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  • 🙏🏻🙏🏻
    अगर मैं कभी अपना श्रेष्ठ लिख पाई तो
    मैं पुरुष को लिखना चाहूँगी...
    लिखूँगी उसका त्याग
    उसकी वो ख़ामोशी से दी गई कुर्बानी
    लिखूँगी उसका आत्म सम्मान
    जो रोज़ बचाकर रखता है
    लिखूँगी ज़िम्मेदारी तले दबे इंसान को
    जो कोई ख्वाहिश नहीं रखता
    लिखूँगी उसके कन्धों पर रखे बोझ को
    जो बिना किसी शर्त के ढोता है
    लिखूँगी उसकी मेहनत उसकी थकान को
    उसकी अधूरी नींद को
    अगर लिख पाई तो लिखूँगी
    कि इतनी कुर्बानियों के बाद भी वो मुस्कुरा रहा है
    अगर लिख पाऊँ तो
    पुरुष को लिखना चाहूँगी ll
    "मोरनी"
    🙏🏻🙏🏻 अगर मैं कभी अपना श्रेष्ठ लिख पाई तो मैं पुरुष को लिखना चाहूँगी... लिखूँगी उसका त्याग उसकी वो ख़ामोशी से दी गई कुर्बानी लिखूँगी उसका आत्म सम्मान जो रोज़ बचाकर रखता है लिखूँगी ज़िम्मेदारी तले दबे इंसान को जो कोई ख्वाहिश नहीं रखता लिखूँगी उसके कन्धों पर रखे बोझ को जो बिना किसी शर्त के ढोता है लिखूँगी उसकी मेहनत उसकी थकान को उसकी अधूरी नींद को अगर लिख पाई तो लिखूँगी कि इतनी कुर्बानियों के बाद भी वो मुस्कुरा रहा है अगर लिख पाऊँ तो पुरुष को लिखना चाहूँगी ll "मोरनी"
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  • किसने कहा आसान है ज़िंदगी
    मौत का बस सामान है ज़िंदगी
    सबक मिले ही नहीं किताबों में
    उन्हीं का ही इम्तिहान है ज़िंदगी
    मुक्कदर ने लिखी दर्द की दास्तानें
    उन सभी की पहचान है ज़िंदगी
    मैं सहरा-सहरा भटकती मुसाफ़िर
    पाँवों का मामूली निशान है ज़िंदगी
    तुझसे क्या गिला और कैसा शिकवा
    तू चार दिनों की मेहमान है ज़िंदगी ll
    "मोरनी"
    किसने कहा आसान है ज़िंदगी मौत का बस सामान है ज़िंदगी सबक मिले ही नहीं किताबों में उन्हीं का ही इम्तिहान है ज़िंदगी मुक्कदर ने लिखी दर्द की दास्तानें उन सभी की पहचान है ज़िंदगी मैं सहरा-सहरा भटकती मुसाफ़िर पाँवों का मामूली निशान है ज़िंदगी तुझसे क्या गिला और कैसा शिकवा तू चार दिनों की मेहमान है ज़िंदगी ll "मोरनी"
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  • ज़िन्दगी के पिंजरे में कैद,
    कुछ कहानियाँ मेरी भी हैं…

    तेरे परों में सुस्ताती थकी सी,
    ठिठकी उड़ान चिरैया तेरी भी है…

    सलाखों से उन्मुक्त हो जीवन,
    अभिलाषा तेरी भी है, मेरी भी है…

    बदलते हैं मौसम, बदलेगी तक़दीर,
    उम्मीद का दाना चुगते हैं हम दोनों…

    खामोशियों की नदी बहती है अभी,
    दर्द की लहर तेज़ है, गहरी भी है…

    पर देख—क्षितिज कहीं तो मुस्काता है,
    सुबह उजली और शाम सुनहरी भी है…
    "मोरनी"
    ज़िन्दगी के पिंजरे में कैद, कुछ कहानियाँ मेरी भी हैं… तेरे परों में सुस्ताती थकी सी, ठिठकी उड़ान चिरैया तेरी भी है… सलाखों से उन्मुक्त हो जीवन, अभिलाषा तेरी भी है, मेरी भी है… बदलते हैं मौसम, बदलेगी तक़दीर, उम्मीद का दाना चुगते हैं हम दोनों… खामोशियों की नदी बहती है अभी, दर्द की लहर तेज़ है, गहरी भी है… पर देख—क्षितिज कहीं तो मुस्काता है, सुबह उजली और शाम सुनहरी भी है… "मोरनी"
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  • उसके चेहरे पर पहुंच कर ठहरे हैं ll
    मेरे नैनों के उसके नैनों पर पहरे हैं ll

    कुछ सुनने को तैयार ही नहीं,
    मेरे दोनों नैना एकदम बहरे हैं ll

    देखने भर से नशा छा गया,
    उसके नैना इतने मदभरे हैं ll

    मेरे नैना सब-कुछ गवाही दे रहे हैं,
    उसके नैना हैं कि कोई कटघरे हैं ll

    इनकी गहराइयों में डूबता जा रहा हूँ,
    उसके नैनों के दरिया बहुत गहरे हैं ll
    "मोरनी"
    उसके चेहरे पर पहुंच कर ठहरे हैं ll मेरे नैनों के उसके नैनों पर पहरे हैं ll कुछ सुनने को तैयार ही नहीं, मेरे दोनों नैना एकदम बहरे हैं ll देखने भर से नशा छा गया, उसके नैना इतने मदभरे हैं ll मेरे नैना सब-कुछ गवाही दे रहे हैं, उसके नैना हैं कि कोई कटघरे हैं ll इनकी गहराइयों में डूबता जा रहा हूँ, उसके नैनों के दरिया बहुत गहरे हैं ll "मोरनी"
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