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कान्हा...
क्यों चुंधिया जाती है मेरी नज़र
सूरज तो नहीं हो तुम!

क्यों शीतल हो जाता है मेरा मन
चाँद तो नहीं हो तुम!

क्यों चली आती है हंसी की लहर
सागर तो नहीं हो तुम!

क्यों असीम आनंद भर जाता है हृदय में
आकाश तो नहीं हो तुम!

क्यों इंतज़ार रहता है मुझे हर पल तुम्हारा
मेरे तो नहीं हो तुम!!
"मोरनी"
कान्हा... क्यों चुंधिया जाती है मेरी नज़र सूरज तो नहीं हो तुम! क्यों शीतल हो जाता है मेरा मन चाँद तो नहीं हो तुम! क्यों चली आती है हंसी की लहर सागर तो नहीं हो तुम! क्यों असीम आनंद भर जाता है हृदय में आकाश तो नहीं हो तुम! क्यों इंतज़ार रहता है मुझे हर पल तुम्हारा मेरे तो नहीं हो तुम!! "मोरनी"
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