इतनी गहराई से लिखूँगी लफ्जों में तुमको
के पढ़ने वालों को तलब हो जाएगी तुम्हें देखने की
तुम्हें बनाकर रखूंगी वो आख़री पन्ना
के जिसे ना पलटने की जरूरत ना फाडने की
नजाकत और सलीका भी बरक़रार रखूंगी
के बचाकर रखूं तुम्हें नजरों से ज़माने की
ना होगी कोई फ़िक्र मुझे किसी अंजाम की
के तुम मंज़िल हो इस अफ़साने की l
"मोरनी"
के पढ़ने वालों को तलब हो जाएगी तुम्हें देखने की
तुम्हें बनाकर रखूंगी वो आख़री पन्ना
के जिसे ना पलटने की जरूरत ना फाडने की
नजाकत और सलीका भी बरक़रार रखूंगी
के बचाकर रखूं तुम्हें नजरों से ज़माने की
ना होगी कोई फ़िक्र मुझे किसी अंजाम की
के तुम मंज़िल हो इस अफ़साने की l
"मोरनी"
इतनी गहराई से लिखूँगी लफ्जों में तुमको
के पढ़ने वालों को तलब हो जाएगी तुम्हें देखने की
तुम्हें बनाकर रखूंगी वो आख़री पन्ना
के जिसे ना पलटने की जरूरत ना फाडने की
नजाकत और सलीका भी बरक़रार रखूंगी
के बचाकर रखूं तुम्हें नजरों से ज़माने की
ना होगी कोई फ़िक्र मुझे किसी अंजाम की
के तुम मंज़िल हो इस अफ़साने की l
"मोरनी"