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  • खूब पढ़ो...
    इसलिए नहीं कि लोग तुम्हें ज्ञानी कहें
    पढ़ो ताकि तुम्हारे अंदर का शोर थमे
    सोच दूसरों से उधार ना लेनी पड़े
    यहां हर कोई बोलने को तैयार है
    तुम्हें हर बात का उत्तर देना ज़रूरी नहीं
    ज्ञान का असली अर्थ बहस जीतना नहीं
    बल्कि इतना स्पष्ट हो जाना कि बहस की ज़रूरत ही ना पड़े
    दुनिया को प्रभावित करने के लिए मत पढ़ो
    अपने भीतर ऐसी समझ जगाने के लिए पढ़ो
    जिसके बाद दुनिया कुछ भी कहे
    तुम भीतर से विचलित ना हो ll
    "मोरनी"
    खूब पढ़ो... इसलिए नहीं कि लोग तुम्हें ज्ञानी कहें पढ़ो ताकि तुम्हारे अंदर का शोर थमे सोच दूसरों से उधार ना लेनी पड़े यहां हर कोई बोलने को तैयार है तुम्हें हर बात का उत्तर देना ज़रूरी नहीं ज्ञान का असली अर्थ बहस जीतना नहीं बल्कि इतना स्पष्ट हो जाना कि बहस की ज़रूरत ही ना पड़े दुनिया को प्रभावित करने के लिए मत पढ़ो अपने भीतर ऐसी समझ जगाने के लिए पढ़ो जिसके बाद दुनिया कुछ भी कहे तुम भीतर से विचलित ना हो ll "मोरनी"
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  • ख़ुद से स्वीकारना पसन्द है मुझे
    गलतियाँ सुधरना पसन्द है मुझे
    लङकर जीतने से अच्छा
    बिना लड़े हारना पसन्द है मुझे
    बहुत जिम्मेदार हो गयी हूँ
    संस्कारों को सम्भालना पसन्द है मुझे
    बुलंदियों की नहीं शौकीन मैं
    आसमान निहारना पसन्द है मुझे
    लोग रखते हैं शौक अकड़ कर चलने का
    सिर झुका कर चलना पसन्द है मुझे ll
    "मोरनी"
    ख़ुद से स्वीकारना पसन्द है मुझे गलतियाँ सुधरना पसन्द है मुझे लङकर जीतने से अच्छा बिना लड़े हारना पसन्द है मुझे बहुत जिम्मेदार हो गयी हूँ संस्कारों को सम्भालना पसन्द है मुझे बुलंदियों की नहीं शौकीन मैं आसमान निहारना पसन्द है मुझे लोग रखते हैं शौक अकड़ कर चलने का सिर झुका कर चलना पसन्द है मुझे ll "मोरनी"
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  • मैं पूछती माँ से
    ये पुराने से कपड़े
    क्यों पहने रहती हो
    नए वालों को
    अलमारी में संभाल क्यों रखती हो
    वो कहती
    नए कपड़े चुभते हैं मुझे
    मैं हंस दिया करती
    तुम भी ना माँ
    कैसे कैसे बहाने बनाने लगी हो
    मगर देखो ना अब मैं भी
    नए कपड़े पहनने से
    कतराने लगी हूँ
    अब माँ की वो चुभन
    समझने लगी हूँ
    क्योंकि मैं भी माँ वाला सुकून
    कपड़ों में पाने लगी हूँ
    अब लग रहा है
    धीरे धीरे मैं भी
    माँ सी होने लगी हूँ l
    "मोरनी"
    मैं पूछती माँ से ये पुराने से कपड़े क्यों पहने रहती हो नए वालों को अलमारी में संभाल क्यों रखती हो वो कहती नए कपड़े चुभते हैं मुझे मैं हंस दिया करती तुम भी ना माँ कैसे कैसे बहाने बनाने लगी हो मगर देखो ना अब मैं भी नए कपड़े पहनने से कतराने लगी हूँ अब माँ की वो चुभन समझने लगी हूँ क्योंकि मैं भी माँ वाला सुकून कपड़ों में पाने लगी हूँ अब लग रहा है धीरे धीरे मैं भी माँ सी होने लगी हूँ l "मोरनी"
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  • 🙏🏻🙏🏻
    अगर मैं कभी अपना श्रेष्ठ लिख पाई तो
    मैं पुरुष को लिखना चाहूँगी...
    लिखूँगी उसका त्याग
    उसकी वो ख़ामोशी से दी गई कुर्बानी
    लिखूँगी उसका आत्म सम्मान
    जो रोज़ बचाकर रखता है
    लिखूँगी ज़िम्मेदारी तले दबे इंसान को
    जो कोई ख्वाहिश नहीं रखता
    लिखूँगी उसके कन्धों पर रखे बोझ को
    जो बिना किसी शर्त के ढोता है
    लिखूँगी उसकी मेहनत उसकी थकान को
    उसकी अधूरी नींद को
    अगर लिख पाई तो लिखूँगी
    कि इतनी कुर्बानियों के बाद भी वो मुस्कुरा रहा है
    अगर लिख पाऊँ तो
    पुरुष को लिखना चाहूँगी ll
    "मोरनी"
    🙏🏻🙏🏻 अगर मैं कभी अपना श्रेष्ठ लिख पाई तो मैं पुरुष को लिखना चाहूँगी... लिखूँगी उसका त्याग उसकी वो ख़ामोशी से दी गई कुर्बानी लिखूँगी उसका आत्म सम्मान जो रोज़ बचाकर रखता है लिखूँगी ज़िम्मेदारी तले दबे इंसान को जो कोई ख्वाहिश नहीं रखता लिखूँगी उसके कन्धों पर रखे बोझ को जो बिना किसी शर्त के ढोता है लिखूँगी उसकी मेहनत उसकी थकान को उसकी अधूरी नींद को अगर लिख पाई तो लिखूँगी कि इतनी कुर्बानियों के बाद भी वो मुस्कुरा रहा है अगर लिख पाऊँ तो पुरुष को लिखना चाहूँगी ll "मोरनी"
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  • किसने कहा आसान है ज़िंदगी
    मौत का बस सामान है ज़िंदगी
    सबक मिले ही नहीं किताबों में
    उन्हीं का ही इम्तिहान है ज़िंदगी
    मुक्कदर ने लिखी दर्द की दास्तानें
    उन सभी की पहचान है ज़िंदगी
    मैं सहरा-सहरा भटकती मुसाफ़िर
    पाँवों का मामूली निशान है ज़िंदगी
    तुझसे क्या गिला और कैसा शिकवा
    तू चार दिनों की मेहमान है ज़िंदगी ll
    "मोरनी"
    किसने कहा आसान है ज़िंदगी मौत का बस सामान है ज़िंदगी सबक मिले ही नहीं किताबों में उन्हीं का ही इम्तिहान है ज़िंदगी मुक्कदर ने लिखी दर्द की दास्तानें उन सभी की पहचान है ज़िंदगी मैं सहरा-सहरा भटकती मुसाफ़िर पाँवों का मामूली निशान है ज़िंदगी तुझसे क्या गिला और कैसा शिकवा तू चार दिनों की मेहमान है ज़िंदगी ll "मोरनी"
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  • ज़िन्दगी के पिंजरे में कैद,
    कुछ कहानियाँ मेरी भी हैं…

    तेरे परों में सुस्ताती थकी सी,
    ठिठकी उड़ान चिरैया तेरी भी है…

    सलाखों से उन्मुक्त हो जीवन,
    अभिलाषा तेरी भी है, मेरी भी है…

    बदलते हैं मौसम, बदलेगी तक़दीर,
    उम्मीद का दाना चुगते हैं हम दोनों…

    खामोशियों की नदी बहती है अभी,
    दर्द की लहर तेज़ है, गहरी भी है…

    पर देख—क्षितिज कहीं तो मुस्काता है,
    सुबह उजली और शाम सुनहरी भी है…
    "मोरनी"
    ज़िन्दगी के पिंजरे में कैद, कुछ कहानियाँ मेरी भी हैं… तेरे परों में सुस्ताती थकी सी, ठिठकी उड़ान चिरैया तेरी भी है… सलाखों से उन्मुक्त हो जीवन, अभिलाषा तेरी भी है, मेरी भी है… बदलते हैं मौसम, बदलेगी तक़दीर, उम्मीद का दाना चुगते हैं हम दोनों… खामोशियों की नदी बहती है अभी, दर्द की लहर तेज़ है, गहरी भी है… पर देख—क्षितिज कहीं तो मुस्काता है, सुबह उजली और शाम सुनहरी भी है… "मोरनी"
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