मेरी सोच से परे भी है सोच कोई
जो झकझोरती है चेतना को ...
मेरे दर्द से परे भी है दर्द कोई
जो गहराई देता है हृदय की वेदना को...
मेरे भावों से परे भी है भाव कोई
जो परिपूर्णता से भरता है संवेदना को...
तुम ज़रा इंतज़ार करो जख़्मों के भर जाने का
पैने करो नखों को अपने यदि इन्हें कुरेदना हो...
"मोरनी"
जो झकझोरती है चेतना को ...
मेरे दर्द से परे भी है दर्द कोई
जो गहराई देता है हृदय की वेदना को...
मेरे भावों से परे भी है भाव कोई
जो परिपूर्णता से भरता है संवेदना को...
तुम ज़रा इंतज़ार करो जख़्मों के भर जाने का
पैने करो नखों को अपने यदि इन्हें कुरेदना हो...
"मोरनी"
मेरी सोच से परे भी है सोच कोई
जो झकझोरती है चेतना को ...
मेरे दर्द से परे भी है दर्द कोई
जो गहराई देता है हृदय की वेदना को...
मेरे भावों से परे भी है भाव कोई
जो परिपूर्णता से भरता है संवेदना को...
तुम ज़रा इंतज़ार करो जख़्मों के भर जाने का
पैने करो नखों को अपने यदि इन्हें कुरेदना हो...
"मोरनी"