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करें प्यार खुद सेदोस्तों, हाल ही में मुझे एक विद्यालय ने 10वीं से 12वीं तक के छात्रों को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित करा। मैंने विद्यालय के प्राचार्य और प्रबंधन से जब इसका उद्देश्य पूछा तो उनका कहना था, ‘सर, आजकल के बच्चे अपना जीवन बहुत कैज़ूअल तरीके से जीते हैं। वे बड़ी कक्षाओं में आने के बाद भी अपने भविष्य के लिए बिलकुल भी सीरियस नहीं हैं।’ वैसे दोस्तों सामान्यत: हम सभी बड़ों की आजकल के बच्चों...0 Comments 0 Shares 2K Views
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दोस्तों, हाल ही में मुझे एक विद्यालय ने 10वीं से 12वीं तक के छात्रों को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित करा। मैंने विद्यालय के प्राचार्य और प्रबंधन से जब इसका उद्देश्य पूछा तो उनका कहना था, ‘सर, आजकल के बच्चे अपना जीवन बहुत कैज़ूअल तरीके से जीते हैं। वे बड़ी कक्षाओं में आने के बाद भी अपने भविष्य के लिए बिलकुल भी सीरियस नहीं हैं।’ वैसे दोस्तों सामान्यत: हम सभी बड़ों की आजकल के बच्चों के लिए यही राय है। इसी के आधार पर अपने उद्बोधन में मैंने बच्चों को अपने ज्ञान पर आधारित, जीवन को बेहतर बनाने के सूत्र समझा दिए। जिसमें लक्ष्य बनाना, मेहनत करना, ग़लतियों से सीखना, सकारात्मक और सही दृष्टिकोण रखना, समय का सदुपयोग करना, नकारात्मक लोगों और बातों से दूर रहना, बड़ों के अनुभव से सीखना जैसी कई बातें थी। इसी के साथ मैंने उन्हें उदाहरण के रूप में अपने रेडियो शो ‘ज़िंदगी ज़िंदाबाद’, जिसके हाल ही में मैंने 700 शो पूर्ण करें हैं, के विषय में बताया कि कैसे एक छोटे से विचार ने उपरोक्त सूत्रों पर लगातार कार्य करने की वजह से एक बड़ा रूप ले लिया है।
बच्चों के पार्टिसिपेशन को देख मुझे लग रहा था कि उन्हें मेरा समझाने का तरीक़ा पसंद आया है। अपना उद्बोधन पूर्ण करने के पश्चात, विजयी भाव से मैंने प्राचार्य और प्रबंधक की ओर देखा जिससे मैं उनकी प्रतिक्रिया जान सकूँ, वे बड़े संतुष्ट लग रहे थे। मैंने अपना उद्बोधन समाप्त करते हुए बच्चों की दुविधा को दूर करने के उद्देश्य से उन्हें प्रश्न पूछने का मौक़ा दिया। यक़ीन मानिएगा दोस्तों, बच्चों के पहले पहले प्रश्न ने ही मुझे एहसास करवा दिया कि आज के बच्चों की सोच कितनी सटीक और सही है। वे असल में जीवन बनाने के चक्कर में जीवन खोना नहीं चाहते। जी हाँ दोस्तों, वे अपने जीवन का हर पल, पूरी तरह, सिर्फ़ और सिर्फ़ खुश और मस्त रहते हुए जीना चाहते हैं और इसी वजह से किसी भी कार्य को करने से पूर्व वे सुनिश्चित हो जाना चाहते हैं कि वह उनके पसंद का हो। हो सकता है दोस्तों, उनका तरीक़ा हमारी सोच के मुताबिक़ सही ना हो, लेकिन जीवन को लेकर उनका नज़रिया एकदम स्पष्ट है।
चलिए आगे बढ़ने से पहले हम बच्चे के प्रश्न को जान लेते हैं। एक बच्चे ने मुझसे कहा, ‘सर, 700 एपिसोड में तो आपने बहुत सारी बातें बताई होंगी और सभी को जीवन में उतारना आसान नहीं होगा। अगर आपको उन सभी बातों में से सिर्फ़ किसी एक को ही चुनने का मौक़ा मिले तो वह कौन सी होगी।’ दोस्तों सुनने में साधारण सा दिखने वाला प्रश्न मेरी नज़र में बहुत गहराई रखता है, असल में उस बच्चे ने आपसे आपके जीवन, आपके अनुभव का पूरा निचोड़ पूछ लिया था। मैंने कुछ पल विचार करते हुए उसे कहा, ‘खुद से प्यार करना!’
दोस्तों यक़ीन मानिएगा, उस दिन इस विचार के आते ही मैंने अपने अंदर एक बड़ा बदलाव महसूस किया। मैं सोच रहा था अगर मैं, ‘खुद से प्यार करने’ के विषय में सोच रहा हूँ तो यह बड़े-बड़े लक्ष्य को पाने के लिए खुद से पहाड़ों जैसी अपेक्षायें क्यों? अगर किसी दिन आप को लक्ष्य रूपी पहाड़ चढ़ पाना बहुत मुश्किल या असम्भव लग रहा है, तो उसे आज छोड़ दो। क्या फ़र्क़ पड़ता है? उसकी जगह एक छोटी सी पहाड़ी चढ़ो, और उसकी ख़ुशी बनाओ। अगर कोई सुबह आपके लिए उदासी लेकर आ रही है तो भी चिंता की कोई बात नहीं है उस दिन देर तक सो लो।
दूसरे शब्दों में कहूँ तो दोस्तों असम्भव से लगने वाले लक्ष्यों को पाने के लिए बनाई गई योजनाएँ अगर आपको अभिशाप लग रही है तो खुद को परेशान करने के स्थान पर योजनाओं में परिवर्तन करो। योजनाओं में परिवर्तन करना कोई बुरा या शर्म का काम नहीं है। बल्कि यह तो खुद को व्यवस्थित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। यह आपकी वापसी सही तरीके से सुनिश्चित करता है। खुद को नकारात्मक भावों के भँवर जाल में उलझाने से बेहतर है, समय से बदलाव कर उससे बचना और वैसे भी आपके लिये और कोई उपाय भी नहीं है क्यूँकि आप स्वयं को प्यार करते हो और यही तो दोस्तों, आज के युवा खुद के लिए कर रहे हैं।
आईए, आज से एक निर्णय लेते हैं अंधी दौड़ में भागने के स्थान पर जीवन जीने के लिए हर पल का मज़ा लेते हुए थोड़ा धीमी गति से आगे बढ़ते हैं।दोस्तों, हाल ही में मुझे एक विद्यालय ने 10वीं से 12वीं तक के छात्रों को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित करा। मैंने विद्यालय के प्राचार्य और प्रबंधन से जब इसका उद्देश्य पूछा तो उनका कहना था, ‘सर, आजकल के बच्चे अपना जीवन बहुत कैज़ूअल तरीके से जीते हैं। वे बड़ी कक्षाओं में आने के बाद भी अपने भविष्य के लिए बिलकुल भी सीरियस नहीं हैं।’ वैसे दोस्तों सामान्यत: हम सभी बड़ों की आजकल के बच्चों के लिए यही राय है। इसी के आधार पर अपने उद्बोधन में मैंने बच्चों को अपने ज्ञान पर आधारित, जीवन को बेहतर बनाने के सूत्र समझा दिए। जिसमें लक्ष्य बनाना, मेहनत करना, ग़लतियों से सीखना, सकारात्मक और सही दृष्टिकोण रखना, समय का सदुपयोग करना, नकारात्मक लोगों और बातों से दूर रहना, बड़ों के अनुभव से सीखना जैसी कई बातें थी। इसी के साथ मैंने उन्हें उदाहरण के रूप में अपने रेडियो शो ‘ज़िंदगी ज़िंदाबाद’, जिसके हाल ही में मैंने 700 शो पूर्ण करें हैं, के विषय में बताया कि कैसे एक छोटे से विचार ने उपरोक्त सूत्रों पर लगातार कार्य करने की वजह से एक बड़ा रूप ले लिया है। बच्चों के पार्टिसिपेशन को देख मुझे लग रहा था कि उन्हें मेरा समझाने का तरीक़ा पसंद आया है। अपना उद्बोधन पूर्ण करने के पश्चात, विजयी भाव से मैंने प्राचार्य और प्रबंधक की ओर देखा जिससे मैं उनकी प्रतिक्रिया जान सकूँ, वे बड़े संतुष्ट लग रहे थे। मैंने अपना उद्बोधन समाप्त करते हुए बच्चों की दुविधा को दूर करने के उद्देश्य से उन्हें प्रश्न पूछने का मौक़ा दिया। यक़ीन मानिएगा दोस्तों, बच्चों के पहले पहले प्रश्न ने ही मुझे एहसास करवा दिया कि आज के बच्चों की सोच कितनी सटीक और सही है। वे असल में जीवन बनाने के चक्कर में जीवन खोना नहीं चाहते। जी हाँ दोस्तों, वे अपने जीवन का हर पल, पूरी तरह, सिर्फ़ और सिर्फ़ खुश और मस्त रहते हुए जीना चाहते हैं और इसी वजह से किसी भी कार्य को करने से पूर्व वे सुनिश्चित हो जाना चाहते हैं कि वह उनके पसंद का हो। हो सकता है दोस्तों, उनका तरीक़ा हमारी सोच के मुताबिक़ सही ना हो, लेकिन जीवन को लेकर उनका नज़रिया एकदम स्पष्ट है। चलिए आगे बढ़ने से पहले हम बच्चे के प्रश्न को जान लेते हैं। एक बच्चे ने मुझसे कहा, ‘सर, 700 एपिसोड में तो आपने बहुत सारी बातें बताई होंगी और सभी को जीवन में उतारना आसान नहीं होगा। अगर आपको उन सभी बातों में से सिर्फ़ किसी एक को ही चुनने का मौक़ा मिले तो वह कौन सी होगी।’ दोस्तों सुनने में साधारण सा दिखने वाला प्रश्न मेरी नज़र में बहुत गहराई रखता है, असल में उस बच्चे ने आपसे आपके जीवन, आपके अनुभव का पूरा निचोड़ पूछ लिया था। मैंने कुछ पल विचार करते हुए उसे कहा, ‘खुद से प्यार करना!’ दोस्तों यक़ीन मानिएगा, उस दिन इस विचार के आते ही मैंने अपने अंदर एक बड़ा बदलाव महसूस किया। मैं सोच रहा था अगर मैं, ‘खुद से प्यार करने’ के विषय में सोच रहा हूँ तो यह बड़े-बड़े लक्ष्य को पाने के लिए खुद से पहाड़ों जैसी अपेक्षायें क्यों? अगर किसी दिन आप को लक्ष्य रूपी पहाड़ चढ़ पाना बहुत मुश्किल या असम्भव लग रहा है, तो उसे आज छोड़ दो। क्या फ़र्क़ पड़ता है? उसकी जगह एक छोटी सी पहाड़ी चढ़ो, और उसकी ख़ुशी बनाओ। अगर कोई सुबह आपके लिए उदासी लेकर आ रही है तो भी चिंता की कोई बात नहीं है उस दिन देर तक सो लो। दूसरे शब्दों में कहूँ तो दोस्तों असम्भव से लगने वाले लक्ष्यों को पाने के लिए बनाई गई योजनाएँ अगर आपको अभिशाप लग रही है तो खुद को परेशान करने के स्थान पर योजनाओं में परिवर्तन करो। योजनाओं में परिवर्तन करना कोई बुरा या शर्म का काम नहीं है। बल्कि यह तो खुद को व्यवस्थित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। यह आपकी वापसी सही तरीके से सुनिश्चित करता है। खुद को नकारात्मक भावों के भँवर जाल में उलझाने से बेहतर है, समय से बदलाव कर उससे बचना और वैसे भी आपके लिये और कोई उपाय भी नहीं है क्यूँकि आप स्वयं को प्यार करते हो और यही तो दोस्तों, आज के युवा खुद के लिए कर रहे हैं। आईए, आज से एक निर्णय लेते हैं अंधी दौड़ में भागने के स्थान पर जीवन जीने के लिए हर पल का मज़ा लेते हुए थोड़ा धीमी गति से आगे बढ़ते हैं।0 Comments 0 Shares 1K Views -
दोस्तों, अक्सर कहा जाता है, ‘सकारात्मक और आशावादी रहना आपके जीवन को बेहतर बनाता है।’ बात सही भी है, लेकिन जब आप हर चीज़ को सकारात्मक नज़रिए से देखते हैं, तो आप अक्सर यथार्थ से दूर हो जाते हैं। अर्थात् जो सकारात्मकता आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिए थी वही सकारात्मकता अब आपको दुविधा, परेशानी में डाल, मुश्किल परिस्थितियों में उलझा देती है।
चलिए इस स्थिति को हम एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए आप अपने सर्कल अर्थात् जिन लोगों के बीच आप रहते हैं, के प्रति बहुत अधिक सकारात्मक हैं और इसीलिए आप बहुत अधिक आशान्वित भी हैं। आशान्वित हैं, इसलिए आप उनसे अपेक्षा रखना शुरू कर देते हैं। चूँकि आपकी यह आशा, अपेक्षा यथार्थवादी दृष्टिकोण के मुक़ाबले सकारात्मकता पर आधारित है, इसलिए इसके पूरे ना होने पर बहुत अधिक सम्भावना है कि अंत में आपको निराशा और असंतोष हाथ लगे।
निराशा और असंतोष का यही भाव अब आपके अंदर नकारात्मकता का भाव पैदा करेगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, आपके लिए सकारात्मक और आशावादी रहना ही नकारात्मकता की मुख्य वजह बन जाता है। अब क्या किया जाए? सकारात्मक रहना बंद कर दें। यह तो पूर्णतः ग़लत होगा क्यूँकि आशावान और सकारात्मक रहना ही हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए मोटिवेशन अर्थात् ऊर्जा देता है। इसीलिए अपेक्षा अपूर्ण रहने पर भी अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए आपको सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से हल खोजना होगा। आईए, इसे हम एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं-
बहुत साल पहले की बात है स्वप्ननगरी के राजा ने अपने राज्य की जनता से मिलने, उनका हाल-चाल जानने और अपने नगर के एकमात्र मंदिर के दर्शन करने की योजना बनाई। जैसे ही प्रजा को इस विषय में पता चला सभी उत्साहित हो गए और अपने-अपने तरीक़े से राजा के स्वागत की तैयारियाँ करने लगे, अपने राज्य को सजाने लगे।
सभी को तैयारियाँ करता देख मंदिर का पुजारी सोचने लगा, ‘राजा को पूरा राज्य तो साफ़-सुथरा, चमकता हुआ नज़र आएगा। ऐसे में अगर वह मंदिर को गंदा देखेगा तो क्या सोचेगा? सभी लोगों की तरह मुझे भी मंदिर का रंग-रोगन करवाकर इसे एकदम चकाचक करवा लेना चाहिए।’ तभी उसे याद आया उसके पास तो खाना-खाने के पैसों का भी टोटा रहता है, फिर वह रंग रोगन का खर्च कैसे उठाएगा? कुछ देर विचार करने पर पंडित जी को एक हल सूझा, ‘राजा इतने वर्षों बाद मंदिर आएगा तो निश्चित तौर पर मंदिर में कुछ ना कुछ अच्छी चीज़ें भेंट स्वरूप चढ़ाएगा। जैसे सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात या फिर बहुत सारा पैसा। तो क्यूँ ना अभी किसी से उधार लेकर काम करवा लिया जाए और बाद में राजा के दान से इस उधार को चुकता कर दिया जाए।’ पंडित जी ने तुरंत इस विचार पर अमल करा और मंदिर के सभी कार्य पूर्ण करवा लिए।
तय दिन राजा मंदिर दर्शन करने के लिए पहुंचे और मंदिर में पूजा पाठ के उपरांत एक सिक्का चढ़ाया और वापस लौट गए। पंडित जी चढ़ावे की रक़म देख हैरान-परेशान थे। वह तो सोच रहे थे कि राजा के दान से उनका जीवन बेहतर बन जाएगा। लेकिन चढ़ावे के सिक्के से तो उधार उतारना भी संभव नहीं था। काफ़ी देर विचार करने के बाद पंडित जी ने राजा के चढ़ाए सिक्के को अपनी मुट्ठी में बंद करा और एक ढोल वाले को साथ लेकर नगर में ढिंढोरा पीटने लगे, ‘अधिक से अधिक पैसे में बोली लगाकर राजा द्वारा मंदिर में चढ़ाई वस्तु को प्राप्त करें।’ कुछ ही देर में आग की तरह यह खबर पूरे राज्य में फैल गई। हर कोई राजा की चढ़ाई वस्तु को ख़रीदना चाहता था लेकिन ख़रीदने से पहले उसे देखना भी चाहता था, जिससे वह उसका उचित दाम लगा सके।
लेकिन पंडित जी तो चतुर थे, वे यह सब अपनी योजना के अनुसार कर रहे थे। इसीलिए वे किसी भी हाल में अपनी मुट्ठी खोलने के लिए राज़ी नहीं थे और ना ही वे किसी को दान में मिली वस्तु के बारे में बता रहे थे। लोगों की बढ़ती उत्सुक्ता के बीच जल्द ही बोली 25000 सोने के सिक्के तक पहुँच गई। जैसे ही यह बात राजा को पता पड़ी वे घबरा गए। उन्हें लगा अगर पूरी प्रजा को पता चला कि मैंने मंदिर में मात्र एक सिक्का चढ़ाया था तो लोग मेरा मज़ाक़ उड़ाएँगे, मेरी बेइज़्ज़ती करेंगे। उन्होंने उसी वक्त अपने मंत्री को भेजा और पंडित को 50000 सोने के सिक्के देकर अपना चढ़ाया हुआ सिक्का वापस ले लिया।
दोस्तों, आशा करता हूँ अब आप सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से अपेक्षाओं में मिली असफलताओं का प्रबंधन करना सीख गए होंगे। याद रखिएगा, अगर कोई आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है तो, रीऐक्ट ना करें बल्कि सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से री-ऐक्ट करें।दोस्तों, अक्सर कहा जाता है, ‘सकारात्मक और आशावादी रहना आपके जीवन को बेहतर बनाता है।’ बात सही भी है, लेकिन जब आप हर चीज़ को सकारात्मक नज़रिए से देखते हैं, तो आप अक्सर यथार्थ से दूर हो जाते हैं। अर्थात् जो सकारात्मकता आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिए थी वही सकारात्मकता अब आपको दुविधा, परेशानी में डाल, मुश्किल परिस्थितियों में उलझा देती है। चलिए इस स्थिति को हम एक उदाहरण के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए आप अपने सर्कल अर्थात् जिन लोगों के बीच आप रहते हैं, के प्रति बहुत अधिक सकारात्मक हैं और इसीलिए आप बहुत अधिक आशान्वित भी हैं। आशान्वित हैं, इसलिए आप उनसे अपेक्षा रखना शुरू कर देते हैं। चूँकि आपकी यह आशा, अपेक्षा यथार्थवादी दृष्टिकोण के मुक़ाबले सकारात्मकता पर आधारित है, इसलिए इसके पूरे ना होने पर बहुत अधिक सम्भावना है कि अंत में आपको निराशा और असंतोष हाथ लगे। निराशा और असंतोष का यही भाव अब आपके अंदर नकारात्मकता का भाव पैदा करेगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, आपके लिए सकारात्मक और आशावादी रहना ही नकारात्मकता की मुख्य वजह बन जाता है। अब क्या किया जाए? सकारात्मक रहना बंद कर दें। यह तो पूर्णतः ग़लत होगा क्यूँकि आशावान और सकारात्मक रहना ही हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए मोटिवेशन अर्थात् ऊर्जा देता है। इसीलिए अपेक्षा अपूर्ण रहने पर भी अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए आपको सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से हल खोजना होगा। आईए, इसे हम एक कहानी से समझने का प्रयास करते हैं- बहुत साल पहले की बात है स्वप्ननगरी के राजा ने अपने राज्य की जनता से मिलने, उनका हाल-चाल जानने और अपने नगर के एकमात्र मंदिर के दर्शन करने की योजना बनाई। जैसे ही प्रजा को इस विषय में पता चला सभी उत्साहित हो गए और अपने-अपने तरीक़े से राजा के स्वागत की तैयारियाँ करने लगे, अपने राज्य को सजाने लगे। सभी को तैयारियाँ करता देख मंदिर का पुजारी सोचने लगा, ‘राजा को पूरा राज्य तो साफ़-सुथरा, चमकता हुआ नज़र आएगा। ऐसे में अगर वह मंदिर को गंदा देखेगा तो क्या सोचेगा? सभी लोगों की तरह मुझे भी मंदिर का रंग-रोगन करवाकर इसे एकदम चकाचक करवा लेना चाहिए।’ तभी उसे याद आया उसके पास तो खाना-खाने के पैसों का भी टोटा रहता है, फिर वह रंग रोगन का खर्च कैसे उठाएगा? कुछ देर विचार करने पर पंडित जी को एक हल सूझा, ‘राजा इतने वर्षों बाद मंदिर आएगा तो निश्चित तौर पर मंदिर में कुछ ना कुछ अच्छी चीज़ें भेंट स्वरूप चढ़ाएगा। जैसे सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात या फिर बहुत सारा पैसा। तो क्यूँ ना अभी किसी से उधार लेकर काम करवा लिया जाए और बाद में राजा के दान से इस उधार को चुकता कर दिया जाए।’ पंडित जी ने तुरंत इस विचार पर अमल करा और मंदिर के सभी कार्य पूर्ण करवा लिए। तय दिन राजा मंदिर दर्शन करने के लिए पहुंचे और मंदिर में पूजा पाठ के उपरांत एक सिक्का चढ़ाया और वापस लौट गए। पंडित जी चढ़ावे की रक़म देख हैरान-परेशान थे। वह तो सोच रहे थे कि राजा के दान से उनका जीवन बेहतर बन जाएगा। लेकिन चढ़ावे के सिक्के से तो उधार उतारना भी संभव नहीं था। काफ़ी देर विचार करने के बाद पंडित जी ने राजा के चढ़ाए सिक्के को अपनी मुट्ठी में बंद करा और एक ढोल वाले को साथ लेकर नगर में ढिंढोरा पीटने लगे, ‘अधिक से अधिक पैसे में बोली लगाकर राजा द्वारा मंदिर में चढ़ाई वस्तु को प्राप्त करें।’ कुछ ही देर में आग की तरह यह खबर पूरे राज्य में फैल गई। हर कोई राजा की चढ़ाई वस्तु को ख़रीदना चाहता था लेकिन ख़रीदने से पहले उसे देखना भी चाहता था, जिससे वह उसका उचित दाम लगा सके। लेकिन पंडित जी तो चतुर थे, वे यह सब अपनी योजना के अनुसार कर रहे थे। इसीलिए वे किसी भी हाल में अपनी मुट्ठी खोलने के लिए राज़ी नहीं थे और ना ही वे किसी को दान में मिली वस्तु के बारे में बता रहे थे। लोगों की बढ़ती उत्सुक्ता के बीच जल्द ही बोली 25000 सोने के सिक्के तक पहुँच गई। जैसे ही यह बात राजा को पता पड़ी वे घबरा गए। उन्हें लगा अगर पूरी प्रजा को पता चला कि मैंने मंदिर में मात्र एक सिक्का चढ़ाया था तो लोग मेरा मज़ाक़ उड़ाएँगे, मेरी बेइज़्ज़ती करेंगे। उन्होंने उसी वक्त अपने मंत्री को भेजा और पंडित को 50000 सोने के सिक्के देकर अपना चढ़ाया हुआ सिक्का वापस ले लिया। दोस्तों, आशा करता हूँ अब आप सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से अपेक्षाओं में मिली असफलताओं का प्रबंधन करना सीख गए होंगे। याद रखिएगा, अगर कोई आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है तो, रीऐक्ट ना करें बल्कि सकारात्मक रहते हुए रचनात्मक तरीके से री-ऐक्ट करें।0 Comments 0 Shares 1K Views -
दोस्तों, मुझसे अकसर पूछे जाने वाले सवालों की सूची में अब एक नया सवाल जुड़ गया है, ‘सर, आप अपने हर लेख में कहानियों का इस्तेमाल क्यूँ करते हैं और इतनी सारी कहानियाँ लाते कहाँ से हैं?’ तो चलिए मैं पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से के जवाब से शुरू करता हूँ, ‘मैंने बचपन में बहुत सारी कहानियाँ सुनी हैं, इसलिए याद हैं और दूसरी बात मैं अभी भी कहानियाँ पढ़ता हूँ। रही बात हर लेख में कहानियों के ज़िक्र की तो दोस्तों, मैंने जीवन मूल्य, चरित्र के महत्व, सही और ग़लत के फ़र्क़ आदि जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों के बारे में परिवार के बुजुर्गों द्वारा सुनाई गई कहानियों से ही सीखा है। इसलिए मुझे लगता है कि जीवन के सूत्र कहानियों से सीखना और सिखाना बहुत आसान है।’
वैसे अगर आप थोड़ा गहराई से जाकर देखेंगे तो पाएँगे कि कहानियाँ सामान्यतः अपने अंदर कई गूढ़ अर्थ लिए हुए होती है, अर्थात् वे हमें सीधे-सीधे कुछ कहने की जगह अंदाज़ा लगाने की छूट देती हैं। साथ ही वे हमें कल्पना के द्वारा नए विषयों, घटनाओं या जगहों, परिस्थितियों, चुनौतियों के बारे में विचार करने का मौक़ा देती हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ, यह हमारी कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं। कहानियाँ कभी भी सुनने वाले का आकलन नहीं करती हैं। जी हाँ दोस्तों, कहानियाँ सुनाते वक्त मुझे आजतक किसी ने भी नहीं कहा है, ‘इस कहानी को अच्छे से याद रखना, मैं कुछ दिन बाद तुम्हारी परीक्षा लूँगा और अगर तुम परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं लाए तो देख लेना…’ असल में परिवार के बड़े लोगों ने मुझे कहानी सुनाकर, उसकी मूल सीख के बारे में चर्चा कर, मुझे अपनी कल्पना शक्ति के साथ, अपने सपनों की दुनिया में रहते हुए उसका अर्थ निकालने, इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया था। हो सकता है आपमें से कुछ लोग इसे मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव मान सकते हैं और सोच सकते हैं यह कोई तार्किक कारण तो नहीं हुआ, तो चलिए थोड़ा सा विज्ञान के आधार पर इसके प्रभाव को समझ लेते हैं।
अमेरिका के द फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ एबीसी (UFABC) एवं इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड एजुकेशन के डॉक्टरों द्वारा अस्पताल के आई॰सी॰यू॰ में भर्ती 2 से 7 साल के 81 बच्चों पर एक रिसर्च की गई। जिसका मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि क्या कहानियाँ वाक़ई में शारीरिक और भावनात्मक लाभ पहुँचाती हैं?
रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए इसका नेतृत्व कर रहे यूएफएबीसी के गुलहर्म ब्रोकिंगटन और आईडीओआर के जॉर्ज मोल ने बच्चों को दो समूह में बाँटा। आधे बच्चों को प्रतिदिन 25 से 30 मिनिट तक पहेलियाँ पूछी और बचे हुए आधे बच्चों को इतनी ही देर कहानियाँ सुनाई गई। इस प्रयोग का परिणाम जानने के लिए कहानियाँ सुनाने या पहेलियाँ पूछने के पहले और बाद में बच्चों के सलाइवा के सैंपल लिए और उसमें कोर्टिसोल और ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्तर मापा।
आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि सलाइवा में उच्च मात्रा में कोर्टिसोल और निम्न मात्रा में ऑक्सीटोसिन हार्मोन तनाव अर्थात् स्ट्रेस बताता है एवं कम कोर्टिसोल और उच्च ऑक्सीटोसिन हार्मोन शांत होने का संकेत देता है। दोस्तों इस टेस्ट के परिणाम डॉक्टर को चौंकाने वाले थे पहेलियां सुलझाने वाले बच्चों की तुलना में कहानी सुनने वाले बच्चों के सलाइवा में कम कोर्टिसोल और उच्च ऑक्सीटोसिन हार्मोन पाया गया। अर्थात् कहानियाँ सुनने वाले बच्चे अधिक शांत और तनाव रहित पाए गए थे।
इस रिसर्च ने कुछ और बातों को प्रामाणिक रूप से सिद्ध कर दिया था। बच्चों के बेहतरीन जीवन, रचनाशीलता, स्वास्थ्य, रिश्तों को बेहतर बनाने एवं तनाव, दबाव जैसे नकारात्मक भाव कम करने में कहानियाँ सुनाना एक बेहद आसान, कारगर और बढ़िया तरीक़ा है।
असल में दोस्तों कहानी सुनते समय इंसान कल्पना के माध्यम से विचारों और मानवीय संवेदनाओं का अनुभव कर सकता है जो उसे यथार्थ से निकालकर दूसरी दुनिया में ले जाता है। अर्थात् वह तात्कालिक स्थिति से बाहर निकलकर काल्पनिक दुनिया में चला जाता है, जिसे हम 'नैरेटिव ट्रांसपोर्टेशन’ कहते हैं। यही स्थिति उसे नकारात्मक प्रभावों से दूर कर सकारात्मक चीजों से जोड़ देती है। वैसे दोस्तों इस स्थिति, अर्थात् कहानी सुनाते वक्त बच्चों में आए मनोवैज्ञानिक और बायोलॉजिकल परिवर्तन का अनुभव आप कहानी सुनाते वक्त उनके हाव-भाव में आए परिवर्तन को पढ़कर भी समझ सकते हैं। शायद इसीलिए अमेरिका के जाने माने कवि और लेखक स्ट्रिकलैंड गिलियन ने अपनी कविता ‘द रीडिंग मदर’ में कहा था, ‘मुझसे ज़्यादा अमीर तुम कभी हो ही नहीं सकते क्यूँकि मेरी एक माँ थी जिनके साथ मैंने कहानियाँ पढ़ी।’दोस्तों, मुझसे अकसर पूछे जाने वाले सवालों की सूची में अब एक नया सवाल जुड़ गया है, ‘सर, आप अपने हर लेख में कहानियों का इस्तेमाल क्यूँ करते हैं और इतनी सारी कहानियाँ लाते कहाँ से हैं?’ तो चलिए मैं पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से के जवाब से शुरू करता हूँ, ‘मैंने बचपन में बहुत सारी कहानियाँ सुनी हैं, इसलिए याद हैं और दूसरी बात मैं अभी भी कहानियाँ पढ़ता हूँ। रही बात हर लेख में कहानियों के ज़िक्र की तो दोस्तों, मैंने जीवन मूल्य, चरित्र के महत्व, सही और ग़लत के फ़र्क़ आदि जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों के बारे में परिवार के बुजुर्गों द्वारा सुनाई गई कहानियों से ही सीखा है। इसलिए मुझे लगता है कि जीवन के सूत्र कहानियों से सीखना और सिखाना बहुत आसान है।’ वैसे अगर आप थोड़ा गहराई से जाकर देखेंगे तो पाएँगे कि कहानियाँ सामान्यतः अपने अंदर कई गूढ़ अर्थ लिए हुए होती है, अर्थात् वे हमें सीधे-सीधे कुछ कहने की जगह अंदाज़ा लगाने की छूट देती हैं। साथ ही वे हमें कल्पना के द्वारा नए विषयों, घटनाओं या जगहों, परिस्थितियों, चुनौतियों के बारे में विचार करने का मौक़ा देती हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ हुआ, यह हमारी कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं। कहानियाँ कभी भी सुनने वाले का आकलन नहीं करती हैं। जी हाँ दोस्तों, कहानियाँ सुनाते वक्त मुझे आजतक किसी ने भी नहीं कहा है, ‘इस कहानी को अच्छे से याद रखना, मैं कुछ दिन बाद तुम्हारी परीक्षा लूँगा और अगर तुम परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं लाए तो देख लेना…’ असल में परिवार के बड़े लोगों ने मुझे कहानी सुनाकर, उसकी मूल सीख के बारे में चर्चा कर, मुझे अपनी कल्पना शक्ति के साथ, अपने सपनों की दुनिया में रहते हुए उसका अर्थ निकालने, इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया था। हो सकता है आपमें से कुछ लोग इसे मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव मान सकते हैं और सोच सकते हैं यह कोई तार्किक कारण तो नहीं हुआ, तो चलिए थोड़ा सा विज्ञान के आधार पर इसके प्रभाव को समझ लेते हैं। अमेरिका के द फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ एबीसी (UFABC) एवं इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड एजुकेशन के डॉक्टरों द्वारा अस्पताल के आई॰सी॰यू॰ में भर्ती 2 से 7 साल के 81 बच्चों पर एक रिसर्च की गई। जिसका मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि क्या कहानियाँ वाक़ई में शारीरिक और भावनात्मक लाभ पहुँचाती हैं? रिसर्च को आगे बढ़ाने के लिए इसका नेतृत्व कर रहे यूएफएबीसी के गुलहर्म ब्रोकिंगटन और आईडीओआर के जॉर्ज मोल ने बच्चों को दो समूह में बाँटा। आधे बच्चों को प्रतिदिन 25 से 30 मिनिट तक पहेलियाँ पूछी और बचे हुए आधे बच्चों को इतनी ही देर कहानियाँ सुनाई गई। इस प्रयोग का परिणाम जानने के लिए कहानियाँ सुनाने या पहेलियाँ पूछने के पहले और बाद में बच्चों के सलाइवा के सैंपल लिए और उसमें कोर्टिसोल और ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्तर मापा। आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि सलाइवा में उच्च मात्रा में कोर्टिसोल और निम्न मात्रा में ऑक्सीटोसिन हार्मोन तनाव अर्थात् स्ट्रेस बताता है एवं कम कोर्टिसोल और उच्च ऑक्सीटोसिन हार्मोन शांत होने का संकेत देता है। दोस्तों इस टेस्ट के परिणाम डॉक्टर को चौंकाने वाले थे पहेलियां सुलझाने वाले बच्चों की तुलना में कहानी सुनने वाले बच्चों के सलाइवा में कम कोर्टिसोल और उच्च ऑक्सीटोसिन हार्मोन पाया गया। अर्थात् कहानियाँ सुनने वाले बच्चे अधिक शांत और तनाव रहित पाए गए थे। इस रिसर्च ने कुछ और बातों को प्रामाणिक रूप से सिद्ध कर दिया था। बच्चों के बेहतरीन जीवन, रचनाशीलता, स्वास्थ्य, रिश्तों को बेहतर बनाने एवं तनाव, दबाव जैसे नकारात्मक भाव कम करने में कहानियाँ सुनाना एक बेहद आसान, कारगर और बढ़िया तरीक़ा है। असल में दोस्तों कहानी सुनते समय इंसान कल्पना के माध्यम से विचारों और मानवीय संवेदनाओं का अनुभव कर सकता है जो उसे यथार्थ से निकालकर दूसरी दुनिया में ले जाता है। अर्थात् वह तात्कालिक स्थिति से बाहर निकलकर काल्पनिक दुनिया में चला जाता है, जिसे हम 'नैरेटिव ट्रांसपोर्टेशन’ कहते हैं। यही स्थिति उसे नकारात्मक प्रभावों से दूर कर सकारात्मक चीजों से जोड़ देती है। वैसे दोस्तों इस स्थिति, अर्थात् कहानी सुनाते वक्त बच्चों में आए मनोवैज्ञानिक और बायोलॉजिकल परिवर्तन का अनुभव आप कहानी सुनाते वक्त उनके हाव-भाव में आए परिवर्तन को पढ़कर भी समझ सकते हैं। शायद इसीलिए अमेरिका के जाने माने कवि और लेखक स्ट्रिकलैंड गिलियन ने अपनी कविता ‘द रीडिंग मदर’ में कहा था, ‘मुझसे ज़्यादा अमीर तुम कभी हो ही नहीं सकते क्यूँकि मेरी एक माँ थी जिनके साथ मैंने कहानियाँ पढ़ी।’0 Comments 0 Shares 1K Views -
दोस्तों, कल मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर के पास स्थित एक छोटे से शहर धार में ‘ज्ञानकुंज प्ले स्कूल’ द्वारा आयोजित ‘नन्हे उस्ताद किड्स कार्निवल’ में भाग लेने का मौक़ा मिला, जिसमें 2-7 वर्ष के बच्चों के लिए विभिन्न खेल, फ़ैन्सी ड्रेस, गायन, डांस, हेल्दी बेबी जैसी कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की गई थी। उक्त कार्यक्रम में बच्चों के उत्साह और तैयारियों के साथ-साथ प्रदर्शन के लिए चुने गए गानों या रोल को देख मैं हैरान रह गया । बड़े शहरों में जहाँ इस उम्र के बच्चे फ़िल्मी गानों को चुनना पसंद करते हैं, वहीं धार के 3-7 साल के बच्चे बहुत आराम से भजन, गणेश स्तुति, विभिन्न मंत्र, रानी लक्ष्मीबाई, सैनिक के रूप में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे। उन बच्चों को इस तरह प्रदर्शन करता देख मैं सोच रहा था, छोटे शहरों में हम बहुत खूबसूरती से अपनी संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़कर, उसे सुदृढ़ बनाते जा रहे हैं।
वहीं इन बच्चों के पालक अलग-अलग समूह में विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त थे। जैसे बच्चों की कला का प्रदर्शन अच्छे से करवाना, उन्हे प्ले ज़ोन में खिलाना या फिर समूह बनाकर चर्चा करना। चर्चा में मगन समूह, मुख्यतः दो भागों में बंट गया था। पहला समूह विद्यालय के 20000 वर्ग फ़ीट से अधिक जगह में फैले इंफ़्रास्ट्रक्चर को देख कह रहा था, ‘प्ले स्कूल तो खेलने के लिए होता है। इसलिए यह सारी सुविधाएँ होना ज़रूरी है।’, वहीं समूह के बचे हुए लोग इसके ठीक विपरीत सभी चीजों को फ़ालतू का दिखावा बता रहे थे। कुछ के अनुसार, शिक्षा भी अब व्यापार हो गई थी।
मैं लोगों की मिश्रित प्रतिक्रिया देख हैरान था। इसलिए नहीं कि वे किसी के अच्छे प्रयास की सराहना नहीं कर रहे थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें यह पता नहीं था की बच्चों की शिक्षा में शुरुआती सालों का कितना अधिक महत्व होता है। दोस्तों, माफ़ कीजिएगा थोड़ा कड़वा और स्पष्ट बोल रहा हूँ, लेकिन यह आने वाली पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। इसलिए हमें इस पर खुलकर चर्चा करना ही होगी। असल में दोस्तों, रिसर्च का एक आँकड़ा बताता है कि हम अपने जीवन में जो भी हमेशा के लिए सीखते हैं अर्थात् परमानेंट लर्निंग करते हैं, उसका 90 प्रतिशत हम 14 वर्ष तक सीख जाते हैं और इस 90 प्रतिशत का भी 90 प्रतिशत हम 7 साल की उम्र तक सीख लेते हैं। इस आधार पर इन वर्षों में मिली शिक्षा का महत्व बढ़ जाता है।
चलिए थोड़ी देर के लिए इन तथ्यों को भी एक तरफ़ रख, बच्चों के स्वाभाविक तौर पर बड़ा होने की प्रक्रिया को देख लेते हैं। मान लीजिए आप किसी छोटे से बच्चे को खिलाने के लिए जाते हैं और आप उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। अब बताइए आप क्या करेंगे? चुटकी या ताली बजाएँगे। सही कहा ना मैंने? लेकिन अगर आप इसी चुटकी या ताली को कई बार उस बच्चे के सामने बजाते हैं तो वह क्या करता है? वह भी चुटकी या ताली बजाने का प्रयास करता है। ठीक इसी तरह वह चलना, बोलना, भाषा, चीजों का उपयोग करना आदि सीख जाता है। असल में दोस्तों इसकी मुख्य वजह जन्म के साथ ही बच्चे के अंदर स्वाभाविक रूप से सीखने की ललक का होना है। इस उम्र में बच्चे का ऑब्ज़र्वेशन कौशल और जिज्ञासा अधिकतम होती है। साथ ही वह डर जैसे अन्य नकारात्मक भावों से भी कोसों दूर होता है। इसी कारण उसके सामने जो भी वस्तु, व्यक्ति या माहौल आता है, वह उसे समझने या सीखने का प्रयास करने लगता है। उदाहरण के लिए खिलौना चल कैसे रहा है जानने के प्रयास में उसे तोड़ देना।
इसी उम्र में दोस्तों उस बच्चे में बहुत तेज़ी से शारीरिक बदलाव आते हैं। इसलिए हमें सामान्य शिक्षा के साथ-साथ उसकी शारीरिक क्षमता के विकास पर भी काम करना चाहिए। इसके लिए हमें उसकी मसल्स को ताकतवर बनाने अर्थात् फ़ाइन और ग्रोस मोटर स्किलस, सेन्सेस और कोर्डिनेशन आदि पर काम करना होगा। उपरोक्त दोनों प्रकार की शिक्षा के लिए हमें उसे शारीरिक गतिविधियों के साथ अधिकतम एक्सपोजर देने की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन सामान्यतः पालक बच्चे की सुरक्षा के डर अथवा जानकारी के अभाव में ऐसा कर नहीं पाते हैं और पूरी तरह सकारात्मक मन के अंदर कई प्रकार के डर या नकारात्मक भाव बैठाते जाते हैं। जैसे पलंग, सोफ़े, टेबल आदि के नीचे घुसने पर ‘बाऊ’ से डराना, घर से बाहर जाने पर, ‘झोली वाले बाबा’ से डराना अथवा स्टोर रूम या किसी भी अंधेरी जगह जाने पर ‘भूत’ का डर दिखाना, आदि। बाद में यही डर या कमियाँ उसके सीखने की सामान्य प्रक्रिया को बाधित करने लगती हैं।
याद रखिएगा दोस्तों बड़ी कक्षाओं से ज़्यादा ज़रूरी छोटी कक्षाओं में बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना है क्यूँकि उसके जीवन की नींव इस उम्र में सीखी और समझी गई बातों पर बनती है। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ जीवन के शुरुआती साल आपके जीवन की दिशा तय करते हैं, इसलिए अपने बच्चे के लिए उपरोक्त बातों के आधार पर अच्छा स्कूल चुनिए, साथ ही उसे ढेर सारा समय देकर सही तरीके से ढालिए।दोस्तों, कल मध्यप्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर के पास स्थित एक छोटे से शहर धार में ‘ज्ञानकुंज प्ले स्कूल’ द्वारा आयोजित ‘नन्हे उस्ताद किड्स कार्निवल’ में भाग लेने का मौक़ा मिला, जिसमें 2-7 वर्ष के बच्चों के लिए विभिन्न खेल, फ़ैन्सी ड्रेस, गायन, डांस, हेल्दी बेबी जैसी कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की गई थी। उक्त कार्यक्रम में बच्चों के उत्साह और तैयारियों के साथ-साथ प्रदर्शन के लिए चुने गए गानों या रोल को देख मैं हैरान रह गया । बड़े शहरों में जहाँ इस उम्र के बच्चे फ़िल्मी गानों को चुनना पसंद करते हैं, वहीं धार के 3-7 साल के बच्चे बहुत आराम से भजन, गणेश स्तुति, विभिन्न मंत्र, रानी लक्ष्मीबाई, सैनिक के रूप में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे। उन बच्चों को इस तरह प्रदर्शन करता देख मैं सोच रहा था, छोटे शहरों में हम बहुत खूबसूरती से अपनी संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़कर, उसे सुदृढ़ बनाते जा रहे हैं। वहीं इन बच्चों के पालक अलग-अलग समूह में विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त थे। जैसे बच्चों की कला का प्रदर्शन अच्छे से करवाना, उन्हे प्ले ज़ोन में खिलाना या फिर समूह बनाकर चर्चा करना। चर्चा में मगन समूह, मुख्यतः दो भागों में बंट गया था। पहला समूह विद्यालय के 20000 वर्ग फ़ीट से अधिक जगह में फैले इंफ़्रास्ट्रक्चर को देख कह रहा था, ‘प्ले स्कूल तो खेलने के लिए होता है। इसलिए यह सारी सुविधाएँ होना ज़रूरी है।’, वहीं समूह के बचे हुए लोग इसके ठीक विपरीत सभी चीजों को फ़ालतू का दिखावा बता रहे थे। कुछ के अनुसार, शिक्षा भी अब व्यापार हो गई थी। मैं लोगों की मिश्रित प्रतिक्रिया देख हैरान था। इसलिए नहीं कि वे किसी के अच्छे प्रयास की सराहना नहीं कर रहे थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें यह पता नहीं था की बच्चों की शिक्षा में शुरुआती सालों का कितना अधिक महत्व होता है। दोस्तों, माफ़ कीजिएगा थोड़ा कड़वा और स्पष्ट बोल रहा हूँ, लेकिन यह आने वाली पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। इसलिए हमें इस पर खुलकर चर्चा करना ही होगी। असल में दोस्तों, रिसर्च का एक आँकड़ा बताता है कि हम अपने जीवन में जो भी हमेशा के लिए सीखते हैं अर्थात् परमानेंट लर्निंग करते हैं, उसका 90 प्रतिशत हम 14 वर्ष तक सीख जाते हैं और इस 90 प्रतिशत का भी 90 प्रतिशत हम 7 साल की उम्र तक सीख लेते हैं। इस आधार पर इन वर्षों में मिली शिक्षा का महत्व बढ़ जाता है। चलिए थोड़ी देर के लिए इन तथ्यों को भी एक तरफ़ रख, बच्चों के स्वाभाविक तौर पर बड़ा होने की प्रक्रिया को देख लेते हैं। मान लीजिए आप किसी छोटे से बच्चे को खिलाने के लिए जाते हैं और आप उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। अब बताइए आप क्या करेंगे? चुटकी या ताली बजाएँगे। सही कहा ना मैंने? लेकिन अगर आप इसी चुटकी या ताली को कई बार उस बच्चे के सामने बजाते हैं तो वह क्या करता है? वह भी चुटकी या ताली बजाने का प्रयास करता है। ठीक इसी तरह वह चलना, बोलना, भाषा, चीजों का उपयोग करना आदि सीख जाता है। असल में दोस्तों इसकी मुख्य वजह जन्म के साथ ही बच्चे के अंदर स्वाभाविक रूप से सीखने की ललक का होना है। इस उम्र में बच्चे का ऑब्ज़र्वेशन कौशल और जिज्ञासा अधिकतम होती है। साथ ही वह डर जैसे अन्य नकारात्मक भावों से भी कोसों दूर होता है। इसी कारण उसके सामने जो भी वस्तु, व्यक्ति या माहौल आता है, वह उसे समझने या सीखने का प्रयास करने लगता है। उदाहरण के लिए खिलौना चल कैसे रहा है जानने के प्रयास में उसे तोड़ देना। इसी उम्र में दोस्तों उस बच्चे में बहुत तेज़ी से शारीरिक बदलाव आते हैं। इसलिए हमें सामान्य शिक्षा के साथ-साथ उसकी शारीरिक क्षमता के विकास पर भी काम करना चाहिए। इसके लिए हमें उसकी मसल्स को ताकतवर बनाने अर्थात् फ़ाइन और ग्रोस मोटर स्किलस, सेन्सेस और कोर्डिनेशन आदि पर काम करना होगा। उपरोक्त दोनों प्रकार की शिक्षा के लिए हमें उसे शारीरिक गतिविधियों के साथ अधिकतम एक्सपोजर देने की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन सामान्यतः पालक बच्चे की सुरक्षा के डर अथवा जानकारी के अभाव में ऐसा कर नहीं पाते हैं और पूरी तरह सकारात्मक मन के अंदर कई प्रकार के डर या नकारात्मक भाव बैठाते जाते हैं। जैसे पलंग, सोफ़े, टेबल आदि के नीचे घुसने पर ‘बाऊ’ से डराना, घर से बाहर जाने पर, ‘झोली वाले बाबा’ से डराना अथवा स्टोर रूम या किसी भी अंधेरी जगह जाने पर ‘भूत’ का डर दिखाना, आदि। बाद में यही डर या कमियाँ उसके सीखने की सामान्य प्रक्रिया को बाधित करने लगती हैं। याद रखिएगा दोस्तों बड़ी कक्षाओं से ज़्यादा ज़रूरी छोटी कक्षाओं में बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना है क्यूँकि उसके जीवन की नींव इस उम्र में सीखी और समझी गई बातों पर बनती है। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ जीवन के शुरुआती साल आपके जीवन की दिशा तय करते हैं, इसलिए अपने बच्चे के लिए उपरोक्त बातों के आधार पर अच्छा स्कूल चुनिए, साथ ही उसे ढेर सारा समय देकर सही तरीके से ढालिए।0 Comments 0 Shares 1K Views -
हाल ही में एक विद्यालय में बच्चों एवं शिक्षकों के साथ चर्चा करने का मौक़ा मिला। चर्चा के दौरान मैंने पाया कि वहाँ मौजूद लगभग सभी लोगों का लक्ष्य एक समान था, ‘सफल बनना!’, वैसे सफलता लक्ष्य होना ग़लत भी नहीं है लेकिन दिक़्क़त तब बढ़ जाती है जब सफलता का अर्थ किसी अन्य से आगे निकलना अथवा उनके जैसा बनना हो जाता है। यह स्थिति आपको एक ऐसी चूहा दौड़ का हिस्सा बना देती है, जिसका अंत कहीं नज़र ही नहीं आता है। इसका एक और बहुत बड़ा नुक़सान है, आप इस अंतहीन दौड़ के चक्कर में जीवन जीना ही भूल जाते हैं।
दोस्तों मेरा मानना है जीवन में लक्ष्य होना बहुत आवश्यक है, लेकिन वह हमारा अपना होना चाहिए, किसी और से उधार लिया हुआ नहीं और दूसरी बात तुलना करना सिर्फ़ और सिर्फ़ तब सही हो सकता है जब आप अपने बीते हुए कल से आज की तुलना कर रहे हों। जी हाँ दोस्तों, इस जीवन को उच्चतम स्तर तक, खुश, संतुष्ट, शांत और मस्त रहते हुए जीना है तो आपको बस रोज़ खुद से ही थोड़ा सा बेहतर बनते जाना है। आइए दोस्तों अगले तीन दिनों में हम खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्र सीखते हैं-
आप अपना जीवन कैसे जीना चाहते हैं, यह आपसे बेहतर कोई और नहीं जान सकता है। इसलिए अपने जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम अपने जीवन का खाका बनाएँ और फिर उस खाके के आधार पर अपने जीवन का एक विज़न बनाएँ। विज़न बनाते समय अपनी ऊर्जा का पूर्ण उपयोग करने के लिए इस इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो।
दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ
सिर्फ़ विज़न होना तब तक अधूरा है जब तक आपके पास उसे पूरा करने की योजना ना हो। सबसे पहले अपने विज़न को छोटे-छोटे लक्ष्यों में परिवर्तित कर लें और उसके बाद इन लक्ष्यों को पाने की तारीख़ तय कर उसके आधार पर योजना बनाएँ।
तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें
अक्सर लोग सफल होने या खुद को बेहतर बनाने के लिए आसान रास्ता या शॉर्टकट ढूँढते हैं और काफ़ी सारा समय इसमें बर्बाद कर देते हैं। याद रखें सफल या खुद को बेहतर बनाने के लिए आज तक किसी को भी कोई जादू की छड़ी नहीं मिली है। इसके लिए आपको अपने विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे-छोटे लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए मेहनत करना होगी।
चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत
सफल या बेहतर बनने के सपने सिर्फ़ देखने के लिए नहीं होते हैं, बल्कि हर हाल में पूरा करने के लिए होते हैं। आप जो कल्पना करते हैं, वह बन सकते हैं। बस आपको स्वयं को शून्य पर मान, कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य और विज़न को ध्यान में रखते हुए उठाने होंगे।
पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ
सामान्यतः लोग लक्ष्य पाने के लिए अलग-अलग स्तर पर आवश्यक हर वस्तु अथवा रिसोर्स को योजना के पहले स्तर पर, पहला कदम उठाने के पहले ही अरेंज करना चाहते हैं, जो सामान्यतः सम्भव नहीं होता है। इसे मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। मान लीजिए हमारा लक्ष्य मैराथन दौड़ के सामान है, जिसमें दौड़ने का आपको कोई पूर्व अनुभव नहीं है। ऐसी स्थिति में सामान्यतः हम सबसे पहले दौड़ के लिए आवश्यक सारा सामान जुटाने लग जाते हैं और अगर कोई संसाधन नहीं मिलता है तो उसके लिए परेशान हो जाते हैं। इसके स्थान पर सबसे पहले जो उपलब्ध है उसके साथ ही पहला कदम उठा कर दौड़ना शुरू कर दीजिए, फिर भले ही आप 100, 200, 500 मीटर ही दौड़ पाएँ।
छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ
जो सफल हुआ है, वह सफल होना सिखा सकता है। ठीक इसी तरह जिसने स्वयं को खुद से बेहतर बनाया है वह आपको बेहतर बनना सिखा सकता है। इसलिए स्वयं को ऐसे लोगों से जोड़े रखने का प्रयास करें, जो रोज़ खुद को पहले से बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर आपके लिए उनसे मिलना, उनके साथ रहना सम्भव नहीं है तो सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से जुड़ने का प्रयास करें। इसके लिए आप समान रुचि वाले लोगों के समूह अथवा क्लब आदि से भी जुड़ सकते हैं।
सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें
अक्सर बड़े लक्ष्य का पीछा करते वक्त हम खुद की क्षमताओं, उठाए गए कदमों पर ही शक करना शुरू कर देते हैं और बार-बार खुद का और अपनी योजना का पुनर्मूल्यांकन करने लगते हैं। हो सकता है आज आपके पास अपने लक्ष्य को पाने की सर्वश्रेष्ठ योजना या उसके लिए आवश्यक ज्ञान न हो, लेकिन अगर आपको सही दिशा में जाने के बारे में कुछ कदम भी मालूम हैं तो बिना शक के उन्हें लेना शुरू करें। एक-एक कदम आगे बढ़ना, ज़रूरी ज्ञान लेना और बेहतर योजना बनाना आपको दोनों सिखा देगा।
आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अगले चार सूत्र सीखेंगे।हाल ही में एक विद्यालय में बच्चों एवं शिक्षकों के साथ चर्चा करने का मौक़ा मिला। चर्चा के दौरान मैंने पाया कि वहाँ मौजूद लगभग सभी लोगों का लक्ष्य एक समान था, ‘सफल बनना!’, वैसे सफलता लक्ष्य होना ग़लत भी नहीं है लेकिन दिक़्क़त तब बढ़ जाती है जब सफलता का अर्थ किसी अन्य से आगे निकलना अथवा उनके जैसा बनना हो जाता है। यह स्थिति आपको एक ऐसी चूहा दौड़ का हिस्सा बना देती है, जिसका अंत कहीं नज़र ही नहीं आता है। इसका एक और बहुत बड़ा नुक़सान है, आप इस अंतहीन दौड़ के चक्कर में जीवन जीना ही भूल जाते हैं। दोस्तों मेरा मानना है जीवन में लक्ष्य होना बहुत आवश्यक है, लेकिन वह हमारा अपना होना चाहिए, किसी और से उधार लिया हुआ नहीं और दूसरी बात तुलना करना सिर्फ़ और सिर्फ़ तब सही हो सकता है जब आप अपने बीते हुए कल से आज की तुलना कर रहे हों। जी हाँ दोस्तों, इस जीवन को उच्चतम स्तर तक, खुश, संतुष्ट, शांत और मस्त रहते हुए जीना है तो आपको बस रोज़ खुद से ही थोड़ा सा बेहतर बनते जाना है। आइए दोस्तों अगले तीन दिनों में हम खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्र सीखते हैं- आप अपना जीवन कैसे जीना चाहते हैं, यह आपसे बेहतर कोई और नहीं जान सकता है। इसलिए अपने जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सर्वप्रथम अपने जीवन का खाका बनाएँ और फिर उस खाके के आधार पर अपने जीवन का एक विज़न बनाएँ। विज़न बनाते समय अपनी ऊर्जा का पूर्ण उपयोग करने के लिए इस इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो। दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ सिर्फ़ विज़न होना तब तक अधूरा है जब तक आपके पास उसे पूरा करने की योजना ना हो। सबसे पहले अपने विज़न को छोटे-छोटे लक्ष्यों में परिवर्तित कर लें और उसके बाद इन लक्ष्यों को पाने की तारीख़ तय कर उसके आधार पर योजना बनाएँ। तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें अक्सर लोग सफल होने या खुद को बेहतर बनाने के लिए आसान रास्ता या शॉर्टकट ढूँढते हैं और काफ़ी सारा समय इसमें बर्बाद कर देते हैं। याद रखें सफल या खुद को बेहतर बनाने के लिए आज तक किसी को भी कोई जादू की छड़ी नहीं मिली है। इसके लिए आपको अपने विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे-छोटे लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए मेहनत करना होगी। चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत सफल या बेहतर बनने के सपने सिर्फ़ देखने के लिए नहीं होते हैं, बल्कि हर हाल में पूरा करने के लिए होते हैं। आप जो कल्पना करते हैं, वह बन सकते हैं। बस आपको स्वयं को शून्य पर मान, कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य और विज़न को ध्यान में रखते हुए उठाने होंगे। पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ सामान्यतः लोग लक्ष्य पाने के लिए अलग-अलग स्तर पर आवश्यक हर वस्तु अथवा रिसोर्स को योजना के पहले स्तर पर, पहला कदम उठाने के पहले ही अरेंज करना चाहते हैं, जो सामान्यतः सम्भव नहीं होता है। इसे मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। मान लीजिए हमारा लक्ष्य मैराथन दौड़ के सामान है, जिसमें दौड़ने का आपको कोई पूर्व अनुभव नहीं है। ऐसी स्थिति में सामान्यतः हम सबसे पहले दौड़ के लिए आवश्यक सारा सामान जुटाने लग जाते हैं और अगर कोई संसाधन नहीं मिलता है तो उसके लिए परेशान हो जाते हैं। इसके स्थान पर सबसे पहले जो उपलब्ध है उसके साथ ही पहला कदम उठा कर दौड़ना शुरू कर दीजिए, फिर भले ही आप 100, 200, 500 मीटर ही दौड़ पाएँ। छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ जो सफल हुआ है, वह सफल होना सिखा सकता है। ठीक इसी तरह जिसने स्वयं को खुद से बेहतर बनाया है वह आपको बेहतर बनना सिखा सकता है। इसलिए स्वयं को ऐसे लोगों से जोड़े रखने का प्रयास करें, जो रोज़ खुद को पहले से बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर आपके लिए उनसे मिलना, उनके साथ रहना सम्भव नहीं है तो सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से जुड़ने का प्रयास करें। इसके लिए आप समान रुचि वाले लोगों के समूह अथवा क्लब आदि से भी जुड़ सकते हैं। सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें अक्सर बड़े लक्ष्य का पीछा करते वक्त हम खुद की क्षमताओं, उठाए गए कदमों पर ही शक करना शुरू कर देते हैं और बार-बार खुद का और अपनी योजना का पुनर्मूल्यांकन करने लगते हैं। हो सकता है आज आपके पास अपने लक्ष्य को पाने की सर्वश्रेष्ठ योजना या उसके लिए आवश्यक ज्ञान न हो, लेकिन अगर आपको सही दिशा में जाने के बारे में कुछ कदम भी मालूम हैं तो बिना शक के उन्हें लेना शुरू करें। एक-एक कदम आगे बढ़ना, ज़रूरी ज्ञान लेना और बेहतर योजना बनाना आपको दोनों सिखा देगा। आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अगले चार सूत्र सीखेंगे।0 Comments 0 Shares 1K Views1
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सफलता का अर्थ कभी भी दूसरों से बेहतर बनना नहीं होता है। अगर आप खुश, मस्त, शांत और संतुष्ट रहते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो दूसरों से आगे निकलने, बेहतर बनने की चूहा दौड़ से बाहर निकल कर खुद का बेहतर वर्ज़न बनने का प्रयास करें। कल हमने खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्रों में से 7 सूत्र सीखे थे। अगले 4 सूत्र सीखने से पहले आईए उन्हें संक्षेप में दोहरा लेते हैं-
पहला सूत्र - विज़न बनाएँ
जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विज़न अर्थात् आप कैसा जीवन जीना चाहते हैं उसकी रूपरेखा बनाना आपके जीवन को दिशा देता है और यही दिशा आपकी दशा सुधारती है। इसलिए विज़न बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण इस बात का ध्यान रखना है आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो।
दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ
योजना के बिना विज़न को हक़ीक़त में बदलना असम्भव होगा इसलिए पहले विज़न को छोटे लक्ष्यों में तब्दील करें और उसे हक़ीक़त में बदलने के लिए समयबद्ध योजना बनाएँ।
तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें
बेहतर बनने के लिए जादुई छड़ी अर्थात् शॉर्टकट ढूँढने में समय बर्बाद करने के स्थान पर विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ। यही छोटे-छोटे कदम आपको सर्वश्रेष्ठ बनाएँगे।
चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत
सिर्फ़ सपने आपको सफल या बेहतर नहीं बनाते, उसके लिए आपको अपने ईगो को छोड़कर , स्वयं को शून्य मानते हुए विज़न के आधार पर शुरुआत करना होगी और कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाना होंगे।
पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ
सिर्फ़ आदर्श स्थिति बनाने के उद्देश्य से सब कुछ पहले से अरेंज कर शुरुआत करने की योजना सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही सफल होती है। जो ज्ञान और संसाधन आपके पास आज हैं उसे काम में लेते हुए लक्ष्य की दिशा में पहला कदम उठाना, आपको सफल और बेहतर बनाता है। साथ ही यह आपकी काग़ज़ी योजना को यथार्थ के धरातल पर परखकर बेहतर बनाता है।
छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ
कहते हैं ना, ‘ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है।’ इसी तरह सफल और अपने से बेहतर लोगों के बीच में रहना आपको भी बेहतर बनाता है। आप क्लब, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भी ऐसे लोगों के सम्पर्क में बने रह सकते हैं। यह लोग आपकी और आपकी योजनाओं की कमियों को पहचान कर बेहतर बनने में भी मदद कर सकते हैं।
सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें
पहली बार में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर, फ़ुल प्रूफ योजना बनाने के लिए खुद की क्षमताओं और उठाए गए कदमों पर शक करने के स्थान पर अपने ज्ञान के आधार पर लक्ष्य की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाएँ। यह छोटे कदम आपको आगे की राह दिखा, सही योजना बनाना सिखा देंगे और योजना के आधार पर नए हुनर सीखना या संसाधन जुटाना आसान रहेगा।
चलिए अब हम अगले 4 सूत्र सीखते हैं-
आठवाँ सूत्र - सीखें
कई बार खुद को बुद्धिमान या विशेषज्ञ दिखाने के प्रयास में हम उन चीजों को जानने का नाटक करते हैं जिनके बारे में हम बिल्कुल भी जानते नहीं हैं। यदि आप पहले से ही ज्ञानी होने का दिखावा करेंगे तो आप कभी कुछ नहीं सीख पाएँगे। सीखना हमारे ज्ञान को बढ़ाकर हमें बुद्धिमान बनाता है और अगर आप हर पल, हर हाल में, हर किसी से सीख रहे हों तो आपको, जीवन में आगे बढ़ने तथा बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। पूर्व में सीखना इतना आसान नहीं था क्यूँकि तब आप इसके लिए किसी ना किसी संस्था या व्यक्ति के ऊपर निर्भर रहते थे। लेकिन अब इंटरनेट ने सिर्फ़ सीखने ही नहीं बल्कि सम्पर्क या व्यापार करने, लिखने, पढ़ने आदि सभी के तरीके को मौलिक रूप से पूरी तरह बदल दिया है। इस मौक़े को पहचाने और अन्यत्र समय बर्बाद करने के स्थान पर, अपनी सुविधानुसार, जब चाहें इंटरनेट से यह कार्य करें और खुद को हर पल, हर परिस्थिति में बेहतर बनाएँ।
नवाँ सूत्र - अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिखें अथवा चित्रित करें
जब आप अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिख अथवा चित्रित कर, बार-बार देखते हैं तो आपका अंतर्मन उन विचारों के प्रति प्रोग्राम होता जाता है और भविष्य में आप इनसे संदर्भित विचारों पर बहुत गहराई से सोचने के लिए प्रेरित होते हैं।
दसवाँ सूत्र - ईगो को करें बाय-बाय
अहंकारी मन सामान्यतः आपको ना तो अपनी गलती और ना ही दूसरों की अच्छी बातों को स्वीकारने देता है। इसलिए खुद को बेहतर बनाने की राह में अपने अभिमान को रास्ते में ना आने दें। इसका एक फ़ायदा यह भी होता है कि आप दूसरों की मदद लेने में भी हिचकिचाते नहीं हैं।
ग्यारहवाँ सूत्र - उत्कृष्टता के लिए कार्य करें ना कि घड़ी देखकर
अगर काम करते वक्त आपको बार-बार घड़ी देखना पड़ रही है तो इसका सीधा-सीधा अर्थ है, आप अपने कार्य में दिल नहीं लगा पा रहे हैं। अपना सर्वश्रेष्ठ वर्ज़न बनने के लिए आपने कितने घंटे काम किया से ज़्यादा ज़रूरी यह जानना है कि आप कितनी उत्कृष्टता से कार्य कर रहे हैं। यह तभी सम्भव है जब आप आनंदित रहते हुए कार्य करें। घंटे गिनकर कार्य करना लक्ष्य पाने में लगने वाले समय को बढ़ा देता है।
आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अंतिम चार सूत्र सीखेंगे।सफलता का अर्थ कभी भी दूसरों से बेहतर बनना नहीं होता है। अगर आप खुश, मस्त, शांत और संतुष्ट रहते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो दूसरों से आगे निकलने, बेहतर बनने की चूहा दौड़ से बाहर निकल कर खुद का बेहतर वर्ज़न बनने का प्रयास करें। कल हमने खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्रों में से 7 सूत्र सीखे थे। अगले 4 सूत्र सीखने से पहले आईए उन्हें संक्षेप में दोहरा लेते हैं-
पहला सूत्र - विज़न बनाएँ
जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विज़न अर्थात् आप कैसा जीवन जीना चाहते हैं उसकी रूपरेखा बनाना आपके जीवन को दिशा देता है और यही दिशा आपकी दशा सुधारती है। इसलिए विज़न बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण इस बात का ध्यान रखना है आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो।
दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ
योजना के बिना विज़न को हक़ीक़त में बदलना असम्भव होगा इसलिए पहले विज़न को छोटे लक्ष्यों में तब्दील करें और उसे हक़ीक़त में बदलने के लिए समयबद्ध योजना बनाएँ।
तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें
बेहतर बनने के लिए जादुई छड़ी अर्थात् शॉर्टकट ढूँढने में समय बर्बाद करने के स्थान पर विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ। यही छोटे-छोटे कदम आपको सर्वश्रेष्ठ बनाएँगे।
चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत
सिर्फ़ सपने आपको सफल या बेहतर नहीं बनाते, उसके लिए आपको अपने ईगो को छोड़कर , स्वयं को शून्य मानते हुए विज़न के आधार पर शुरुआत करना होगी और कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाना होंगे।
पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ
सिर्फ़ आदर्श स्थिति बनाने के उद्देश्य से सब कुछ पहले से अरेंज कर शुरुआत करने की योजना सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही सफल होती है। जो ज्ञान और संसाधन आपके पास आज हैं उसे काम में लेते हुए लक्ष्य की दिशा में पहला कदम उठाना, आपको सफल और बेहतर बनाता है। साथ ही यह आपकी काग़ज़ी योजना को यथार्थ के धरातल पर परखकर बेहतर बनाता है।
छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ
कहते हैं ना, ‘ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है।’ इसी तरह सफल और अपने से बेहतर लोगों के बीच में रहना आपको भी बेहतर बनाता है। आप क्लब, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भी ऐसे लोगों के सम्पर्क में बने रह सकते हैं। यह लोग आपकी और आपकी योजनाओं की कमियों को पहचान कर बेहतर बनने में भी मदद कर सकते हैं।
सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें
पहली बार में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर, फ़ुल प्रूफ योजना बनाने के लिए खुद की क्षमताओं और उठाए गए कदमों पर शक करने के स्थान पर अपने ज्ञान के आधार पर लक्ष्य की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाएँ। यह छोटे कदम आपको आगे की राह दिखा, सही योजना बनाना सिखा देंगे और योजना के आधार पर नए हुनर सीखना या संसाधन जुटाना आसान रहेगा।
चलिए अब हम अगले 4 सूत्र सीखते हैं-
आठवाँ सूत्र - सीखें
कई बार खुद को बुद्धिमान या विशेषज्ञ दिखाने के प्रयास में हम उन चीजों को जानने का नाटक करते हैं जिनके बारे में हम बिल्कुल भी जानते नहीं हैं। यदि आप पहले से ही ज्ञानी होने का दिखावा करेंगे तो आप कभी कुछ नहीं सीख पाएँगे। सीखना हमारे ज्ञान को बढ़ाकर हमें बुद्धिमान बनाता है और अगर आप हर पल, हर हाल में, हर किसी से सीख रहे हों तो आपको, जीवन में आगे बढ़ने तथा बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। पूर्व में सीखना इतना आसान नहीं था क्यूँकि तब आप इसके लिए किसी ना किसी संस्था या व्यक्ति के ऊपर निर्भर रहते थे। लेकिन अब इंटरनेट ने सिर्फ़ सीखने ही नहीं बल्कि सम्पर्क या व्यापार करने, लिखने, पढ़ने आदि सभी के तरीके को मौलिक रूप से पूरी तरह बदल दिया है। इस मौक़े को पहचाने और अन्यत्र समय बर्बाद करने के स्थान पर, अपनी सुविधानुसार, जब चाहें इंटरनेट से यह कार्य करें और खुद को हर पल, हर परिस्थिति में बेहतर बनाएँ।
नवाँ सूत्र - अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिखें अथवा चित्रित करें
जब आप अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिख अथवा चित्रित कर, बार-बार देखते हैं तो आपका अंतर्मन उन विचारों के प्रति प्रोग्राम होता जाता है और भविष्य में आप इनसे संदर्भित विचारों पर बहुत गहराई से सोचने के लिए प्रेरित होते हैं।
दसवाँ सूत्र - ईगो को करें बाय-बाय
अहंकारी मन सामान्यतः आपको ना तो अपनी गलती और ना ही दूसरों की अच्छी बातों को स्वीकारने देता है। इसलिए खुद को बेहतर बनाने की राह में अपने अभिमान को रास्ते में ना आने दें। इसका एक फ़ायदा यह भी होता है कि आप दूसरों की मदद लेने में भी हिचकिचाते नहीं हैं।
ग्यारहवाँ सूत्र - उत्कृष्टता के लिए कार्य करें ना कि घड़ी देखकर
अगर काम करते वक्त आपको बार-बार घड़ी देखना पड़ रही है तो इसका सीधा-सीधा अर्थ है, आप अपने कार्य में दिल नहीं लगा पा रहे हैं। अपना सर्वश्रेष्ठ वर्ज़न बनने के लिए आपने कितने घंटे काम किया से ज़्यादा ज़रूरी यह जानना है कि आप कितनी उत्कृष्टता से कार्य कर रहे हैं। यह तभी सम्भव है जब आप आनंदित रहते हुए कार्य करें। घंटे गिनकर कार्य करना लक्ष्य पाने में लगने वाले समय को बढ़ा देता है।
आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अंतिम चार सूत्र सीखेंगे।सफलता का अर्थ कभी भी दूसरों से बेहतर बनना नहीं होता है। अगर आप खुश, मस्त, शांत और संतुष्ट रहते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो दूसरों से आगे निकलने, बेहतर बनने की चूहा दौड़ से बाहर निकल कर खुद का बेहतर वर्ज़न बनने का प्रयास करें। कल हमने खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्रों में से 7 सूत्र सीखे थे। अगले 4 सूत्र सीखने से पहले आईए उन्हें संक्षेप में दोहरा लेते हैं- पहला सूत्र - विज़न बनाएँ जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विज़न अर्थात् आप कैसा जीवन जीना चाहते हैं उसकी रूपरेखा बनाना आपके जीवन को दिशा देता है और यही दिशा आपकी दशा सुधारती है। इसलिए विज़न बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण इस बात का ध्यान रखना है आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो। दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ योजना के बिना विज़न को हक़ीक़त में बदलना असम्भव होगा इसलिए पहले विज़न को छोटे लक्ष्यों में तब्दील करें और उसे हक़ीक़त में बदलने के लिए समयबद्ध योजना बनाएँ। तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें बेहतर बनने के लिए जादुई छड़ी अर्थात् शॉर्टकट ढूँढने में समय बर्बाद करने के स्थान पर विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ। यही छोटे-छोटे कदम आपको सर्वश्रेष्ठ बनाएँगे। चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत सिर्फ़ सपने आपको सफल या बेहतर नहीं बनाते, उसके लिए आपको अपने ईगो को छोड़कर , स्वयं को शून्य मानते हुए विज़न के आधार पर शुरुआत करना होगी और कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाना होंगे। पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ सिर्फ़ आदर्श स्थिति बनाने के उद्देश्य से सब कुछ पहले से अरेंज कर शुरुआत करने की योजना सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही सफल होती है। जो ज्ञान और संसाधन आपके पास आज हैं उसे काम में लेते हुए लक्ष्य की दिशा में पहला कदम उठाना, आपको सफल और बेहतर बनाता है। साथ ही यह आपकी काग़ज़ी योजना को यथार्थ के धरातल पर परखकर बेहतर बनाता है। छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ कहते हैं ना, ‘ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है।’ इसी तरह सफल और अपने से बेहतर लोगों के बीच में रहना आपको भी बेहतर बनाता है। आप क्लब, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भी ऐसे लोगों के सम्पर्क में बने रह सकते हैं। यह लोग आपकी और आपकी योजनाओं की कमियों को पहचान कर बेहतर बनने में भी मदद कर सकते हैं। सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें पहली बार में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर, फ़ुल प्रूफ योजना बनाने के लिए खुद की क्षमताओं और उठाए गए कदमों पर शक करने के स्थान पर अपने ज्ञान के आधार पर लक्ष्य की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाएँ। यह छोटे कदम आपको आगे की राह दिखा, सही योजना बनाना सिखा देंगे और योजना के आधार पर नए हुनर सीखना या संसाधन जुटाना आसान रहेगा। चलिए अब हम अगले 4 सूत्र सीखते हैं- आठवाँ सूत्र - सीखें कई बार खुद को बुद्धिमान या विशेषज्ञ दिखाने के प्रयास में हम उन चीजों को जानने का नाटक करते हैं जिनके बारे में हम बिल्कुल भी जानते नहीं हैं। यदि आप पहले से ही ज्ञानी होने का दिखावा करेंगे तो आप कभी कुछ नहीं सीख पाएँगे। सीखना हमारे ज्ञान को बढ़ाकर हमें बुद्धिमान बनाता है और अगर आप हर पल, हर हाल में, हर किसी से सीख रहे हों तो आपको, जीवन में आगे बढ़ने तथा बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। पूर्व में सीखना इतना आसान नहीं था क्यूँकि तब आप इसके लिए किसी ना किसी संस्था या व्यक्ति के ऊपर निर्भर रहते थे। लेकिन अब इंटरनेट ने सिर्फ़ सीखने ही नहीं बल्कि सम्पर्क या व्यापार करने, लिखने, पढ़ने आदि सभी के तरीके को मौलिक रूप से पूरी तरह बदल दिया है। इस मौक़े को पहचाने और अन्यत्र समय बर्बाद करने के स्थान पर, अपनी सुविधानुसार, जब चाहें इंटरनेट से यह कार्य करें और खुद को हर पल, हर परिस्थिति में बेहतर बनाएँ। नवाँ सूत्र - अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिखें अथवा चित्रित करें जब आप अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिख अथवा चित्रित कर, बार-बार देखते हैं तो आपका अंतर्मन उन विचारों के प्रति प्रोग्राम होता जाता है और भविष्य में आप इनसे संदर्भित विचारों पर बहुत गहराई से सोचने के लिए प्रेरित होते हैं। दसवाँ सूत्र - ईगो को करें बाय-बाय अहंकारी मन सामान्यतः आपको ना तो अपनी गलती और ना ही दूसरों की अच्छी बातों को स्वीकारने देता है। इसलिए खुद को बेहतर बनाने की राह में अपने अभिमान को रास्ते में ना आने दें। इसका एक फ़ायदा यह भी होता है कि आप दूसरों की मदद लेने में भी हिचकिचाते नहीं हैं। ग्यारहवाँ सूत्र - उत्कृष्टता के लिए कार्य करें ना कि घड़ी देखकर अगर काम करते वक्त आपको बार-बार घड़ी देखना पड़ रही है तो इसका सीधा-सीधा अर्थ है, आप अपने कार्य में दिल नहीं लगा पा रहे हैं। अपना सर्वश्रेष्ठ वर्ज़न बनने के लिए आपने कितने घंटे काम किया से ज़्यादा ज़रूरी यह जानना है कि आप कितनी उत्कृष्टता से कार्य कर रहे हैं। यह तभी सम्भव है जब आप आनंदित रहते हुए कार्य करें। घंटे गिनकर कार्य करना लक्ष्य पाने में लगने वाले समय को बढ़ा देता है। आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अंतिम चार सूत्र सीखेंगे।सफलता का अर्थ कभी भी दूसरों से बेहतर बनना नहीं होता है। अगर आप खुश, मस्त, शांत और संतुष्ट रहते हुए जीवन जीना चाहते हैं तो दूसरों से आगे निकलने, बेहतर बनने की चूहा दौड़ से बाहर निकल कर खुद का बेहतर वर्ज़न बनने का प्रयास करें। कल हमने खुद से बेहतर बनने के लिए आवश्यक 15 मूलभूत सूत्रों में से 7 सूत्र सीखे थे। अगले 4 सूत्र सीखने से पहले आईए उन्हें संक्षेप में दोहरा लेते हैं- पहला सूत्र - विज़न बनाएँ जीवन के सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विज़न अर्थात् आप कैसा जीवन जीना चाहते हैं उसकी रूपरेखा बनाना आपके जीवन को दिशा देता है और यही दिशा आपकी दशा सुधारती है। इसलिए विज़न बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण इस बात का ध्यान रखना है आपके सबसे अच्छे संस्करण की योजना आपकी अपनी दृष्टि पर आधारित हो। दूसरा सूत्र - योजना बनाएँ योजना के बिना विज़न को हक़ीक़त में बदलना असम्भव होगा इसलिए पहले विज़न को छोटे लक्ष्यों में तब्दील करें और उसे हक़ीक़त में बदलने के लिए समयबद्ध योजना बनाएँ। तीसरा सूत्र - जादू की छड़ी की तलाश बंद करें बेहतर बनने के लिए जादुई छड़ी अर्थात् शॉर्टकट ढूँढने में समय बर्बाद करने के स्थान पर विज़न के आधार पर बनाए गए छोटे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाएँ। यही छोटे-छोटे कदम आपको सर्वश्रेष्ठ बनाएँगे। चौथा सूत्र - शून्य से करें शुरुआत सिर्फ़ सपने आपको सफल या बेहतर नहीं बनाते, उसके लिए आपको अपने ईगो को छोड़कर , स्वयं को शून्य मानते हुए विज़न के आधार पर शुरुआत करना होगी और कई सारे छोटे-छोटे कदम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाना होंगे। पाँचवाँ सूत्र - पहला कदम उठाएँ सिर्फ़ आदर्श स्थिति बनाने के उद्देश्य से सब कुछ पहले से अरेंज कर शुरुआत करने की योजना सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही सफल होती है। जो ज्ञान और संसाधन आपके पास आज हैं उसे काम में लेते हुए लक्ष्य की दिशा में पहला कदम उठाना, आपको सफल और बेहतर बनाता है। साथ ही यह आपकी काग़ज़ी योजना को यथार्थ के धरातल पर परखकर बेहतर बनाता है। छठा सूत्र - आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों के साथ नेटवर्क बनाएँ कहते हैं ना, ‘ख़रबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है।’ इसी तरह सफल और अपने से बेहतर लोगों के बीच में रहना आपको भी बेहतर बनाता है। आप क्लब, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से भी ऐसे लोगों के सम्पर्क में बने रह सकते हैं। यह लोग आपकी और आपकी योजनाओं की कमियों को पहचान कर बेहतर बनने में भी मदद कर सकते हैं। सातवाँ सूत्र - खुद की क्षमताओं पर शक ना करें पहली बार में पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर, फ़ुल प्रूफ योजना बनाने के लिए खुद की क्षमताओं और उठाए गए कदमों पर शक करने के स्थान पर अपने ज्ञान के आधार पर लक्ष्य की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाएँ। यह छोटे कदम आपको आगे की राह दिखा, सही योजना बनाना सिखा देंगे और योजना के आधार पर नए हुनर सीखना या संसाधन जुटाना आसान रहेगा। चलिए अब हम अगले 4 सूत्र सीखते हैं- आठवाँ सूत्र - सीखें कई बार खुद को बुद्धिमान या विशेषज्ञ दिखाने के प्रयास में हम उन चीजों को जानने का नाटक करते हैं जिनके बारे में हम बिल्कुल भी जानते नहीं हैं। यदि आप पहले से ही ज्ञानी होने का दिखावा करेंगे तो आप कभी कुछ नहीं सीख पाएँगे। सीखना हमारे ज्ञान को बढ़ाकर हमें बुद्धिमान बनाता है और अगर आप हर पल, हर हाल में, हर किसी से सीख रहे हों तो आपको, जीवन में आगे बढ़ने तथा बेहतर बनने से कोई नहीं रोक सकता है। पूर्व में सीखना इतना आसान नहीं था क्यूँकि तब आप इसके लिए किसी ना किसी संस्था या व्यक्ति के ऊपर निर्भर रहते थे। लेकिन अब इंटरनेट ने सिर्फ़ सीखने ही नहीं बल्कि सम्पर्क या व्यापार करने, लिखने, पढ़ने आदि सभी के तरीके को मौलिक रूप से पूरी तरह बदल दिया है। इस मौक़े को पहचाने और अन्यत्र समय बर्बाद करने के स्थान पर, अपनी सुविधानुसार, जब चाहें इंटरनेट से यह कार्य करें और खुद को हर पल, हर परिस्थिति में बेहतर बनाएँ। नवाँ सूत्र - अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिखें अथवा चित्रित करें जब आप अपने लक्ष्य, विचार, योजना आदि को लिख अथवा चित्रित कर, बार-बार देखते हैं तो आपका अंतर्मन उन विचारों के प्रति प्रोग्राम होता जाता है और भविष्य में आप इनसे संदर्भित विचारों पर बहुत गहराई से सोचने के लिए प्रेरित होते हैं। दसवाँ सूत्र - ईगो को करें बाय-बाय अहंकारी मन सामान्यतः आपको ना तो अपनी गलती और ना ही दूसरों की अच्छी बातों को स्वीकारने देता है। इसलिए खुद को बेहतर बनाने की राह में अपने अभिमान को रास्ते में ना आने दें। इसका एक फ़ायदा यह भी होता है कि आप दूसरों की मदद लेने में भी हिचकिचाते नहीं हैं। ग्यारहवाँ सूत्र - उत्कृष्टता के लिए कार्य करें ना कि घड़ी देखकर अगर काम करते वक्त आपको बार-बार घड़ी देखना पड़ रही है तो इसका सीधा-सीधा अर्थ है, आप अपने कार्य में दिल नहीं लगा पा रहे हैं। अपना सर्वश्रेष्ठ वर्ज़न बनने के लिए आपने कितने घंटे काम किया से ज़्यादा ज़रूरी यह जानना है कि आप कितनी उत्कृष्टता से कार्य कर रहे हैं। यह तभी सम्भव है जब आप आनंदित रहते हुए कार्य करें। घंटे गिनकर कार्य करना लक्ष्य पाने में लगने वाले समय को बढ़ा देता है। आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम खुद को बेहतर बनाने के अंतिम चार सूत्र सीखेंगे।0 Comments 0 Shares 1K Views -
दोस्तों, किसी ने सही कहा है, ‘यह दुनिया एक बाज़ार है, जिसमें सब-कुछ बिकता है।’ जी हाँ साथियों, सही सुना आपने, आज कल तो बाज़ार में ‘सम्मान’ भी धड़ल्ले से बिक रहा है और तो और इसे ख़रीदने वाले बड़े शानदार तरीक़े से इस समाज, इस दुनिया में सम्मानित भी किए जा रहे हैं। अपनी बात को मैं आपको हाल ही में घटी ३ घटनाओं से समझाने का प्रयास करता हूँ।
पहली घटना - अपने लेख, ब्लॉग, ट्रेनिंग और एशिया बुक रिकॉर्ड होल्डर रेडियो शो की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पिछले ६ माह में मेरे पास विभिन्न सम्मानों के लिए चयन होने संबंधी कई मेल और फ़ोन आये। जब मैंने उनसे इस संदर्भ में बात करी तो मुझे पता चला कि इन सभी सम्मान की कुछ ना कुछ क़ीमत है। कोई इसे नॉमिनेशन के नाम पर, तो कोई पी.आर. सर्विस, तो कोई सम्मान समारोह के बाद आयोजित किए जाने वाले बड़े डिनर की क़ीमत बता रहा है।
दूसरी घटना - अवार्ड की ही तरह पिछले कुछ माह में मेरे पास मानद डॉक्टोरेट के लिए भी कई मेल और फ़ोन आये। अर्थात् अब आप बाज़ार से मानद डॉक्टोरेट की डिग्री भी ख़रीद सकते हैं और उसके बाद अपने नाम के आगे बड़े ‘सम्मान’ के साथ ‘डॉ’ लिख सकते हैं।
तीसरी घटना - हाल ही में मुझे एक कार्यक्रम में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में एक ऐसे सज्जन उपस्थित थे जिन्हें मैं उनके खट कर्मों की वजह से पिछले कई सालों से जानता था। उनके रूप या यूँ कहूँ जीवन में आये इस सकारात्मक बदलाव को देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन मेरी यह ख़ुशी उस वक़्त काफिर हो गई जब मेरे वक्तव्य के पूर्व उन्होंने बड़े धीमे स्वर में मुझसे कहा, ‘निर्मल, तुम अगर यहाँ मुझे मेरे नाम के स्थान पर भाई जी या भाई साहब कहकर संबोधित करोगे तो मुझे अच्छा लगेगा। कई सालों की मेहनत से यह इज्जत कमाई है।’ उस वक़्त तो मैंने मुस्कुराहट के साथ उन्हें रिलैक्स कर दिया, लेकिन कार्यक्रम के बाद मुझे पता चला कि आजकल वे प्रॉपर्टी बाज़ार से कमाये गये पैसों से बाज़ार में इस तरह का सम्मान ख़रीदते हैं।
आगे बढ़ने से पहले साथियों मैं आपको बता दूँ कि सम्मान की भूख होना सामान्य मानवीय स्वभाव या आवश्यकताओं का हिस्सा है। अगर आप इसे अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो की वर्ष १९४३ में साइकोलॉजिकल रिव्यू पत्रिका में प्रकाशित हुए पेपर ‘ए थ्योरी ऑफ ह्यूमन मोटिवेशन’ के एक हिस्से जिसे हम ‘थ्योरी ऑफ़ हेरारकी ऑफ़ नीड्स’ याने ‘मास्लो का आवश्यकताओं के पदानुक्रम का सिद्धांत’ भी कहते हैं, के आधार पर देखेंगे तो पायेंगे कि सामान्य इंसान की जरूरतें और प्रेरणा आवश्यकताओं की पांच बुनियादी श्रेणियों से प्रेरित होते हैं; १) शारीरिक २) सुरक्षा ३) प्रेम ४) सम्मान और ५) आत्म-बोध। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य उपरोक्त क्रम में संतुष्टि प्राप्त करते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ता है। अर्थात् उपरोक्त पदानुक्रम से हम यह समझ सकते हैं कि मानव व्यवहार के संदर्भ में प्रयास और प्रेरणा कैसे कार्य करते हैं।
इस आधार पर देखा जाये तो सम्मान की चाह स्वाभाविक है, लेकिन सम्मान को कभी छीन या ख़रीदकर नहीं पाया जा सकता है, उसे तो आपको कमाना ही पड़ता है। अर्थात् सम्मान तो आप अपने अच्छे स्वभाव, अच्छे व्यवहार और अच्छे कर्मों द्वारा ही कमा सकते हैं। अगर मेरी बात से सहमत ना हों तो किसी भी श्रेष्ठ और सम्मानित व्यक्ति को याद कर देख लीजिए। इस आधार पर कहा जाये तो ख़रीद कर सम्मानित होना और सही मायने में सम्मान अर्जित करने में बहुत अंतर है। अर्थात् आप सम्मान पाने योग्य कार्य करके ही इसके वास्तविक अधिकारी बन सकते हैं। इसलिए दोस्तों, जीवन में सदैव श्रेष्ठ पथ पर गतिमान रहें, स्वभाव में सौम्यता लायें और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें। फिर देखियेगा आपको कभी सम्मान ना तो माँगना पड़ेगा और ना ही ख़रीदना पड़ेगा, वह तो आपको अपने आप ही मिलने लगेगा।दोस्तों, किसी ने सही कहा है, ‘यह दुनिया एक बाज़ार है, जिसमें सब-कुछ बिकता है।’ जी हाँ साथियों, सही सुना आपने, आज कल तो बाज़ार में ‘सम्मान’ भी धड़ल्ले से बिक रहा है और तो और इसे ख़रीदने वाले बड़े शानदार तरीक़े से इस समाज, इस दुनिया में सम्मानित भी किए जा रहे हैं। अपनी बात को मैं आपको हाल ही में घटी ३ घटनाओं से समझाने का प्रयास करता हूँ। पहली घटना - अपने लेख, ब्लॉग, ट्रेनिंग और एशिया बुक रिकॉर्ड होल्डर रेडियो शो की बढ़ती लोकप्रियता के कारण पिछले ६ माह में मेरे पास विभिन्न सम्मानों के लिए चयन होने संबंधी कई मेल और फ़ोन आये। जब मैंने उनसे इस संदर्भ में बात करी तो मुझे पता चला कि इन सभी सम्मान की कुछ ना कुछ क़ीमत है। कोई इसे नॉमिनेशन के नाम पर, तो कोई पी.आर. सर्विस, तो कोई सम्मान समारोह के बाद आयोजित किए जाने वाले बड़े डिनर की क़ीमत बता रहा है। दूसरी घटना - अवार्ड की ही तरह पिछले कुछ माह में मेरे पास मानद डॉक्टोरेट के लिए भी कई मेल और फ़ोन आये। अर्थात् अब आप बाज़ार से मानद डॉक्टोरेट की डिग्री भी ख़रीद सकते हैं और उसके बाद अपने नाम के आगे बड़े ‘सम्मान’ के साथ ‘डॉ’ लिख सकते हैं। तीसरी घटना - हाल ही में मुझे एक कार्यक्रम में वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में एक ऐसे सज्जन उपस्थित थे जिन्हें मैं उनके खट कर्मों की वजह से पिछले कई सालों से जानता था। उनके रूप या यूँ कहूँ जीवन में आये इस सकारात्मक बदलाव को देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। लेकिन मेरी यह ख़ुशी उस वक़्त काफिर हो गई जब मेरे वक्तव्य के पूर्व उन्होंने बड़े धीमे स्वर में मुझसे कहा, ‘निर्मल, तुम अगर यहाँ मुझे मेरे नाम के स्थान पर भाई जी या भाई साहब कहकर संबोधित करोगे तो मुझे अच्छा लगेगा। कई सालों की मेहनत से यह इज्जत कमाई है।’ उस वक़्त तो मैंने मुस्कुराहट के साथ उन्हें रिलैक्स कर दिया, लेकिन कार्यक्रम के बाद मुझे पता चला कि आजकल वे प्रॉपर्टी बाज़ार से कमाये गये पैसों से बाज़ार में इस तरह का सम्मान ख़रीदते हैं। आगे बढ़ने से पहले साथियों मैं आपको बता दूँ कि सम्मान की भूख होना सामान्य मानवीय स्वभाव या आवश्यकताओं का हिस्सा है। अगर आप इसे अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो की वर्ष १९४३ में साइकोलॉजिकल रिव्यू पत्रिका में प्रकाशित हुए पेपर ‘ए थ्योरी ऑफ ह्यूमन मोटिवेशन’ के एक हिस्से जिसे हम ‘थ्योरी ऑफ़ हेरारकी ऑफ़ नीड्स’ याने ‘मास्लो का आवश्यकताओं के पदानुक्रम का सिद्धांत’ भी कहते हैं, के आधार पर देखेंगे तो पायेंगे कि सामान्य इंसान की जरूरतें और प्रेरणा आवश्यकताओं की पांच बुनियादी श्रेणियों से प्रेरित होते हैं; १) शारीरिक २) सुरक्षा ३) प्रेम ४) सम्मान और ५) आत्म-बोध। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य उपरोक्त क्रम में संतुष्टि प्राप्त करते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ता है। अर्थात् उपरोक्त पदानुक्रम से हम यह समझ सकते हैं कि मानव व्यवहार के संदर्भ में प्रयास और प्रेरणा कैसे कार्य करते हैं। इस आधार पर देखा जाये तो सम्मान की चाह स्वाभाविक है, लेकिन सम्मान को कभी छीन या ख़रीदकर नहीं पाया जा सकता है, उसे तो आपको कमाना ही पड़ता है। अर्थात् सम्मान तो आप अपने अच्छे स्वभाव, अच्छे व्यवहार और अच्छे कर्मों द्वारा ही कमा सकते हैं। अगर मेरी बात से सहमत ना हों तो किसी भी श्रेष्ठ और सम्मानित व्यक्ति को याद कर देख लीजिए। इस आधार पर कहा जाये तो ख़रीद कर सम्मानित होना और सही मायने में सम्मान अर्जित करने में बहुत अंतर है। अर्थात् आप सम्मान पाने योग्य कार्य करके ही इसके वास्तविक अधिकारी बन सकते हैं। इसलिए दोस्तों, जीवन में सदैव श्रेष्ठ पथ पर गतिमान रहें, स्वभाव में सौम्यता लायें और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें। फिर देखियेगा आपको कभी सम्मान ना तो माँगना पड़ेगा और ना ही ख़रीदना पड़ेगा, वह तो आपको अपने आप ही मिलने लगेगा।0 Comments 0 Shares 1K Views1
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दोस्तों, इस दुनिया में जितना ज़रूरी मित्रों का होना है उतना ही ज़रूरी आलोचकों का होना भी है क्योंकि सही मायने में वे ही आपको जीवन में आगे बढ़ाते हैं। इस बात का एहसास मुझे हाल ही की अपनी व्यवसायिक यात्रा के दौरान हुआ। हालाँकि सामने वाले सज्जन के नाम की गरिमा बचाये रखने के लिए यहाँ मैं आपसे उनका नाम साझा नहीं कर रहा हूँ लेकिन एक कहानी के माध्यम से अपनी बात समझाने का प्रयास करता हूँ।
एक बार राजू कार्यालय जाते समय रास्ते में पड़ने वाले भगवान के मंदिर में रुककर बड़ी अजीब सी प्रार्थना करते हुए बोलता है, ‘प्रभु, आज कृपा करके मुझे मेरे सभी दुश्मनों और आलोचकों से मिलवा दो, आपकी बड़ी कृपा रहेगी।’ राजू का एक साथी उसकी प्रार्थना सुन चौंक जाता है और राजू को टोकते हुए कहता है, ‘मित्र, यह क्या अजीब सी प्रार्थना कर रहे हो? जहाँ तक मुझे याद है आज शाम को क्लाइंट के साथ होने वाली मीटिंग तुम्हारा भविष्य तय करेगी। ऐसे में दुश्मनों और आलोचकों से मिलने की प्रार्थना करना कुछ समझ नहीं आया।’ मित्र की बात सुन राजू सिर्फ़ मुस्कुराया और बोला, ‘तुम अभी समझ नहीं पाओगे। इस विषय में हम शाम को बात करेंगे।’
उस दिन शायद भगवान ने राजू की प्रार्थना उसी पल क़बूल कर ली। मंदिर से निकलकर ऑफिस जाते समय राजू गलती से सड़क किनारे सामान रख बैठे एक व्यक्ति से टकरा गया। वह व्यक्ति एकदम से भड़कते हुए राजू से बोला, ‘अरे आँख वाले अंधे ज़रा नीचे भी देख कर चल ले। हमेशा हवा में मत उड़ा कर!’ राजू ने तुरंत उससे माफ़ी माँगी और आगे बढ़ गया। अभी वह कार्यालय पहुँचा ही था कि नीचे ही उसकी मुलाक़ात अपने प्रतिद्वंदी साथी कर्मचारी से हो गई। वह उसे ताने मारते हुए बोला, ‘आ गये बड़े साहब। पता नहीं क्या देख कर बॉस ने इसे प्रमोट कर दिया। ना तो इनके जुते कभी साफ़ रहते हैं और ना ही टाई ढंग से बंधी रहती है।’ राजू बात सुन मुस्कुराया और आगे बढ़ गया।
कार्यालय में अपने डिपार्टमेंट में जाते समय राजू ने देखा कि एक अन्य कर्मचारी के पास से गुजरते समय उसने मुँह बनाकर अपनी नाक बंद कर ली और बुदबुदाते हुए धीमे से बोला, ‘पता नहीं क्यों लोग इस गर्मी के मौसम में बिना डियो लगाये आ जाते हैं, देखो इसके शरीर से कितनी बदबू आ रही है।’ राजू उसकी बात पर बिना प्रतिक्रिया दिये आगे बढ़ जाता है। तभी उसका एक साथी उसे छेड़ते हुए कहता है, ‘पहले ही समझाया था तुझे, अपना विभाग मत बदल। अब फँस गया ना सेल्स मीटिंग के चक्कर में। फैक्ट्स तो तुझे याद नहीं रहते कैसे क्लाइंट को प्रेज़ेंटेशन देगा?’ राजू ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और अपने केबिन में पहुँच गया।
इसके पश्चात राजू ने सबसे पहले आज घर से कार्यालय तक आते समय मिले सभी आलोचकों और विरोधियों की बातों को याद करा और उसके अनुसार ख़ुद में सुधार करने लगा। सबसे पहले उसने अपने जूते साफ़ किए, फिर अपनी टाई ठीक करी और उसके बाद डियो लगाया और फैक्ट्स याद करने में जुट गया। तय समय पर प्रेज़ेंटेशन रूम में पहुँचते ही उसे सबसे पहले मिले व्यक्ति की याद आती है और वो क्लाइंट व क्लाइंट के साथ आये उसके अधीनस्थ का भी अभिवादन करते हुए फैक्ट्स के साथ एक ज़बरदस्त प्रेज़ेंटेशन देता है और एक ही बार में अपनी डील फाइनल कर लेता है। उस दिन कार्यालय से लौटते समय वह अपने मित्र से कहता है देखा तुमने मेरी प्रार्थना का कमाल? प्रभु ने सुबह-सुबह ही सभी दुश्मनों और आलोचकों से मिलवा कर मुझे बेहतर बनने में मदद करी जिसके कारण मैं आज डील पक्की कर पाया।
आशा करता हूँ साथियों, आप इस क़िस्से में छुपे मूल मैसेज को समझ गये होंगे कि क्यों मैंने पूर्व में कहा था कि ‘इस दुनिया में सफल होने के लिए जितना ज़रूरी मित्रों का होना है, उतना ही ज़रूरी आलोचकों का होना है।’ सामान्य तौर पर हमारे सभी मित्र हमें पसंद करते हैं इसीलिए वे हमारी तारीफ़ करते हैं, जो निश्चित तौर पर हमें पसंद आती है। लेकिन दोस्तों तारीफ़ सुनना हमें बेहतर बनने का मौक़ा नहीं देता। इसके विपरीत हमारे विरोधी, दुश्मन या आलोचक हमारी निंदा करते हैं, हमारा ध्यान हमारी कमियों की ओर ले जाते हैं। वे कई बार हमारी टांग खींच हतोत्साहित करते हैं। लेकिन अगर हम सचेत रहते हुए उनकी निंदा सुनते हैं तो वह हमें निखारने का मौक़ा देती है।
इसलिए साथियों, आज नहीं अभी से ही ऐसे लोगों से परेशान होने के स्थान पर फ़ायदा उठाना शुरू कीजिए, जैसा मैंने हाल ही की अपनी व्यवसायिक यात्रा के दौरान किया था। याद रखियेगा, कई बार हमारे विरोधी हमें ऐसी सीख दे जाते हैं, जो हमारे अपने हमें नहीं दे पाते हैं और हम उनकी सिखों की वजह से जीवन में बड़ी सफलता पा पाते हैं। इसीलिए कहा गया है, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।’दोस्तों, इस दुनिया में जितना ज़रूरी मित्रों का होना है उतना ही ज़रूरी आलोचकों का होना भी है क्योंकि सही मायने में वे ही आपको जीवन में आगे बढ़ाते हैं। इस बात का एहसास मुझे हाल ही की अपनी व्यवसायिक यात्रा के दौरान हुआ। हालाँकि सामने वाले सज्जन के नाम की गरिमा बचाये रखने के लिए यहाँ मैं आपसे उनका नाम साझा नहीं कर रहा हूँ लेकिन एक कहानी के माध्यम से अपनी बात समझाने का प्रयास करता हूँ। एक बार राजू कार्यालय जाते समय रास्ते में पड़ने वाले भगवान के मंदिर में रुककर बड़ी अजीब सी प्रार्थना करते हुए बोलता है, ‘प्रभु, आज कृपा करके मुझे मेरे सभी दुश्मनों और आलोचकों से मिलवा दो, आपकी बड़ी कृपा रहेगी।’ राजू का एक साथी उसकी प्रार्थना सुन चौंक जाता है और राजू को टोकते हुए कहता है, ‘मित्र, यह क्या अजीब सी प्रार्थना कर रहे हो? जहाँ तक मुझे याद है आज शाम को क्लाइंट के साथ होने वाली मीटिंग तुम्हारा भविष्य तय करेगी। ऐसे में दुश्मनों और आलोचकों से मिलने की प्रार्थना करना कुछ समझ नहीं आया।’ मित्र की बात सुन राजू सिर्फ़ मुस्कुराया और बोला, ‘तुम अभी समझ नहीं पाओगे। इस विषय में हम शाम को बात करेंगे।’ उस दिन शायद भगवान ने राजू की प्रार्थना उसी पल क़बूल कर ली। मंदिर से निकलकर ऑफिस जाते समय राजू गलती से सड़क किनारे सामान रख बैठे एक व्यक्ति से टकरा गया। वह व्यक्ति एकदम से भड़कते हुए राजू से बोला, ‘अरे आँख वाले अंधे ज़रा नीचे भी देख कर चल ले। हमेशा हवा में मत उड़ा कर!’ राजू ने तुरंत उससे माफ़ी माँगी और आगे बढ़ गया। अभी वह कार्यालय पहुँचा ही था कि नीचे ही उसकी मुलाक़ात अपने प्रतिद्वंदी साथी कर्मचारी से हो गई। वह उसे ताने मारते हुए बोला, ‘आ गये बड़े साहब। पता नहीं क्या देख कर बॉस ने इसे प्रमोट कर दिया। ना तो इनके जुते कभी साफ़ रहते हैं और ना ही टाई ढंग से बंधी रहती है।’ राजू बात सुन मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। कार्यालय में अपने डिपार्टमेंट में जाते समय राजू ने देखा कि एक अन्य कर्मचारी के पास से गुजरते समय उसने मुँह बनाकर अपनी नाक बंद कर ली और बुदबुदाते हुए धीमे से बोला, ‘पता नहीं क्यों लोग इस गर्मी के मौसम में बिना डियो लगाये आ जाते हैं, देखो इसके शरीर से कितनी बदबू आ रही है।’ राजू उसकी बात पर बिना प्रतिक्रिया दिये आगे बढ़ जाता है। तभी उसका एक साथी उसे छेड़ते हुए कहता है, ‘पहले ही समझाया था तुझे, अपना विभाग मत बदल। अब फँस गया ना सेल्स मीटिंग के चक्कर में। फैक्ट्स तो तुझे याद नहीं रहते कैसे क्लाइंट को प्रेज़ेंटेशन देगा?’ राजू ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और अपने केबिन में पहुँच गया। इसके पश्चात राजू ने सबसे पहले आज घर से कार्यालय तक आते समय मिले सभी आलोचकों और विरोधियों की बातों को याद करा और उसके अनुसार ख़ुद में सुधार करने लगा। सबसे पहले उसने अपने जूते साफ़ किए, फिर अपनी टाई ठीक करी और उसके बाद डियो लगाया और फैक्ट्स याद करने में जुट गया। तय समय पर प्रेज़ेंटेशन रूम में पहुँचते ही उसे सबसे पहले मिले व्यक्ति की याद आती है और वो क्लाइंट व क्लाइंट के साथ आये उसके अधीनस्थ का भी अभिवादन करते हुए फैक्ट्स के साथ एक ज़बरदस्त प्रेज़ेंटेशन देता है और एक ही बार में अपनी डील फाइनल कर लेता है। उस दिन कार्यालय से लौटते समय वह अपने मित्र से कहता है देखा तुमने मेरी प्रार्थना का कमाल? प्रभु ने सुबह-सुबह ही सभी दुश्मनों और आलोचकों से मिलवा कर मुझे बेहतर बनने में मदद करी जिसके कारण मैं आज डील पक्की कर पाया। आशा करता हूँ साथियों, आप इस क़िस्से में छुपे मूल मैसेज को समझ गये होंगे कि क्यों मैंने पूर्व में कहा था कि ‘इस दुनिया में सफल होने के लिए जितना ज़रूरी मित्रों का होना है, उतना ही ज़रूरी आलोचकों का होना है।’ सामान्य तौर पर हमारे सभी मित्र हमें पसंद करते हैं इसीलिए वे हमारी तारीफ़ करते हैं, जो निश्चित तौर पर हमें पसंद आती है। लेकिन दोस्तों तारीफ़ सुनना हमें बेहतर बनने का मौक़ा नहीं देता। इसके विपरीत हमारे विरोधी, दुश्मन या आलोचक हमारी निंदा करते हैं, हमारा ध्यान हमारी कमियों की ओर ले जाते हैं। वे कई बार हमारी टांग खींच हतोत्साहित करते हैं। लेकिन अगर हम सचेत रहते हुए उनकी निंदा सुनते हैं तो वह हमें निखारने का मौक़ा देती है। इसलिए साथियों, आज नहीं अभी से ही ऐसे लोगों से परेशान होने के स्थान पर फ़ायदा उठाना शुरू कीजिए, जैसा मैंने हाल ही की अपनी व्यवसायिक यात्रा के दौरान किया था। याद रखियेगा, कई बार हमारे विरोधी हमें ऐसी सीख दे जाते हैं, जो हमारे अपने हमें नहीं दे पाते हैं और हम उनकी सिखों की वजह से जीवन में बड़ी सफलता पा पाते हैं। इसीलिए कहा गया है, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।’0 Comments 0 Shares 1K Views1
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