बचपन में खेला करते थे
मिट्टी के घरौंदे बनाकर
और जब खेल खत्म करके
हमने ही बनाया हमने ही तोड़ा
( म्हे ई मांड्यो महे ही ढ़ोह्यौ )
कहकर लात मारकर गिराया करते
तो एक विजयी अहसास हुआ करता था
अब जब खुद के ही बनाए
ख़्वाबों के घरौंदे टूट जाते हैं
तो पराजित सा अनुभव होता है
क्योंकि अब समझ में आया कि
टूटने की वेदना, बनाने के परिश्रम को ही नहीं
फिर से बनाने की हिम्मत को भी
तोड़कर रख देती है...
"मोरनी"
मिट्टी के घरौंदे बनाकर
और जब खेल खत्म करके
हमने ही बनाया हमने ही तोड़ा
( म्हे ई मांड्यो महे ही ढ़ोह्यौ )
कहकर लात मारकर गिराया करते
तो एक विजयी अहसास हुआ करता था
अब जब खुद के ही बनाए
ख़्वाबों के घरौंदे टूट जाते हैं
तो पराजित सा अनुभव होता है
क्योंकि अब समझ में आया कि
टूटने की वेदना, बनाने के परिश्रम को ही नहीं
फिर से बनाने की हिम्मत को भी
तोड़कर रख देती है...
"मोरनी"
बचपन में खेला करते थे
मिट्टी के घरौंदे बनाकर
और जब खेल खत्म करके
हमने ही बनाया हमने ही तोड़ा
( म्हे ई मांड्यो महे ही ढ़ोह्यौ )
कहकर लात मारकर गिराया करते
तो एक विजयी अहसास हुआ करता था
अब जब खुद के ही बनाए
ख़्वाबों के घरौंदे टूट जाते हैं
तो पराजित सा अनुभव होता है
क्योंकि अब समझ में आया कि
टूटने की वेदना, बनाने के परिश्रम को ही नहीं
फिर से बनाने की हिम्मत को भी
तोड़कर रख देती है...
"मोरनी"