जाने क्यों...
इंसान दूसरे की उड़ान देखकर
अपने ही पंख गिनने लग जाता है
वो भूल जाता है कि
आसमां तो सबका साँझा होता है
मैं करती हूँ कोशिश हर शख्स से जुड़ने की
लेकिन कईयों को इससे भी रश्क (Jealousy) होता है
माना कि हुनर है सब में जुदा जुदा
पर हर कोई ख़ुदा तो नहीं होता है
गर करूँ बयां ख़ुद को एक खुली किताब बनकर
तो ज़ाहिर है किताब का कोई महरम(relative)नहीं होता है l
"मोरनी"
इंसान दूसरे की उड़ान देखकर
अपने ही पंख गिनने लग जाता है
वो भूल जाता है कि
आसमां तो सबका साँझा होता है
मैं करती हूँ कोशिश हर शख्स से जुड़ने की
लेकिन कईयों को इससे भी रश्क (Jealousy) होता है
माना कि हुनर है सब में जुदा जुदा
पर हर कोई ख़ुदा तो नहीं होता है
गर करूँ बयां ख़ुद को एक खुली किताब बनकर
तो ज़ाहिर है किताब का कोई महरम(relative)नहीं होता है l
"मोरनी"
जाने क्यों...
इंसान दूसरे की उड़ान देखकर
अपने ही पंख गिनने लग जाता है
वो भूल जाता है कि
आसमां तो सबका साँझा होता है
मैं करती हूँ कोशिश हर शख्स से जुड़ने की
लेकिन कईयों को इससे भी रश्क (Jealousy) होता है
माना कि हुनर है सब में जुदा जुदा
पर हर कोई ख़ुदा तो नहीं होता है
गर करूँ बयां ख़ुद को एक खुली किताब बनकर
तो ज़ाहिर है किताब का कोई महरम(relative)नहीं होता है l
"मोरनी"
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