दोस्तों। लालच या लोभ एक ऐसा भाव है जो आपकी ख़ुशियों को चुरा लेता है। यह आपको आपके पास जो है उसका लुत्फ़ नहीं उठाने देता और जो नहीं है उसमें उलझाये रखता है। दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य हर हाल में खुश रहना है तो आज से ही लालच या लोभ को छोड़कर जो हमारे पास है, उसमें खुश रहना सीखना होगा।

    आइये दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत कई साल पहले सुनी एक प्यारी सी कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है, रामपुर में एक भोलू नाम का नाई अपने परिवार के साथ बड़े मज़े में रहा करता था। अपने नाम के अनुरूप ही भोलू एकदम भोला और ईमानदार था। नाई की पत्नी सुशीला भी बड़ी कुशलता के साथ अपने पति की कमाई से ख़ुशी-ख़ुशी अपनी गृहस्थी चलाया करती थी। कुल मिलाकर कहा जाये तो उनकी ज़िंदगी बड़े मज़े में कट रही थी। भोला की कार्यकुशलता और स्वभाव को देख एक दिन वहाँ के राजा ने उसे अपने महल में बुलवाया और एक स्वर्ण मुद्रा प्रतिदिन में महल में आकर हजामत बनाने का कहा। नाई ने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार लिया और उसी दिन से अपना कार्य शुरू कर दिया। जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे वैसे-वैसे भोला का जीवन बेहतर बनता जा रहा था। अब वह एक बड़े घर में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बड़े मज़े से रहा करता था। देखते ही देखते कुछ ही वर्षों में भोला अपनी बढीं हुई आमदनी और बचत की आदत के कारण बहुत अमीर बन गया। एक दिन जब वह अपने कार्य पूर्ण कर घर वापस जा रहा था तब उसे रास्ते में एक यक्ष मिला। यक्ष ने बड़ी विनम्रता के साथ नाई से कहा, ‘भोला हमने तुम्हारी ईमानदारी के बड़े चर्चे सुन रखे हैं और इसीलिये मैं तुमसे बहुत खुश हूँ और तुम्हें सोने की मुद्राओं से भरे सात घड़े देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरी इस छोटी सी भेंट को स्वीकारोगे?’ यक्ष की बात सुन भोला पहले तो चौंका, फिर मन में उपजे लालच के कारण यक्ष को हाँ कह बैठा। भोला की हाँ सुनते ही यक्ष मुस्कुराया और बोला, ‘ठीक है सातों घड़े तुम्हारे घर पहुँच जाएँगे।’ ख़ुशी-ख़ुशी भोला तुरंत घर पहुँचा और वहाँ सात घड़े रखे देख हैरान रह गया। उसने एक ही साँस में पत्नी को सारी घटना कह सुनाई और एक-एक घड़ा खोलकर देखने लगा। अचानक ही सातवें घड़े को देख भोला चिंतित हो गया। असल में सातवाँ घड़ा आधा ख़ाली था। कुछ पलों बाद भोला ने ख़ुद को सँभालते हुए अपनी पत्नी से कहा, ‘कोई बात नहीं, हम अपनी बचत को इस ख़ाली घड़े में डाल दिया करेंगे। देखना जल्द ही यह घड़ा भी भर जायेगा और फिर इन सात घड़ों के सहारे हम अपना जीवन बड़े आराम से काट लेंगे। अगले दिन से भोला और उसकी पत्नी ने अपनी बचत को उस सातवें घड़े में डालना शुरू कर दिया। कई महीनों तक ऐसा करते रहने के बाद भी सातवाँ घड़ा हमेशा पूर्व की ही तरह आधा ख़ाली नज़र आता था और उसे देख भोला की चिंता बढ़ती जाती थी। धीरे-धीरे भोला बड़ा कंजूस होता जा रहा था, क्योंकि वह सोने के सिक्कों से सातवें घड़े को जल्द-से-जल्द भरना चाहता था। इसी कारण अब कई बार नाई और उसकी पत्नी में कहा सुनी होने लगी और उनके घर की सारी शांति और ख़ुशी भी ग़ायब हो गई। हालाँकि इस बीच भोला की पत्नी ने उसे कई बार समझाने का प्रयास किया, पर भोला के सिर पर तो बस सातवें घड़े को भरने की धुन सवार थी। इसी वजह से अब पति-पत्नी में झगड़ा भी होने लगा था। वहीं दूसरी और भोला के उखड़े स्वभाव को देख राजा को लगा कि शायद भोला की आवश्यकताएँ बढ़ गई है। विचार आते ही राजा ने भोला के मेहनताने को दोगुना कर दिया। लेकिन इसका भी उसके स्वभाव पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा वह अभी भी चिड़चिड़ाया करता था और दुखी रहता था। एक दिन राजा ने उसे अपने समीप बैठाया और पूछा, ‘कहीं तुम यक्ष के दिये सात घड़ों के चक्कर में तो नहीं फँस गये?’ प्रश्न सुनते ही नाई ने राजा को सारी बात सच-सच कह सुनाई। जिसे सुनते ही राजा ने नाई को बताया कि सातवाँ घड़ा साक्षात लोभ है। उसकी भूख कभी मिट नहीं सकती है इसलिये इसे नकारे बिना चैन और सुकून मिलना असंभव है। बात तो राजा की एकदम सही थी दोस्तों। लालच या लोभ एक ऐसा भाव है जो आपकी ख़ुशियों को चुरा लेता है। यह आपको आपके पास जो है उसका लुत्फ़ नहीं उठाने देता और जो नहीं है उसमें उलझाये रखता है। दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य हर हाल में खुश रहना है तो आज से ही लालच या लोभ को छोड़कर जो हमारे पास है, उसमें खुश रहना सीखना होगा।
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  • दोस्तों, भाग्य और कर्म दो ऐसे विषय हैं जिन पर सबका मत समान होना थोड़ा मुश्किल ही है। कोई आपको कर्म को प्रधान बतायेगा, तो कोई भाग्य को महत्वपूर्ण बताते हुए कहेगा की ‘कुछ भी कर लो मिलेगा वही जो क़िस्मत में लिखा होगा।’ लेकिन अगर आप इस विषय में मेरी धारणा या राय पूछेंगे तो मैं कर्म को प्रधान बताऊँगा क्योंकि हो सकता है ईश्वर ने मेरे भाग्य में लिखा हो कि कर्म करने पर ही मुझे वांछित फल प्राप्त होंगे। वैसे कर्म को प्रधान मानने की मेरी एक और वजह है, भाग्य में क्या लिखा है, यह हममें से किसी को भी पता नहीं है और ना ही हममें से कोई इसे पढ़ सकता है। लेकिन कर्म करना सदैव हम सभी के हाथ में होता है।

    ऐसी स्थिति में एक प्रश्न निश्चित तौर पर आपके मन में आ सकता है कि अगर कर्म ही प्रधान था तो फिर ‘ईश्वर की इच्छा’ और ‘भाग्य के अनुसार ही हमें फल मिलता है’ या ‘ईश्वर की इच्छानुसार ही सब कुछ घटता है’, जैसी बातें या मान्यतायें कैसे प्रचलन में आ गई? असल में दोस्तों, मुझे तो लगता है कि हमारे पूर्वजों और गुरुओं ने इन मान्यताओं को हमें विपत्ति याने विपरीत और चुनौती भरे समय में टूटने और अच्छे समय में अहंकारी बनने से बचाने के लिये बनाया होगा।

    मेरी बात पर प्रतिक्रिया देने के पूर्व साथियों थोड़ा गम्भीरता से सोचियेगा। मेरा विचार नास्तिक विचारधारा से प्रेरित नहीं है और ना ही मैं परमपिता परमेश्वर अर्थात ईश्वर या भगवान की सत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा हूँ। मैं तो ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिये कह पा रहा हूँ क्योंकि मैं उस परमपिता परमेश्वर के प्रति पूर्णतः

    आस्थावान हूँ। आप ख़ुद सोचकर देखिये जिस परमपिता परमेश्वर ने हमें देवताओं समान असीम शक्तियों के साथ इस धरती पर भेजा है, क्या वह परमेश्वर हमें भाग्य जैसे किसी बंधन में बांध कर रखेगा? मेरी नज़र में तो शायद नहीं। इसीलिये मैं भाग्य और हरिइच्छा जैसी बातों को मान्यता मान रहा हूँ।

    याद रखियेगा, अगर ईश्वरीय सत्ता की आड़ में किसी भी इंसान ने बार-बार इन मान्यताओं का उपयोग कर्मप्रधानता के सिद्धांत के विरुद्ध जाकर किया तो वह व्यक्ति निश्चित तौर पर कायर, अकर्मण्य और निरुत्साही बन जायेगा। जी हाँ दोस्तों, प्रतिभा एक कौशल है अर्थात् यह कोई जन्मजात योग्यता नहीं है और अगर यह जन्मजात योग्यता नहीं है तो निच्छित तौर पर यह आसमान से बरसती भी नहीं होगी और ना ही राम-राम रटने से मिलती होगी। यह तो एक ऐसी विशेषता है जिसे कर्म करते हुए अपने अंदर विकसित किया जा सकता है। इस आधार पर प्रतिभावान बनने के लिये आपका कर्मप्रधान मनुष्य होना ही पर्याप्त है।

    अगर आपको अभी भी मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो एक बात बताइये, सवर्णों और पढ़े-लिखों के मुक़ाबले ईश्वर ने कबीरदास जी या रैदास जी जैसे लोगों को इतना विशेष या प्रतिभावान क्यों बनाया? इसी तरह ढेरों बलिष्ठ, बलवान और पैसे वालों को छोड़कर कमजोर शरीर वाले गांधीजी और कुरुप आचार्य चाणक्य को विशेष योग्यता या प्रतिभा का धनी बनाने के लिये क्यों चुना?

    असल में साथियों, प्रतिभा का किसी भी विशेषता से लेना- देना नहीं है। वह तो बिना किसी भेदभाव के उसके पास जाती है जो उसे पाने के लिये अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा के साथ कर्म करता है। इसके विपरीत अगर वह बुरे कर्मों या व्यसनों में उलझता है तो वह कितना भी सक्षम क्यों न हो, वह अपना सारा समय, संपत्ति और जीवन निरर्थक ही गँवा देता है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे अपव्ययी अपनी बुरी आदतों को पूरा करने के लिये अपनी सारी संपत्ति गँवा देता है। साथियों यदि आप वाक़ई अपने जीवन में सफल बनना चाहते हैं तो ईश्वर पर विश्वास रखें क्योंकि उसकी सत्ता भाग्य नहीं न्याय प्रधान है। चूँकि ईश्वर सर्वव्यापी है इसलिये वह हमारे कर्मों के अनुरूप फल देता है। याने हम अपने कर्मों के आधार पर ईश्वर द्वारा लिये गये निर्णय के अनुरूप जीवन में गिरते या उठते हैं। एक बार विचार करके देखियेगा ज़रूर…
    दोस्तों, भाग्य और कर्म दो ऐसे विषय हैं जिन पर सबका मत समान होना थोड़ा मुश्किल ही है। कोई आपको कर्म को प्रधान बतायेगा, तो कोई भाग्य को महत्वपूर्ण बताते हुए कहेगा की ‘कुछ भी कर लो मिलेगा वही जो क़िस्मत में लिखा होगा।’ लेकिन अगर आप इस विषय में मेरी धारणा या राय पूछेंगे तो मैं कर्म को प्रधान बताऊँगा क्योंकि हो सकता है ईश्वर ने मेरे भाग्य में लिखा हो कि कर्म करने पर ही मुझे वांछित फल प्राप्त होंगे। वैसे कर्म को प्रधान मानने की मेरी एक और वजह है, भाग्य में क्या लिखा है, यह हममें से किसी को भी पता नहीं है और ना ही हममें से कोई इसे पढ़ सकता है। लेकिन कर्म करना सदैव हम सभी के हाथ में होता है। ऐसी स्थिति में एक प्रश्न निश्चित तौर पर आपके मन में आ सकता है कि अगर कर्म ही प्रधान था तो फिर ‘ईश्वर की इच्छा’ और ‘भाग्य के अनुसार ही हमें फल मिलता है’ या ‘ईश्वर की इच्छानुसार ही सब कुछ घटता है’, जैसी बातें या मान्यतायें कैसे प्रचलन में आ गई? असल में दोस्तों, मुझे तो लगता है कि हमारे पूर्वजों और गुरुओं ने इन मान्यताओं को हमें विपत्ति याने विपरीत और चुनौती भरे समय में टूटने और अच्छे समय में अहंकारी बनने से बचाने के लिये बनाया होगा। मेरी बात पर प्रतिक्रिया देने के पूर्व साथियों थोड़ा गम्भीरता से सोचियेगा। मेरा विचार नास्तिक विचारधारा से प्रेरित नहीं है और ना ही मैं परमपिता परमेश्वर अर्थात ईश्वर या भगवान की सत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा हूँ। मैं तो ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिये कह पा रहा हूँ क्योंकि मैं उस परमपिता परमेश्वर के प्रति पूर्णतः आस्थावान हूँ। आप ख़ुद सोचकर देखिये जिस परमपिता परमेश्वर ने हमें देवताओं समान असीम शक्तियों के साथ इस धरती पर भेजा है, क्या वह परमेश्वर हमें भाग्य जैसे किसी बंधन में बांध कर रखेगा? मेरी नज़र में तो शायद नहीं। इसीलिये मैं भाग्य और हरिइच्छा जैसी बातों को मान्यता मान रहा हूँ। याद रखियेगा, अगर ईश्वरीय सत्ता की आड़ में किसी भी इंसान ने बार-बार इन मान्यताओं का उपयोग कर्मप्रधानता के सिद्धांत के विरुद्ध जाकर किया तो वह व्यक्ति निश्चित तौर पर कायर, अकर्मण्य और निरुत्साही बन जायेगा। जी हाँ दोस्तों, प्रतिभा एक कौशल है अर्थात् यह कोई जन्मजात योग्यता नहीं है और अगर यह जन्मजात योग्यता नहीं है तो निच्छित तौर पर यह आसमान से बरसती भी नहीं होगी और ना ही राम-राम रटने से मिलती होगी। यह तो एक ऐसी विशेषता है जिसे कर्म करते हुए अपने अंदर विकसित किया जा सकता है। इस आधार पर प्रतिभावान बनने के लिये आपका कर्मप्रधान मनुष्य होना ही पर्याप्त है। अगर आपको अभी भी मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो एक बात बताइये, सवर्णों और पढ़े-लिखों के मुक़ाबले ईश्वर ने कबीरदास जी या रैदास जी जैसे लोगों को इतना विशेष या प्रतिभावान क्यों बनाया? इसी तरह ढेरों बलिष्ठ, बलवान और पैसे वालों को छोड़कर कमजोर शरीर वाले गांधीजी और कुरुप आचार्य चाणक्य को विशेष योग्यता या प्रतिभा का धनी बनाने के लिये क्यों चुना? असल में साथियों, प्रतिभा का किसी भी विशेषता से लेना- देना नहीं है। वह तो बिना किसी भेदभाव के उसके पास जाती है जो उसे पाने के लिये अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा के साथ कर्म करता है। इसके विपरीत अगर वह बुरे कर्मों या व्यसनों में उलझता है तो वह कितना भी सक्षम क्यों न हो, वह अपना सारा समय, संपत्ति और जीवन निरर्थक ही गँवा देता है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे अपव्ययी अपनी बुरी आदतों को पूरा करने के लिये अपनी सारी संपत्ति गँवा देता है। साथियों यदि आप वाक़ई अपने जीवन में सफल बनना चाहते हैं तो ईश्वर पर विश्वास रखें क्योंकि उसकी सत्ता भाग्य नहीं न्याय प्रधान है। चूँकि ईश्वर सर्वव्यापी है इसलिये वह हमारे कर्मों के अनुरूप फल देता है। याने हम अपने कर्मों के आधार पर ईश्वर द्वारा लिये गये निर्णय के अनुरूप जीवन में गिरते या उठते हैं। एक बार विचार करके देखियेगा ज़रूर…
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  • दोस्तों, कहते हैं ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना करते वक़्त इस ब्रह्मांड में सबसे पहले धरती का निर्माण किया। लेकिन पर्वत, खाई, मैदान, चट्टान, पत्थर आदि को जड़ देखते-देखते वे जल्द ही बोर हो गये। उन्होंने सोचा पृथ्वी थोड़ी रंग-बिरंगी होना चाहिये। यह विचार आते ही ब्रह्मा जी ने पेड़-पौधे, फल-फूल आदि की रचना की। लेकिन जल्द ही वे इससे भी बोर हो गये क्योंकि हर वस्तु अपने स्थान पर ही जड़ थी। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी ने पशु-पक्षी आदि को इस धरती पर भेजा। अब ब्रह्मा जी अपनी इस रंग-बिरंगी, चलती-फिरती दुनिया को देख बड़े खुश थे। एक दिन उन्होंने सोचा क्यों न मैं अब ऐसे जीव की रचना करूँ जो स्वयं इस दुनिया को रोज़ आगे बढ़ा सके, कुछ न कुछ नया कर सके। विचार आते ही दोस्तों ब्रह्मा जी ने मनुष्यों की रचना करी।

    कहते हैं ब्रह्मा जी को इस रचना के बाद कुछ और नया करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई क्योंकि उन्होंने इस इंसान रूपी जीव को देवताओं समान सभी शक्तियाँ दी थी। बस अंतर इतना था कि उन्होंने देवताओं की बात मान यह सभी शक्तियाँ सुप्त अवस्था में दी थी क्योंकि देवताओं को डर था कि अगर सभी मनुष्य अपनी शक्तियों को पहचान गये तो उन्हें कौन पूछेगा?

    इसी कारण दोस्तों, आज तक इंसान अपनी शक्तियों को पहचान नहीं पाया है और मानव या इंसान के रूप में जन्म लेने के बाद भी वह कभी पत्थर, तो कभी वनस्पति, तो कभी जानवरों समान जीवन जीता है। याने कभी सिर्फ़ ख़ुद के लिये, तो कभी अपने परिवार, तो कभी चुने हुए समूह के लिये जीवन जीता है। इसीलिये साथियों मानव जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक आप मानव याने इंसान के रूप में जन्म लेने के बाद भी इंसानियत के साथ जीना नहीं सीख जाते हैं, तब तक अपनी शक्तियों को पहचान पाना मेरी नज़र में तो असंभव ही है।

    उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आपको जीवन जीने की कला सीखनी होगी। याद रखियेगा मैं, मेरा, मेरे अपने, मेरा धर्म आदि करने और इस आधार पर आनंद के साधन, सम्पति और पैसे जुटाने पर यह लक्ष्य नहीं मिलेगा। इसीलिये कहते हैं जीवन का असली आनंद और उद्देश्य साधन और संग्रह से नहीं, अपितु साधना से प्राप्त होता है। वैसे यह कला आप पशु-पक्षियों से भी सीख सकते हो। वे कभी भी, कुछ भी संग्रह नहीं करते, लेकिन फिर भी प्रकृति उन्हें जीवनोपयोगी सभी कुछ आवश्यक मात्रा में उपलब्ध करवा देती है।

    दोस्तों, अगर आप वाक़ई अपनी असीम क्षमताओं का अनुभव करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम अपने अंदर झाँकना शुरू कीजिए। याद रखियेगा, शक्तियाँ, आनंद और तृप्ति तीनों ही आपके भीतर है। इनका संबंध आपकी आत्मा से है ना की आपके मन से। मन आपको बाहरी दुनिया में उलझाकर रखेगा, उसे कितना भी क्यों ना मिल जाये, यह फिर भी अपूर्णता का एहसास करवायेगा। याद रखियेगा साथियों, जिसने ख़ुद को जान लिया, ख़ुद की शक्तियों को पहचान लिया, वो अपने भीतर झांक कर तृप्त हो जायेगा। उसे बाहरी अपूर्णताएँ कभी परेशान नहीं करेगी।

    कहते हैं साथियों, ८४ लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलता है अर्थात् यह ईश्वर का हमें दिया हुआ एक उपहार है और अगर यह वाक़ई उपहार है तो निश्चित तौर पर ईश्वर ने इसे आनन्दमय बनाया होगा। लेकिन हम बाहर देखने की अपनी आदत के कारण इच्छाओं, वासनाओं में उलझ जाते हैं और इसे कष्टप्रद और क्लेशमय बनाते हैं। तो आइये साथियों, आज से अपने जीवन को आनंदमयी बनाने के लिये सबसे पहले संग्रह करने को प्रवृति को छोड़ते हैं और अपने भीतर की यात्रा शुरू करते हैं। याद रखियेगा, जिसने इच्छाओं को छोड़कर, ख़ुद को पहचान लिया उसने आवश्यकताओं के आधार पर जीना सीख लिया और जिसने जीना सीख लिया, समझो उसने सुखमय जीवन का सूत्र समझ लिया।
    दोस्तों, कहते हैं ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना करते वक़्त इस ब्रह्मांड में सबसे पहले धरती का निर्माण किया। लेकिन पर्वत, खाई, मैदान, चट्टान, पत्थर आदि को जड़ देखते-देखते वे जल्द ही बोर हो गये। उन्होंने सोचा पृथ्वी थोड़ी रंग-बिरंगी होना चाहिये। यह विचार आते ही ब्रह्मा जी ने पेड़-पौधे, फल-फूल आदि की रचना की। लेकिन जल्द ही वे इससे भी बोर हो गये क्योंकि हर वस्तु अपने स्थान पर ही जड़ थी। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी ने पशु-पक्षी आदि को इस धरती पर भेजा। अब ब्रह्मा जी अपनी इस रंग-बिरंगी, चलती-फिरती दुनिया को देख बड़े खुश थे। एक दिन उन्होंने सोचा क्यों न मैं अब ऐसे जीव की रचना करूँ जो स्वयं इस दुनिया को रोज़ आगे बढ़ा सके, कुछ न कुछ नया कर सके। विचार आते ही दोस्तों ब्रह्मा जी ने मनुष्यों की रचना करी। कहते हैं ब्रह्मा जी को इस रचना के बाद कुछ और नया करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई क्योंकि उन्होंने इस इंसान रूपी जीव को देवताओं समान सभी शक्तियाँ दी थी। बस अंतर इतना था कि उन्होंने देवताओं की बात मान यह सभी शक्तियाँ सुप्त अवस्था में दी थी क्योंकि देवताओं को डर था कि अगर सभी मनुष्य अपनी शक्तियों को पहचान गये तो उन्हें कौन पूछेगा? इसी कारण दोस्तों, आज तक इंसान अपनी शक्तियों को पहचान नहीं पाया है और मानव या इंसान के रूप में जन्म लेने के बाद भी वह कभी पत्थर, तो कभी वनस्पति, तो कभी जानवरों समान जीवन जीता है। याने कभी सिर्फ़ ख़ुद के लिये, तो कभी अपने परिवार, तो कभी चुने हुए समूह के लिये जीवन जीता है। इसीलिये साथियों मानव जन्म मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक आप मानव याने इंसान के रूप में जन्म लेने के बाद भी इंसानियत के साथ जीना नहीं सीख जाते हैं, तब तक अपनी शक्तियों को पहचान पाना मेरी नज़र में तो असंभव ही है। उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आपको जीवन जीने की कला सीखनी होगी। याद रखियेगा मैं, मेरा, मेरे अपने, मेरा धर्म आदि करने और इस आधार पर आनंद के साधन, सम्पति और पैसे जुटाने पर यह लक्ष्य नहीं मिलेगा। इसीलिये कहते हैं जीवन का असली आनंद और उद्देश्य साधन और संग्रह से नहीं, अपितु साधना से प्राप्त होता है। वैसे यह कला आप पशु-पक्षियों से भी सीख सकते हो। वे कभी भी, कुछ भी संग्रह नहीं करते, लेकिन फिर भी प्रकृति उन्हें जीवनोपयोगी सभी कुछ आवश्यक मात्रा में उपलब्ध करवा देती है। दोस्तों, अगर आप वाक़ई अपनी असीम क्षमताओं का अनुभव करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम अपने अंदर झाँकना शुरू कीजिए। याद रखियेगा, शक्तियाँ, आनंद और तृप्ति तीनों ही आपके भीतर है। इनका संबंध आपकी आत्मा से है ना की आपके मन से। मन आपको बाहरी दुनिया में उलझाकर रखेगा, उसे कितना भी क्यों ना मिल जाये, यह फिर भी अपूर्णता का एहसास करवायेगा। याद रखियेगा साथियों, जिसने ख़ुद को जान लिया, ख़ुद की शक्तियों को पहचान लिया, वो अपने भीतर झांक कर तृप्त हो जायेगा। उसे बाहरी अपूर्णताएँ कभी परेशान नहीं करेगी। कहते हैं साथियों, ८४ लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलता है अर्थात् यह ईश्वर का हमें दिया हुआ एक उपहार है और अगर यह वाक़ई उपहार है तो निश्चित तौर पर ईश्वर ने इसे आनन्दमय बनाया होगा। लेकिन हम बाहर देखने की अपनी आदत के कारण इच्छाओं, वासनाओं में उलझ जाते हैं और इसे कष्टप्रद और क्लेशमय बनाते हैं। तो आइये साथियों, आज से अपने जीवन को आनंदमयी बनाने के लिये सबसे पहले संग्रह करने को प्रवृति को छोड़ते हैं और अपने भीतर की यात्रा शुरू करते हैं। याद रखियेगा, जिसने इच्छाओं को छोड़कर, ख़ुद को पहचान लिया उसने आवश्यकताओं के आधार पर जीना सीख लिया और जिसने जीना सीख लिया, समझो उसने सुखमय जीवन का सूत्र समझ लिया।
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  • आइये साथियों आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। कई साल पहले एक नवयुवक शहर के सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ के पास पहुँचा और उन्हें प्रणाम करते हुए बोला, ‘गुरुजी, मेरी संगीत में अथाह रुचि है। वास्तव मे संगीत ही मेरे लिए जीवन है और आप संगीत के महान ज्ञाता और आचार्य है। क्या आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर, संगीत में निपुणता पाने में मदद करेंगे?’

    युवक की बात सुन संगीताचार्य हल्की मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘संगीत सीखने की तुम्हारी इच्छा इतनी प्रबल है तो मैं तुम्हें ज़रूर संगीत सिखाऊँगा।’ संगीतज्ञ की बात सुन युवक एकदम प्रसन्न हो गया और बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘गुरुजी, इसके एवज़ में मुझे क्या करना होगा।’ संगीतज्ञ उसी मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस तुम्हें मुझे सौ स्वर्ण मुद्रायें देनी होगी।’ इतना सुनते ही वह युवक एकदम चौंक गया और फिर ख़ुद को सँभालते हुए बोला, ‘यह तो बहुत ज्यादा है, पर चलिये मैं आपको सौ स्वर्ण मुद्रायें देने के लिये राज़ी हूँ। वैसे मुझे संगीत की थोड़ी-बहुत जानकारी भी है।’

    इतना सुनते ही संगीतज्ञ ने उस युवक की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘अगर तुम्हें संगीत का थोड़ा-बहुत भी ज्ञान है तो तुम्हें संगीत सीखने के लिये दो सौ स्वर्ण मुद्रायें देना होगी।’ संगीताचार्य की बात सुनते ही युवक आश्चर्य से भर गया और चौंकते हुए बोला, ‘गुरुजी, यह तो बड़ी अजीब बात है। मैं संगीत का थोड़ा जानकार हूँ इसलिये आपने क़ीमत बढा दी। काम कम होने के बाद भी दाम बढ़ाना, यह तो मेरी समझ से परे है।’

    युवक की बात सुनते ही संगीताचार्य ठहाका लगाकर हंसे और बोले, ‘वत्स, काम कम कहाँ है? मुझे तो बल्कि अब दोगुना काम करना होगा। पहले तुमने जो सीखा है, उसे मिटाना याने भुलाना होगा और फिर नये सिरे से सिखाना होगा। याद रखना, कुछ नया उपयोगी और महत्वपूर्ण सीखने के लिए सबसे पहले दिमाग को खाली करना, उसे निर्मल करना बहुत जरूरी है, नहीं तो नया ज्ञान उसमें समा नहीं पाएगा।"

    बात तो बिलकुल सही है दोस्तों, इसीलिये मेरी नज़र में जानकार और ज्ञानी होना, दो बिलकुल अलग बातें हैं। अगर आप मुझसे इन दोनों के बीच का अंतर पूछेंगे, तो मैं कहूँगा जानकार होने का अर्थ मेरी नज़र में अधूरा ज्ञान होना है, जो व्यवहारिक स्तर पर हमेशा ख़तरनाक ही होता है क्योंकि यह आपके सीखने की क्षमता और गति को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिये कोई आपको, आपकी जानकारी वाले विषय पर कोई नई बात सिखाने का प्रयास करता है या फिर इस विषय में कोई गंभीर चर्चा करता है तो आपको लगता है, ‘यह तो मुझे पहले से ही पता है!’ या ‘मैं तो ख़ुद इस विषय का विशेषज्ञ हूँ… कोई इस बारे में मुझे क्या सिखायेगा?’ और इसी सोच के कारण आप एक ज़रूरी बात सीखने से वंचित रह जाते हैं।

    दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य स्वयं का पूर्ण रूपान्तरण करना है याने आप अपने आप में ३६० डिग्री परिवर्तन लाना चाहते हैं तो याद रखियेगा सृजनात्मकता के विकास और आत्मज्ञान के लिए ख़ुद को सीखने के लिये तैयार करना नितांत आवश्यक है। इसके लिये आपको अधूरे ज्ञान के भ्रम को तोड़ना होगा क्योंकि पहले से भरे हुए पात्र में कुछ भी और डालना असंभव है।

    आइये साथियों आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। कई साल पहले एक नवयुवक शहर के सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ के पास पहुँचा और उन्हें प्रणाम करते हुए बोला, ‘गुरुजी, मेरी संगीत में अथाह रुचि है। वास्तव मे संगीत ही मेरे लिए जीवन है और आप संगीत के महान ज्ञाता और आचार्य है। क्या आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर, संगीत में निपुणता पाने में मदद करेंगे?’ युवक की बात सुन संगीताचार्य हल्की मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘संगीत सीखने की तुम्हारी इच्छा इतनी प्रबल है तो मैं तुम्हें ज़रूर संगीत सिखाऊँगा।’ संगीतज्ञ की बात सुन युवक एकदम प्रसन्न हो गया और बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘गुरुजी, इसके एवज़ में मुझे क्या करना होगा।’ संगीतज्ञ उसी मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस तुम्हें मुझे सौ स्वर्ण मुद्रायें देनी होगी।’ इतना सुनते ही वह युवक एकदम चौंक गया और फिर ख़ुद को सँभालते हुए बोला, ‘यह तो बहुत ज्यादा है, पर चलिये मैं आपको सौ स्वर्ण मुद्रायें देने के लिये राज़ी हूँ। वैसे मुझे संगीत की थोड़ी-बहुत जानकारी भी है।’ इतना सुनते ही संगीतज्ञ ने उस युवक की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘अगर तुम्हें संगीत का थोड़ा-बहुत भी ज्ञान है तो तुम्हें संगीत सीखने के लिये दो सौ स्वर्ण मुद्रायें देना होगी।’ संगीताचार्य की बात सुनते ही युवक आश्चर्य से भर गया और चौंकते हुए बोला, ‘गुरुजी, यह तो बड़ी अजीब बात है। मैं संगीत का थोड़ा जानकार हूँ इसलिये आपने क़ीमत बढा दी। काम कम होने के बाद भी दाम बढ़ाना, यह तो मेरी समझ से परे है।’ युवक की बात सुनते ही संगीताचार्य ठहाका लगाकर हंसे और बोले, ‘वत्स, काम कम कहाँ है? मुझे तो बल्कि अब दोगुना काम करना होगा। पहले तुमने जो सीखा है, उसे मिटाना याने भुलाना होगा और फिर नये सिरे से सिखाना होगा। याद रखना, कुछ नया उपयोगी और महत्वपूर्ण सीखने के लिए सबसे पहले दिमाग को खाली करना, उसे निर्मल करना बहुत जरूरी है, नहीं तो नया ज्ञान उसमें समा नहीं पाएगा।" बात तो बिलकुल सही है दोस्तों, इसीलिये मेरी नज़र में जानकार और ज्ञानी होना, दो बिलकुल अलग बातें हैं। अगर आप मुझसे इन दोनों के बीच का अंतर पूछेंगे, तो मैं कहूँगा जानकार होने का अर्थ मेरी नज़र में अधूरा ज्ञान होना है, जो व्यवहारिक स्तर पर हमेशा ख़तरनाक ही होता है क्योंकि यह आपके सीखने की क्षमता और गति को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिये कोई आपको, आपकी जानकारी वाले विषय पर कोई नई बात सिखाने का प्रयास करता है या फिर इस विषय में कोई गंभीर चर्चा करता है तो आपको लगता है, ‘यह तो मुझे पहले से ही पता है!’ या ‘मैं तो ख़ुद इस विषय का विशेषज्ञ हूँ… कोई इस बारे में मुझे क्या सिखायेगा?’ और इसी सोच के कारण आप एक ज़रूरी बात सीखने से वंचित रह जाते हैं। दोस्तों, अगर आपका लक्ष्य स्वयं का पूर्ण रूपान्तरण करना है याने आप अपने आप में ३६० डिग्री परिवर्तन लाना चाहते हैं तो याद रखियेगा सृजनात्मकता के विकास और आत्मज्ञान के लिए ख़ुद को सीखने के लिये तैयार करना नितांत आवश्यक है। इसके लिये आपको अधूरे ज्ञान के भ्रम को तोड़ना होगा क्योंकि पहले से भरे हुए पात्र में कुछ भी और डालना असंभव है।
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  • आइये दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक क़िस्से से करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व कॉरपोरेट ट्रेनिंग के दौरान, ट्रेनर ने सभी प्रतिभागियों को एक-एक ग़ुब्बारा देते हुए कहा, ‘चलिये, अब हम एक खेल खेलते हैं। मैंने आप सभी को एक-एक ग़ुब्बारा दिया है। जिस भी व्यक्ति के पास अंत तक ग़ुब्बारा रहेगा वह आज का विजेता होगा और उसे रू पाँच हज़ार का नगद इनाम दिया जाएगा।’ ट्रेनर के इतना कहते ही सभी प्रतिभागी एक-दूसरे के ग़ुब्बारे को फोड़ने लगे।

    खेल का समय ख़त्म होते समय तक वहाँ एक भी शख़्स नहीं था जिसका ग़ुब्बारा सलामत हो। मात्र ३ से ४ मिनिट में ही सभी प्रतिभागियों ने एक-दूसरे के ग़ुब्बारों को फोड़ दिया था। अंत में ट्रेनर एक बार फिर मंच पर आये और सभी प्रतिभागियों से प्रश्न करते हुए बोले, ‘आपने एक दूसरे के ग़ुब्बारों को क्यों फोड़ा?’ सभी प्रतिभागी एक स्वर में बोले, ‘विजेता बनने के लिये।’ इतना सुनते ही ट्रेनर मुस्कुराये और बोले, ‘अगर आप एक दूसरे के ग़ुब्बारे को नहीं फोड़ते तो आप सभी विजेता होते।’ ट्रेनर का जवाब सुनते ही सभी प्रतिभागी अब एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे।

    वैसे दोस्तों, यह कहानी सिर्फ़ ट्रेनिंग हाल में मौजूद प्रतिभागियों की ही नहीं है अपितु इस दुनिया में ज़्यादातर लोगों की है। सच मानियेगा साथियों, आज इंसान जितना अपने दुख से दुखी नहीं है उससे ज़्यादा दूसरों के सुख से दुखी है। असल में साथियों यह स्थिति याने दूसरों को देखकर जीना, ख़ुद का दिल दुखाकर जीने जैसा है। इसे हमारे शास्त्रों में ‘मत्सर भाव’ याने ख़ुद का खून चूसकर जीने वाला, कहा गया है।

    दूसरे शब्दों में कहा जाये तो दूसरों को खुश देखकर जलना उस माचिस की तीली या उस मशाल की तरह जलना है जो ख़ुद जलकर दूसरों को जलाती है। याने दूसरों को ख़ाक में मिलाने के लिये पहले उसे राख बनना पड़ता है। इसलिये दोस्तों, दूसरों की ख़ुशी देख ख़ुद दुखी होने के स्थान पर खुश होना सीखें। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ तब संभव होगा जब आप अपने अंदर ‘जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है’, का भाव विकसित कर पायेंगे।

    इसका अर्थ यह क़तई नहीं है दोस्तों कि हमें जीवन में आगे नहीं बढ़ना है या अब कर्म नहीं करना है। जीवन में हमें कर्म कर निश्चित तौर पर आगे तो हमेशा बढ़ना ही है, अन्यथा हम रुके हुए पानी की तरह सड़ जाएँगे। इसीलिये ज़िंदगी को चलायमान माना गया है। ‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है’ के भाव का यहाँ अर्थ सिर्फ़ इतना है कि जो हमारे पास है हमें उसके लिये ईश्वर का धन्यवाद करना है और जो हमें किसी भी कारणवश नहीं मिल पाया है उसके लिये किसी को दोष देने के स्थान पर अपनी पात्रता याने योग्यता को बढ़ाना है। इसके साथ ही इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि कर्म करते वक़्त मनचाहा परिणाम ना मिलने पर न तो परेशान होना है और ना ही दूसरों की सफलता या स्थिति को देखकर दुखी होना है। हमें तो बस बिना परिणाम की चिंता किए अपनी योग्यता को रोज़ बढ़ाते जाना है तभी हम अपने जीवन को बेहतर बना पायेंगे। इसीलिये दोस्तों, जीवन को स्वतः सुखमय बनाने का अचूक सूत्र, जो नहीं मिला है उसका दोष किसी और पर देने के स्थान पर ख़ुद की योग्यता और पात्रता को बढ़ाना, बताया गया।

    तो आइये दोस्तों, आज से हम दूसरों की ख़ुशी से खुश होने के साथ-साथ अपनी पात्रता बढ़ाना शुरू करते हैं। यह स्थिति बिलकुल वैसी ही होगी जैसी इस लेख की शुरुआत में हमने ग़ुब्बारे वाले क़िस्से से सीखी थी।

    आइये दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक क़िस्से से करते हैं। कुछ वर्ष पूर्व कॉरपोरेट ट्रेनिंग के दौरान, ट्रेनर ने सभी प्रतिभागियों को एक-एक ग़ुब्बारा देते हुए कहा, ‘चलिये, अब हम एक खेल खेलते हैं। मैंने आप सभी को एक-एक ग़ुब्बारा दिया है। जिस भी व्यक्ति के पास अंत तक ग़ुब्बारा रहेगा वह आज का विजेता होगा और उसे रू पाँच हज़ार का नगद इनाम दिया जाएगा।’ ट्रेनर के इतना कहते ही सभी प्रतिभागी एक-दूसरे के ग़ुब्बारे को फोड़ने लगे। खेल का समय ख़त्म होते समय तक वहाँ एक भी शख़्स नहीं था जिसका ग़ुब्बारा सलामत हो। मात्र ३ से ४ मिनिट में ही सभी प्रतिभागियों ने एक-दूसरे के ग़ुब्बारों को फोड़ दिया था। अंत में ट्रेनर एक बार फिर मंच पर आये और सभी प्रतिभागियों से प्रश्न करते हुए बोले, ‘आपने एक दूसरे के ग़ुब्बारों को क्यों फोड़ा?’ सभी प्रतिभागी एक स्वर में बोले, ‘विजेता बनने के लिये।’ इतना सुनते ही ट्रेनर मुस्कुराये और बोले, ‘अगर आप एक दूसरे के ग़ुब्बारे को नहीं फोड़ते तो आप सभी विजेता होते।’ ट्रेनर का जवाब सुनते ही सभी प्रतिभागी अब एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। वैसे दोस्तों, यह कहानी सिर्फ़ ट्रेनिंग हाल में मौजूद प्रतिभागियों की ही नहीं है अपितु इस दुनिया में ज़्यादातर लोगों की है। सच मानियेगा साथियों, आज इंसान जितना अपने दुख से दुखी नहीं है उससे ज़्यादा दूसरों के सुख से दुखी है। असल में साथियों यह स्थिति याने दूसरों को देखकर जीना, ख़ुद का दिल दुखाकर जीने जैसा है। इसे हमारे शास्त्रों में ‘मत्सर भाव’ याने ख़ुद का खून चूसकर जीने वाला, कहा गया है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो दूसरों को खुश देखकर जलना उस माचिस की तीली या उस मशाल की तरह जलना है जो ख़ुद जलकर दूसरों को जलाती है। याने दूसरों को ख़ाक में मिलाने के लिये पहले उसे राख बनना पड़ता है। इसलिये दोस्तों, दूसरों की ख़ुशी देख ख़ुद दुखी होने के स्थान पर खुश होना सीखें। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ तब संभव होगा जब आप अपने अंदर ‘जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है’, का भाव विकसित कर पायेंगे। इसका अर्थ यह क़तई नहीं है दोस्तों कि हमें जीवन में आगे नहीं बढ़ना है या अब कर्म नहीं करना है। जीवन में हमें कर्म कर निश्चित तौर पर आगे तो हमेशा बढ़ना ही है, अन्यथा हम रुके हुए पानी की तरह सड़ जाएँगे। इसीलिये ज़िंदगी को चलायमान माना गया है। ‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है’ के भाव का यहाँ अर्थ सिर्फ़ इतना है कि जो हमारे पास है हमें उसके लिये ईश्वर का धन्यवाद करना है और जो हमें किसी भी कारणवश नहीं मिल पाया है उसके लिये किसी को दोष देने के स्थान पर अपनी पात्रता याने योग्यता को बढ़ाना है। इसके साथ ही इस बात का विशेष ध्यान रखना है कि कर्म करते वक़्त मनचाहा परिणाम ना मिलने पर न तो परेशान होना है और ना ही दूसरों की सफलता या स्थिति को देखकर दुखी होना है। हमें तो बस बिना परिणाम की चिंता किए अपनी योग्यता को रोज़ बढ़ाते जाना है तभी हम अपने जीवन को बेहतर बना पायेंगे। इसीलिये दोस्तों, जीवन को स्वतः सुखमय बनाने का अचूक सूत्र, जो नहीं मिला है उसका दोष किसी और पर देने के स्थान पर ख़ुद की योग्यता और पात्रता को बढ़ाना, बताया गया। तो आइये दोस्तों, आज से हम दूसरों की ख़ुशी से खुश होने के साथ-साथ अपनी पात्रता बढ़ाना शुरू करते हैं। यह स्थिति बिलकुल वैसी ही होगी जैसी इस लेख की शुरुआत में हमने ग़ुब्बारे वाले क़िस्से से सीखी थी।
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  • दोस्तों, बात लगभग दो वर्ष पूर्व की है। एक दिन अचानक रात्रि दो-ढाई बजे तेज आवाज़ में बजते म्यूज़िक के कारण मेरी नींद खुल गई। कुछ देर म्यूज़िक के साथ आती आवाज़ पर ध्यान केंद्रित किया तो मुझे एहसास हुआ युवाओं का एक समूह हमारी सोसायटी में अपना जन्मदिन मना रहा था। हालाँकि उस दिन एक लंबे टूर के कारण मैं काफ़ी थका हुआ था और अगले दिन के कमिटमेंट को अच्छे से पूर्ण करने के लिये मुझे आराम की सख़्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। फिर भी मैंने कुछ देर इस म्यूज़िक और आती हुई आवाज़ को नज़रंदाज़ करने का निर्णय लिया क्योंकि मैं उन युवाओं की ख़ुशी या मस्ती में ख़लल नहीं डालना चाहता था।

    लेकिन इसके ठीक विपरीत मस्ती कर रहे युवाओं को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि सोसाइटी में रहने वाले अन्य लोग उनके कारण परेशान हो रहे थे। लगभग आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद मैंने उन युवाओं को समझाने का निर्णय लिया और सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड के साथ उनके फ़्लैट में पहुँच कर उन्हें अपनी असुविधा से अवगत करवाया। वहाँ मौजूद कुछ युवा हमारी परेशानी समझ पाये और कुछ हमें समझाने का प्रयास करने लगे कि हम अपने घर में मज़े कर रहे हैं, कृपया हमारी मस्ती में ख़लल न डालें।

    वैसे दोस्तों, यह स्थिति सिर्फ़ उन युवाओं की ही नहीं है। अगर आप कहीं भी नज़र घुमा कर देखेंगे तो पायेंगे कि हमारे आसपास कई ऐसे लोग मौजूद हैं, जो सब बातों को नज़रंदाज़ कर वस्तुओं के भोग में मस्त और व्यस्त हैं। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं है कि जिसे वो वस्तु का भोग समझ रहे हैं, असल में वो आने वाले समय में ना सिर्फ़ उनके बल्कि उनके परिवार के लिये भी मुश्किल का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिये आप किसी भी तरह के नशे, ग़लत आदतों या किसी भी बात की अति को ले सकते हैं।

    याद रखियेगा साथियों, विवेक और संयम से अगर आप इस जगत, संसाधन या चीजों का भोग कर रहे हैं तो कहीं कोई समस्या नहीं है। लेकिन अगर किसी चीज की अति हो रही है तो वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। इसका अर्थ हुआ जो पदार्थ याने संसाधन या चीजें हैं उनमें समस्या नहीं है, लेकिन हमारा उन्हें उपयोग या उपभोग करने का तरीक़ा समस्या पैदा करता है। उदाहरण के लिये ज़हर की बहुत थोड़ी सी मात्रा दवा का काम करती है और दवाई की अत्यधिक मात्रा विष बन जाती है।

    यह बात दोस्तों हमारी ज़िंदगी से संदर्भित हर क्षेत्र में इसी तरीक़े से लागू होती है। उदाहरण के लिये इन्फ्रा तैयार करना हमारे जीवन को आसान या बेहतर बनाता है, लेकिन तेज़ी से इसमें बेतहाशा वृद्धि करना पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाता है। इस आधार पर कहा जाये तो चीजें नहीं अपितु उन्हें उपयोग में लेने का तरीक़ा उसे सही या ग़लत बनाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो इस जीवन को सार्थक बनाने के लिये हमें संसाधनों से ज़्यादा बोध की ज़रूरत है। इसीलिये सब कुछ होने के बाद भी आपको कोई इंसान परेशान नज़र आयेगा और दूसरी और कुछ ना होने के बाद भी फ़क़ीर आपको मज़े में दिखेगा। अर्थात् ज्ञानी लोग बोध से ही इस संसार से पार पाते हैं।

    जी हाँ साथियों, चुनौतियों, विपरीत परिस्थतियों, असफलताओं से हमें भागना याने संसार को छोड़ना नहीं है अपितु उसे समझना है। परमात्मा ने इस सृष्टि में जिस भी चीज का निर्माण किया है वह हमारे लिये ही किया है अर्थात् उसने इन सब चीजों की रचना हमारे सुख, हमारे आनंद के लिये की है। इसलिये इस सृष्टि में कुछ भी बेकार या निरर्थक नहीं है। हर चीज अपने समय और स्थिति में श्रेष्ठ है। इस आधार पर अगर आप अपने जीवन को सार्थक, ख़ुशियों और मस्ती से भरा बनाना चाहते हैं तो इस बात को स्वीकार लें कि इस दुनिया में मौजूद हर वस्तु ईश्वर की है। हमें तो बस उसको कब, कैसे, कहाँ, क्यों और किस उद्देश्य से उपयोग करना है, यह सीखना है। जीवन को उत्सव बनाने का यही एक मात्र तरीक़ा है।
    दोस्तों, बात लगभग दो वर्ष पूर्व की है। एक दिन अचानक रात्रि दो-ढाई बजे तेज आवाज़ में बजते म्यूज़िक के कारण मेरी नींद खुल गई। कुछ देर म्यूज़िक के साथ आती आवाज़ पर ध्यान केंद्रित किया तो मुझे एहसास हुआ युवाओं का एक समूह हमारी सोसायटी में अपना जन्मदिन मना रहा था। हालाँकि उस दिन एक लंबे टूर के कारण मैं काफ़ी थका हुआ था और अगले दिन के कमिटमेंट को अच्छे से पूर्ण करने के लिये मुझे आराम की सख़्त ज़रूरत महसूस हो रही थी। फिर भी मैंने कुछ देर इस म्यूज़िक और आती हुई आवाज़ को नज़रंदाज़ करने का निर्णय लिया क्योंकि मैं उन युवाओं की ख़ुशी या मस्ती में ख़लल नहीं डालना चाहता था। लेकिन इसके ठीक विपरीत मस्ती कर रहे युवाओं को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि सोसाइटी में रहने वाले अन्य लोग उनके कारण परेशान हो रहे थे। लगभग आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद मैंने उन युवाओं को समझाने का निर्णय लिया और सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड के साथ उनके फ़्लैट में पहुँच कर उन्हें अपनी असुविधा से अवगत करवाया। वहाँ मौजूद कुछ युवा हमारी परेशानी समझ पाये और कुछ हमें समझाने का प्रयास करने लगे कि हम अपने घर में मज़े कर रहे हैं, कृपया हमारी मस्ती में ख़लल न डालें। वैसे दोस्तों, यह स्थिति सिर्फ़ उन युवाओं की ही नहीं है। अगर आप कहीं भी नज़र घुमा कर देखेंगे तो पायेंगे कि हमारे आसपास कई ऐसे लोग मौजूद हैं, जो सब बातों को नज़रंदाज़ कर वस्तुओं के भोग में मस्त और व्यस्त हैं। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं है कि जिसे वो वस्तु का भोग समझ रहे हैं, असल में वो आने वाले समय में ना सिर्फ़ उनके बल्कि उनके परिवार के लिये भी मुश्किल का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिये आप किसी भी तरह के नशे, ग़लत आदतों या किसी भी बात की अति को ले सकते हैं। याद रखियेगा साथियों, विवेक और संयम से अगर आप इस जगत, संसाधन या चीजों का भोग कर रहे हैं तो कहीं कोई समस्या नहीं है। लेकिन अगर किसी चीज की अति हो रही है तो वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। इसका अर्थ हुआ जो पदार्थ याने संसाधन या चीजें हैं उनमें समस्या नहीं है, लेकिन हमारा उन्हें उपयोग या उपभोग करने का तरीक़ा समस्या पैदा करता है। उदाहरण के लिये ज़हर की बहुत थोड़ी सी मात्रा दवा का काम करती है और दवाई की अत्यधिक मात्रा विष बन जाती है। यह बात दोस्तों हमारी ज़िंदगी से संदर्भित हर क्षेत्र में इसी तरीक़े से लागू होती है। उदाहरण के लिये इन्फ्रा तैयार करना हमारे जीवन को आसान या बेहतर बनाता है, लेकिन तेज़ी से इसमें बेतहाशा वृद्धि करना पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाता है। इस आधार पर कहा जाये तो चीजें नहीं अपितु उन्हें उपयोग में लेने का तरीक़ा उसे सही या ग़लत बनाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो इस जीवन को सार्थक बनाने के लिये हमें संसाधनों से ज़्यादा बोध की ज़रूरत है। इसीलिये सब कुछ होने के बाद भी आपको कोई इंसान परेशान नज़र आयेगा और दूसरी और कुछ ना होने के बाद भी फ़क़ीर आपको मज़े में दिखेगा। अर्थात् ज्ञानी लोग बोध से ही इस संसार से पार पाते हैं। जी हाँ साथियों, चुनौतियों, विपरीत परिस्थतियों, असफलताओं से हमें भागना याने संसार को छोड़ना नहीं है अपितु उसे समझना है। परमात्मा ने इस सृष्टि में जिस भी चीज का निर्माण किया है वह हमारे लिये ही किया है अर्थात् उसने इन सब चीजों की रचना हमारे सुख, हमारे आनंद के लिये की है। इसलिये इस सृष्टि में कुछ भी बेकार या निरर्थक नहीं है। हर चीज अपने समय और स्थिति में श्रेष्ठ है। इस आधार पर अगर आप अपने जीवन को सार्थक, ख़ुशियों और मस्ती से भरा बनाना चाहते हैं तो इस बात को स्वीकार लें कि इस दुनिया में मौजूद हर वस्तु ईश्वर की है। हमें तो बस उसको कब, कैसे, कहाँ, क्यों और किस उद्देश्य से उपयोग करना है, यह सीखना है। जीवन को उत्सव बनाने का यही एक मात्र तरीक़ा है।
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