तल्खियां भारी हैं क्या साहब ज़िंदगी में आपकी...
मुझे बोझ ढ़ोने की आदत है....
रख दीजिए सिर पर मेरे दो चार और सही
पीठ और पेट मिल भी जाते हैं अक्सर मेरे
मैनें अपनी क्षुधा की शिकायत कब आपसे की...
आपको मुबारक जिस महल की नींव मेरे पसीने से बनी
मुझे तो मेरी टपकती टूटती झोंपड़ी ही भली
मैं समझ सकता हूँ आपकी तमाम मज़बूरियां
मैनें तो अब तक यह ज़िंदगी अपनी शर्तों पे जी
ज़हर है तो क्या घूंट - घूंट बहुत मजे से है पी...
"प्रियंका मोर"
तल्खियां भारी हैं क्या साहब ज़िंदगी में आपकी...
मुझे बोझ ढ़ोने की आदत है....
रख दीजिए सिर पर मेरे दो चार और सही
पीठ और पेट मिल भी जाते हैं अक्सर मेरे
मैनें अपनी क्षुधा की शिकायत कब आपसे की...
आपको मुबारक जिस महल की नींव मेरे पसीने से बनी
मुझे तो मेरी टपकती टूटती झोंपड़ी ही भली
मैं समझ सकता हूँ आपकी तमाम मज़बूरियां
मैनें तो अब तक यह ज़िंदगी अपनी शर्तों पे जी
ज़हर है तो क्या घूंट - घूंट बहुत मजे से है पी...
"प्रियंका मोर"