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दीवार में एक खिड़की रहती थी
जाने वो मुझसे क्या कहती थी
उस पर बैठी घन्टों निहारती
वो चांद वो तारे और वो खूबसूरत आसमां
फ़िर पकड़ती किसी पुस्तक का पन्ना
और पन्ने से करती ढेरों बातें
शब्द कम होते और अर्थ गहरे
गहराई में होती एक तहज़ीब
फ़िर कोई चुपके से पास आकर बैठ जाता
करता कोशिश हर अल्फाज़ को समझने की
और मैं करती जद्दोजहद ख़ुद को जानने की
"मोरनी"
दीवार में एक खिड़की रहती थी जाने वो मुझसे क्या कहती थी उस पर बैठी घन्टों निहारती वो चांद वो तारे और वो खूबसूरत आसमां फ़िर पकड़ती किसी पुस्तक का पन्ना और पन्ने से करती ढेरों बातें शब्द कम होते और अर्थ गहरे गहराई में होती एक तहज़ीब फ़िर कोई चुपके से पास आकर बैठ जाता करता कोशिश हर अल्फाज़ को समझने की और मैं करती जद्दोजहद ख़ुद को जानने की "मोरनी"
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