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एक परिंदा फड़फड़ाता हुआ
रोज़ खिड़की पर आता है
क्यूँ है इतना शोर बाहर
ये समझ नहीं पाता है
कहां गयीं वो पेड़ों की शाखें
ये सोचता रह जाता है
जिसका पानी सबसे मीठा था
उस झरने को तरस जाता है
वो नीला आसमां जिसमें वो उड़ता था
किसी और रंग का क्यूँ नज़र आता है
ख़ुदा ने सबको आज़ादी दी
सोचता फ़िर ये पिंजरे कौन बनाता है l
"मोरनी"
एक परिंदा फड़फड़ाता हुआ रोज़ खिड़की पर आता है क्यूँ है इतना शोर बाहर ये समझ नहीं पाता है कहां गयीं वो पेड़ों की शाखें ये सोचता रह जाता है जिसका पानी सबसे मीठा था उस झरने को तरस जाता है वो नीला आसमां जिसमें वो उड़ता था किसी और रंग का क्यूँ नज़र आता है ख़ुदा ने सबको आज़ादी दी सोचता फ़िर ये पिंजरे कौन बनाता है l "मोरनी"
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